खाद्य तेल उद्योग ने बजट से लगाई गुहार, समान टैक्स और नेपाल से आयात पर रोक की मांग

हाल ही में सरकार ने कुछ कच्चे खाद्य तेलों जैसे पाम ऑयल, सोयाबीन ऑयल और सूरजमुखी तेल पर प्रभावी सीमा शुल्क घटाकर 16.5 प्रतिशत किया है. इससे बाजार में कीमतों को काबू करने में थोड़ी मदद मिली है. लेकिन समस्या यह है कि सभी कच्चे तेलों पर यह राहत समान रूप से नहीं दी गई है.

नई दिल्ली | Published: 30 Jan, 2026 | 11:45 AM

देश में खाद्य तेल का इस्तेमाल हर रसोई में होता है, लेकिन इसके पीछे खड़ा पूरा उद्योग इस समय कई चुनौतियों से जूझ रहा है. तेलहन किसानों से लेकर तेल रिफाइनरी, प्रोसेसिंग यूनिट और रोजगार देने वाले छोटे-बड़े उद्योगों तक सभी की नजरें आने वाले बजट पर टिकी हैं. सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) ने सरकार से अपील की है कि बजट में ऐसे कदम उठाए जाएं, जिससे घरेलू खाद्य तेल उद्योग को मजबूती मिले और आयात पर निर्भरता कम हो सके.

घरेलू तेल उद्योग को क्यों चाहिए सरकारी सहारा

बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, भारत भले ही एक कृषि प्रधान देश है, लेकिन खाद्य तेल के मामले में आज भी बड़ी मात्रा में आयात पर निर्भर है. इससे एक तरफ विदेशी मुद्रा पर दबाव पड़ता है, तो दूसरी तरफ देश के किसानों को उनकी फसल का सही दाम नहीं मिल पाता. SEA का कहना है कि अगर नीति सही दिशा में बने, तो देश में ही तेलहन उत्पादन, प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन को बढ़ावा दिया जा सकता है.

SEA के अध्यक्ष संजीव अस्थाना के अनुसार, बजट 2026-27 खाद्य तेल और कृषि क्षेत्र के लिए बेहद अहम साबित हो सकता है. यह ऐसा मौका है, जहां सरकार किसानों की आमदनी बढ़ाने, घरेलू उद्योग को मजबूत करने और बाजार में स्थिरता लाने के लिए ठोस फैसले ले सकती है.

कच्चे खाद्य तेलों पर टैक्स में असमानता बनी बड़ी समस्या

हाल ही में सरकार ने कुछ कच्चे खाद्य तेलों जैसे पाम ऑयल, सोयाबीन ऑयल और सूरजमुखी तेल पर प्रभावी सीमा शुल्क घटाकर 16.5 प्रतिशत किया है. इससे बाजार में कीमतों को काबू करने में थोड़ी मदद मिली है. लेकिन समस्या यह है कि सभी कच्चे तेलों पर यह राहत समान रूप से नहीं दी गई है.

चावल की भूसी से बनने वाला तेल और सरसों तेल जैसे कच्चे खाद्य तेलों पर अब भी करीब 38.5 प्रतिशत तक टैक्स लगता है. इससे बाजार में असंतुलन पैदा हो रहा है. अलग-अलग टैक्स दरों के कारण कुछ तेल सस्ते पड़ते हैं और कुछ महंगे, जिससे घरेलू रिफाइनरों के लिए बराबरी का मैदान नहीं बन पाता.

SEA का कहना है कि सभी कच्चे खाद्य तेलों पर एक समान टैक्स होना चाहिए. इससे न सिर्फ कीमतों में स्थिरता आएगी, बल्कि घरेलू प्रोसेसिंग को भी बढ़ावा मिलेगा और महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी.

नेपाल से आने वाले सस्ते तेल ने बढ़ाई मुश्किल

SEA ने नेपाल से आने वाले ड्यूटी-फ्री खाद्य तेल आयात पर भी चिंता जताई है. SAFTA समझौते के तहत नेपाल से तेल बिना शुल्क के भारत आता है, लेकिन इसका असर घरेलू उद्योग पर सीधा पड़ रहा है. बड़ी मात्रा में सस्ता तेल आने से देश की रिफाइनरियों की क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पा रहा, जिससे रोजगार पर भी असर पड़ रहा है.

इसके अलावा, मंडियों में तेलहन की कीमतें दबाव में आ जाती हैं और किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य का पूरा लाभ नहीं मिल पाता. SEA का मानना है कि इससे लंबे समय में देश की खाद्य सुरक्षा और तेलहन उत्पादन दोनों को खतरा हो सकता है. संगठन ने मांग की है कि ‘कंट्री ऑफ ओरिजिन’ के नियमों को सख्ती से लागू किया जाए, ताकि सिर्फ वास्तविक नेपाली उत्पाद ही भारत में प्रवेश कर सकें.

GST रिफंड की मांग से मिल सकती है राहत

खाद्य तेल उद्योग ने एक और अहम मांग उठाई है. संगठन का कहना है कि उलटी कर संरचना (Inverted Duty Structure) के कारण कई कंपनियों का इनपुट टैक्स क्रेडिट फंसा हुआ है. अगर सरकार इसका GST रिफंड देने का प्रावधान करती है, तो उद्योग को नकदी संकट से राहत मिलेगी और निवेश बढ़ेगा.

बजट से उम्मीदें बड़ी

खाद्य तेल उद्योग चाहता है कि बजट में ऐसी नीतियां आएं, जो किसानों को बेहतर दाम दिलाएं, घरेलू उत्पादन और प्रोसेसिंग को बढ़ावा दें और आयात पर निर्भरता धीरे-धीरे कम करें. अगर सरकार इन मांगों पर गंभीरता से विचार करती है, तो इसका फायदा सिर्फ उद्योग को नहीं, बल्कि किसानों और आम उपभोक्ताओं को भी मिलेगा.

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