Potato farming: आलू भारत की उन चुनिंदा फसलों में शामिल है, जो हर रसोई की जरूरत भी है और लाखों किसानों की आमदनी का आधार भी. उत्तर भारत से लेकर पूर्वी और मध्य भारत तक बड़े पैमाने पर आलू की खेती होती है. लेकिन बीते कुछ वर्षों में किसानों के सामने एक गंभीर चुनौती लगातार बढ़ती जा रही है आलू की फसल में फफूंद रोग. यह रोग धीरे-धीरे खेत में फैलता है और जब तक किसान समझ पाता है, तब तक नुकसान काफी हो चुका होता है. अगर समय रहते सही कदम न उठाए जाएं, तो पूरी फसल चौपट होने का खतरा रहता है.
क्यों बढ़ रहा है आलू में फफूंद रोग का खतरा
खेती विशेषज्ञों के अनुसार आलू की फसल में फफूंद रोग के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं. सबसे बड़ा कारण है खेत में लगातार एक ही फसल उगाना. जब साल दर साल उसी खेत में आलू लगाया जाता है, तो मिट्टी में मौजूद फफूंद और रोगाणु मजबूत होते जाते हैं. इसके अलावा अधिक नमी, खराब जल निकासी और मौसम में अचानक बदलाव भी फफूंद को तेजी से पनपने का मौका देता है.
आलू की फसल में लेट ब्लाइट और अर्ली ब्लाइट जैसे रोग सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं. शुरुआत में पत्तियों पर हल्के भूरे या काले धब्बे दिखाई देते हैं, फिर धीरे-धीरे पत्तियां सूखने लगती हैं. अगर समय रहते इलाज न किया जाए, तो यह रोग तनों और कंदों तक पहुंच जाता है, जिससे आलू सड़ने लगते हैं और बाजार में उनकी कीमत भी गिर जाती है.
खेत की तैयारी और फसल चक्र से मिलेगी राहत
आलू की खेती में फफूंद रोग से बचाव की शुरुआत खेत की सही तैयारी से होती है. विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि हर साल एक ही खेत में आलू न लगाएं. गेहूं, चना, सरसों या दलहन जैसी फसलों के साथ फसल चक्र अपनाने से मिट्टी में मौजूद रोगाणु कमजोर पड़ते हैं. इससे अगली आलू की फसल को प्राकृतिक सुरक्षा मिलती है.
खेत में पुराने पौधों के अवशेष, सड़े हुए कंद और संक्रमित हिस्सों को पूरी तरह हटाना भी बेहद जरूरी है. यही अवशेष फफूंद के फैलने का सबसे बड़ा स्रोत बनते हैं. साफ-सुथरा खेत ही स्वस्थ फसल की पहली शर्त है.
पानी और नमी का संतुलन है सबसे अहम
आलू की फसल को नमी की जरूरत होती है, लेकिन जरूरत से ज्यादा पानी फफूंद रोग को न्योता देता है. जलभराव वाले खेतों में फफूंद तेजी से फैलता है. इसलिए सिंचाई हमेशा जरूरत के अनुसार ही करनी चाहिए. खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि बारिश या ज्यादा पानी देने पर खेत में पानी न रुके.
बीज और किस्मों का सही चयन क्यों जरूरी
फफूंद रोग से बचाव में बीज की भूमिका सबसे अहम होती है. रोगग्रस्त या खराब बीज से पूरी फसल बीमार हो सकती है. इसलिए हमेशा प्रमाणित और रोग-प्रतिरोधी किस्मों का ही चयन करना चाहिए. आज कई ऐसी किस्में उपलब्ध हैं, जो फफूंद रोग के प्रति ज्यादा सहनशील होती हैं और किसानों को नुकसान से बचा सकती हैं.
जैविक और रासायनिक उपायों का संतुलन
फसल की नियमित निगरानी करना बेहद जरूरी है. जैसे ही पत्तियों पर धब्बे या पौधों में कमजोरी दिखे, तुरंत उपचार शुरू कर देना चाहिए. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार ट्राइकोडर्मा जैसे जैविक फफूंदनाशक मिट्टी और पौधों के लिए सुरक्षित होते हैं और लंबे समय तक असर दिखाते हैं. जरूरत पड़ने पर कृषि विभाग द्वारा सुझाए गए रजिस्टर्ड फफूंदनाशकों का सीमित और सही मात्रा में इस्तेमाल करना चाहिए.
समय पर पहचान ही सबसे बड़ा बचाव
आलू की फसल में फफूंद रोग कोई ऐसी समस्या नहीं है, जिसका समाधान संभव न हो. सही जानकारी, समय पर पहचान और संतुलित प्रबंधन से इस बीमारी पर काबू पाया जा सकता है. अगर किसान खेती के हर चरण में थोड़ी सावधानी बरतें, तो न सिर्फ उत्पादन बढ़ाया जा सकता है, बल्कि आलू की गुणवत्ता भी बेहतर बनी रहती है. अंततः यही सावधानी किसानों की मेहनत और आमदनी दोनों को सुरक्षित रखती है.