सोयामील की कमजोर मांग ने गिराया तेलहन निर्यात, दिसंबर में 40 फीसदी की बड़ी कमी

सोयामील निर्यात की गिरावट की एक बड़ी वजह घरेलू बाजार में मांग का कमजोर होना भी है. पिछले दो वर्षों से पशु आहार बनाने वाली कंपनियां सोयामील की जगह डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेन्स विद सॉल्युबल्स यानी डीडीजीएस का ज्यादा इस्तेमाल कर रही हैं. इस वजह से देश के भीतर भी सोयामील की खपत कम हुई है और निर्यातकों पर दोहरा दबाव पड़ा है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 19 Jan, 2026 | 02:42 PM

India oilmeal exports: भारत के कृषि निर्यात में एक अहम हिस्सा रखने वाले तेलहन उद्योग को इस साल झटका लगा है. खासतौर पर सोयाबीन से बनने वाले सोयामील की घटती विदेश मांग ने पूरे तेलहन निर्यात की रफ्तार को धीमा कर दिया है. इसका असर यह रहा कि दिसंबर महीने में तेलहन निर्यात में करीब 40 फीसदी की भारी गिरावट दर्ज की गई, जबकि पूरे वित्त वर्ष 2025-26 के अप्रैल से दिसंबर तक के आंकड़ों में भी निर्यात करीब 5.5 फीसदी कम रहा.

बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, तेलहन कारोबार से जुड़े जानकारों का कहना है कि यह गिरावट अचानक नहीं आई है, बल्कि इसके पीछे घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर बदलती परिस्थितियां जिम्मेदार हैं. खास बात यह है कि सोयामील की कीमतें वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी नहीं रह गई हैं, जिससे भारत की पकड़ कमजोर हुई है.

नौ महीनों में घटा तेलहन निर्यात

सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) द्वारा संकलित आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 के पहले नौ महीनों यानी अप्रैल से दिसंबर के बीच भारत ने करीब 29.75 लाख टन तेलहन उत्पादों का निर्यात किया. पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 31.50 लाख टन था. यानी सालाना आधार पर साफ गिरावट देखी गई है.

दिसंबर 2025 की बात करें तो उस महीने भारत का कुल तेलहन निर्यात घटकर 2.40 लाख टन रह गया, जबकि दिसंबर 2024 में यह 3.98 लाख टन था. यह गिरावट सीधे तौर पर सोयामील के कमजोर प्रदर्शन से जुड़ी मानी जा रही है.

सोयामील बना गिरावट की सबसे बड़ी वजह

SEA के कार्यकारी निदेशक बीवी मेहता के अनुसार, नवंबर और दिसंबर 2025 के दौरान भारत का सोयामील निर्यात सिर्फ 2.28 लाख टन रहा, जबकि पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में यह 4.61 लाख टन था. यानी लगभग आधा निर्यात खत्म हो गया.

महीनेवार आंकड़ों पर नजर डालें तो नवंबर 2025 में भारत ने 1.13 लाख टन सोयामील का निर्यात किया, जबकि नवंबर 2024 में यह 1.83 लाख टन था. दिसंबर 2025 में भी स्थिति बेहतर नहीं रही और निर्यात 1.14 लाख टन पर सिमट गया, जो एक साल पहले 2.78 लाख टन था.

विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोप जैसे बाजारों से समर्थन के बावजूद भारत सोयामील के मामले में वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ गया है. ऊंची लागत और अन्य देशों से सस्ते विकल्प मिलने के कारण भारतीय उत्पादों की मांग कमजोर पड़ी है.

घरेलू बाजार ने भी बढ़ाई मुश्किल

सोयामील निर्यात की गिरावट की एक बड़ी वजह घरेलू बाजार में मांग का कमजोर होना भी है. पिछले दो वर्षों से पशु आहार बनाने वाली कंपनियां सोयामील की जगह डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेन्स विद सॉल्युबल्स यानी DDJS का ज्यादा इस्तेमाल कर रही हैं. यह एथनॉल उत्पादन के दौरान मक्का और चावल से निकलने वाला उप-उत्पाद है, जो सोयामील की तुलना में सस्ता पड़ता है.

इस वजह से देश के भीतर भी सोयामील की खपत कम हुई है और निर्यातकों पर दोहरा दबाव पड़ा है. यही कारण है कि अप्रैल से दिसंबर 2025-26 के दौरान सोयामील का कुल निर्यात घटकर 12.47 लाख टन रह गया, जबकि पिछले साल यह 14.85 लाख टन था.

सरसों खली के सामने भी चुनौतियां

सिर्फ सोयामील ही नहीं, बल्कि सरसों खली यानी रेपसीड मील के मोर्चे पर भी हालात आसान नहीं हैं. भारत में हाल के महीनों में सरसों की पेराई कम हुई है, जिससे तेल और खली का उत्पादन सीमित रहा. नई फसल फरवरी-मार्च में आने तक यह स्थिति बनी रहने की संभावना है.

इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने से चीन जैसे बड़े खरीदारों की रुचि भी कम हो सकती है. फिलहाल भारतीय सरसों खली की कीमत करीब 250 डॉलर प्रति टन एफओबी बताई जा रही है, जबकि जर्मनी के हैम्बर्ग में इसकी कीमत लगभग 247 डॉलर प्रति टन है. मामूली अंतर के बावजूद खरीदार सस्ते विकल्पों की ओर झुक सकते हैं.

चीन, कोरिया और बांग्लादेश प्रमुख खरीदार

आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से दिसंबर 2025-26 के दौरान भारत ने चीन को करीब 6.85 लाख टन तेलहन उत्पादों का निर्यात किया, जिसमें मुख्य रूप से सरसों खली शामिल रही. दक्षिण कोरिया को इसी अवधि में 2.87 लाख टन तेलहन भेजा गया, जो पिछले साल की तुलना में काफी कम है.

बांग्लादेश भी भारत का बड़ा आयातक रहा, जिसने 3.24 लाख टन तेलहन उत्पाद खरीदे. इसके अलावा यूरोप में जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों को भी सीमित मात्रा में सोयामील निर्यात किया गया.

वहीं, तेलहन उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में नई फसल की आवक और वैश्विक कीमतों की दिशा तय करेगी कि निर्यात में सुधार होगा या नहीं. अगर भारत अपनी कीमतों को प्रतिस्पर्धी बना पाता है और घरेलू मांग में संतुलन लौटता है, तो हालात सुधर सकते हैं.

फिलहाल, सोयामील और तेलहन निर्यात में आई यह गिरावट किसानों, प्रोसेसरों और निर्यातकों सभी के लिए चिंता का विषय बनी हुई है. आने वाला समय बताएगा कि यह गिरावट अस्थायी है या भारत को अपनी रणनीति में बड़े बदलाव करने होंगे.

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