बासमती सर्वे फिर शुरू करने की मांग, IREF बोला- किसानों और कारोबार दोनों को होगा लाभ

भारत दुनिया के सबसे बड़े बासमती चावल निर्यातकों में शामिल है. हर साल बड़ी मात्रा में बासमती चावल विदेशों में भेजा जाता है. ऐसे में फसल का सही अनुमान लगाना बेहद जरूरी माना जाता है. विशेषज्ञों के अनुसार अगर उत्पादन, खेती क्षेत्र और फसल की स्थिति की सही जानकारी समय पर मिल जाए, तो निर्यातक, व्यापारी और किसान बेहतर योजना बना सकते हैं.

नई दिल्ली | Published: 15 May, 2026 | 07:59 AM

IREF APEDA partnership: भारत के बासमती चावल कारोबार से जुड़ी बड़ी संस्था भारतीय चावल निर्यातक संघ यानी IREF ने बासमती फसल सर्वे को लेकर सरकार के साथ मिलकर काम करने की इच्छा जताई है. संस्था का कहना है कि अगर APEDA और उद्योग जगत मिलकर काम करें, तो इससे बासमती उत्पादन का सही अनुमान लगाने, निर्यात की बेहतर योजना बनाने और किसानों तक सही जानकारी पहुंचाने में मदद मिलेगी.

IREF ने APEDA चेयरमैन अभिषेक देव को पत्र लिखकर इस साझेदारी का प्रस्ताव दिया है. संस्था का मानना है कि यह कदम भारतीय बासमती चावल की वैश्विक पहचान और भरोसे को और मजबूत करेगा.

क्यों जरूरी है बासमती फसल सर्वे?

बिजनेस लाइन की खबर के मुताबिक, भारत दुनिया के सबसे बड़े बासमती चावल निर्यातकों में शामिल है. हर साल बड़ी मात्रा में बासमती चावल विदेशों में भेजा जाता है. ऐसे में फसल का सही अनुमान लगाना बेहद जरूरी माना जाता है. विशेषज्ञों के अनुसार अगर उत्पादन, खेती क्षेत्र और फसल की स्थिति की सही जानकारी समय पर मिल जाए, तो निर्यातक, व्यापारी और किसान बेहतर योजना बना सकते हैं. इससे बाजार में कीमतों को स्थिर रखने में भी मदद मिलती है.

पहले APEDA की बासमती एक्सपोर्ट डेवलपमेंट फाउंडेशन यानी BEDF हर साल सैटेलाइट इमेज, खेतों के सर्वे, फसल की स्थिति और उत्पादन अनुमान के जरिए यह सर्वे कराती थी. लेकिन 2023 के बाद यह प्रक्रिया रुक गई थी. अब IREF चाहता है कि इसे दोबारा शुरू किया जाए.

AI तकनीक से होगा सर्वे

हाल ही में AI आधारित बासमती धान सर्वे को लेकर चर्चा तेज हुई थी. रिपोर्ट्स के अनुसार APEDA करीब 40 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सर्वे में शामिल करने की तैयारी कर रहा है. हालांकि APEDA की पुरानी रिपोर्ट के मुताबिक देश में बासमती की खेती लगभग 21.4 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में होती है. इसी वजह से इस सर्वे को लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं. कई विशेषज्ञों का मानना है कि सर्वे के दायरे को बढ़ाने से भविष्य में बासमती GI क्षेत्र विस्तार की बहस और तेज हो सकती है.

GI क्षेत्र को लेकर जारी है विवाद

बासमती चावल का एक तय भौगोलिक क्षेत्र यानी GI (Geographical Indication) क्षेत्र माना जाता है. अभी पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर जैसे इलाके पारंपरिक बासमती क्षेत्र माने जाते हैं. लेकिन मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में भी अब बड़े स्तर पर बासमती की खेती होने लगी है. IREF ने सुझाव दिया है कि सर्वे को दो हिस्सों में किया जाए. पहला GI क्षेत्र के राज्यों के लिए और दूसरा उन राज्यों के लिए जहां बासमती की खेती बढ़ रही है.

किसानों और निर्यातकों दोनों को होगा फायदा

IREF का कहना है कि उसके पास पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और दूसरे बासमती क्षेत्रों में मजबूत नेटवर्क मौजूद है. संस्था खेत स्तर पर किसानों और सर्वे टीमों के बीच बेहतर समन्वय बनाने में मदद कर सकती है. इसके अलावा संस्था अंतरराष्ट्रीय बाजार की मांग, अलग-अलग किस्मों की लोकप्रियता और निर्यात रुझानों से जुड़ी जानकारी भी साझा कर सकती है.

भारतीय बासमती की वैश्विक साख मजबूत करने की कोशिश

भारत का बासमती चावल दुनियाभर में अपनी खुशबू और गुणवत्ता के लिए जाना जाता है. ऐसे में उत्पादन और गुणवत्ता का सही डेटा उपलब्ध होना बेहद जरूरी है. उद्योग जगत का मानना है कि APEDA और IREF की साझेदारी से बासमती वैल्यू चेन मजबूत होगी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय बासमती की विश्वसनीयता और बढ़ेगी.

अब नजर इस बात पर टिकी है कि APEDA इस प्रस्ताव पर क्या फैसला लेता है और आने वाले समय में बासमती फसल सर्वे किस रूप में आगे बढ़ता है.

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