चावल सब्सिडी पर भारत ने फिर उठाया बड़ा कदम, WTO की ‘पीस क्लॉज’ का सातवीं बार किया इस्तेमाल
WTO के नियमों के अनुसार, विकासशील देशों को खाद्यान्न उत्पादन के कुल मूल्य के 10 फीसदी तक ही सब्सिडी देने की अनुमति होती है. लेकिन भारत ने 2024-25 के लिए यह सीमा पार कर दी है. सरकार ने WTO को दी गई जानकारी में बताया कि इस अवधि में चावल किसानों को करीब 7.6 अरब डॉलर (लगभग 11.85 फीसदी) की सब्सिडी दी गई, जबकि कुल उत्पादन का मूल्य करीब 64.13 अरब डॉलर रहा.
Rice subsidy WTO: भारत ने एक बार फिर अपने किसानों के हित में बड़ा फैसला लेते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अहम कदम उठाया है. देश ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के तहत मिलने वाली ‘पीस क्लॉज’ का इस्तेमाल करते हुए चावल पर दी जा रही सब्सिडी को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट की है. यह सातवीं बार है जब भारत ने इस प्रावधान का सहारा लिया है, जिससे यह साफ होता है कि सरकार खाद्य सुरक्षा और किसानों के हितों को प्राथमिकता दे रही है.
क्या है पूरा मामला?
WTO के नियमों के अनुसार, विकासशील देशों को खाद्यान्न उत्पादन के कुल मूल्य के 10 फीसदी तक ही सब्सिडी देने की अनुमति होती है. लेकिन भारत ने 2024-25 के लिए यह सीमा पार कर दी है. सरकार ने WTO को दी गई जानकारी में बताया कि इस अवधि में चावल किसानों को करीब 7.6 अरब डॉलर (लगभग 11.85 फीसदी) की सब्सिडी दी गई, जबकि कुल उत्पादन का मूल्य करीब 64.13 अरब डॉलर रहा. इस तरह भारत ने तय सीमा से ज्यादा सब्सिडी दी, लेकिन ‘पीस क्लॉज’ के तहत इसे कानूनी सुरक्षा मिल जाती है.
‘पीस क्लॉज’ क्या है और क्यों जरूरी है?
इकोनॉमिक्स टाइम्स ‘पीस क्लॉज’ WTO का एक विशेष प्रावधान है, जो विकासशील देशों को राहत देता है. अगर कोई देश खाद्य सुरक्षा के लिए जरूरी कार्यक्रमों के तहत तय सीमा से ज्यादा सब्सिडी देता है, तो अन्य देश उस पर कोई कार्रवाई नहीं कर सकते. भारत ने पहली बार 2020 में इस प्रावधान का उपयोग किया था और अब तक कुल सात बार इसका इस्तेमाल कर चुका है.
सरकार का कहना है कि यह सब्सिडी गरीब और कमजोर वर्गों के लिए खाद्यान्न उपलब्ध कराने के उद्देश्य से दी जाती है, न कि वैश्विक व्यापार को प्रभावित करने के लिए.
खाद्य सुरक्षा से जुड़ा है पूरा मामला
भारत ने WTO को यह भी बताया कि चावल की खरीद और भंडारण कार्यक्रम पूरी तरह से देश की खाद्य सुरक्षा जरूरतों को ध्यान में रखकर किए जाते हैं. सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और अन्य योजनाओं के जरिए गरीबों तक सस्ती दर पर अनाज पहुंचाती है. इसके लिए बड़े पैमाने पर चावल की खरीद की जाती है, जिससे किसानों को भी न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर उनकी फसल का उचित दाम मिल सके.
किसानों को कितना मिला सहयोग?
आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 के दौरान भारत ने कम आय वाले और छोटे किसानों को कुल 42.5 अरब डॉलर की इनपुट सब्सिडी भी दी. हालांकि यह पिछले वर्ष के 43.25 अरब डॉलर से थोड़ा कम है, लेकिन फिर भी यह राशि किसानों के लिए बड़ा सहारा है. इन सब्सिडी में खाद, बीज, सिंचाई और अन्य कृषि जरूरतों से जुड़ी सहायता शामिल होती है, जिससे किसानों की लागत कम होती है और उनकी आय बढ़ाने में मदद मिलती है.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्या असर?
भारत का यह कदम वैश्विक स्तर पर भी चर्चा का विषय बनता है, क्योंकि कई विकसित देश सब्सिडी नियमों को लेकर सख्त रुख अपनाते हैं. हालांकि भारत लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि उसकी नीतियां घरेलू जरूरतों और गरीबों की खाद्य सुरक्षा के लिए हैं, न कि व्यापार को प्रभावित करने के लिए. ‘पीस क्लॉज’ के तहत भारत को कानूनी सुरक्षा मिलती है, जिससे वह अपने कार्यक्रम जारी रख सकता है.
किसानों और आम जनता के लिए क्या मतलब?
इस फैसले का सीधा फायदा किसानों और आम लोगों दोनों को मिलता है. किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिलता है, जबकि गरीब और जरूरतमंद लोगों को सस्ता अनाज उपलब्ध कराया जाता है. इस तरह यह नीति एक तरफ किसानों की आय को स्थिर करती है और दूसरी तरफ देश की खाद्य सुरक्षा को मजबूत बनाती है.