तेल की कीमतों में उछाल से रबर उद्योग परेशान, सिंथेटिक रबर बनाना हुआ महंगा
रबर उद्योग का सबसे बड़ा उपयोग टायर बनाने में होता है. टायर निर्माण में सिंथेटिक रबर और कार्बन ब्लैक जैसे कच्चे माल की बड़ी भूमिका होती है. जब इनकी कीमत बढ़ती है तो टायर कंपनियों के उत्पादन खर्च में भी तेजी से वृद्धि हो जाती है.
West Asia crisis: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब धीरे-धीरे दुनिया के कई उद्योगों तक पहुंचने लगा है. ऊर्जा बाजार में आई हलचल का सीधा असर रबर उद्योग पर भी दिखाई देने लगा है. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी जारी रहती है, तो इससे रबर उद्योग की लागत बढ़ सकती है और कंपनियों के मुनाफे पर भी असर पड़ सकता है.
बिजनेसलाइन की खबर के अनुसार, ऑल इंडिया रबर इंडस्ट्रीज एसोसिएशन (AIRIA) ने भी इस स्थिति को लेकर चिंता जताई है. उनका कहना है कि क्षेत्र में बढ़ते संघर्ष के कारण वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है और इससे रबर उद्योग के लिए कच्चा माल महंगा होता जा रहा है.
सिंथेटिक रबर बनाना हो रहा महंगा
सिंथेटिक रबर का उत्पादन मुख्य रूप से पेट्रोकेमिकल उत्पादों से होता है. इसमें नेफ्था, एथिलीन और ब्यूटाडाइन जैसे कच्चे माल का इस्तेमाल किया जाता है, जो सीधे तौर पर कच्चे तेल से जुड़े होते हैं. जब भी कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, इन पेट्रोकेमिकल उत्पादों की कीमत भी बढ़ जाती है. यही कारण है कि सिंथेटिक रबर बनाने की लागत भी बढ़ने लगती है. उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो इसका असर रबर उत्पाद बनाने वाली कंपनियों पर साफ दिखाई देगा.
टायर उद्योग पर भी पड़ेगा असर
रबर उद्योग का सबसे बड़ा उपयोग टायर बनाने में होता है. टायर निर्माण में सिंथेटिक रबर और कार्बन ब्लैक जैसे कच्चे माल की बड़ी भूमिका होती है. जब इनकी कीमत बढ़ती है तो टायर कंपनियों के उत्पादन खर्च में भी तेजी से वृद्धि हो जाती है.
ऐसी स्थिति में कंपनियों के सामने दो चुनौतियां होती हैं या तो वे उत्पादों की कीमत बढ़ाएं या फिर कम मुनाफे के साथ काम करें. यही वजह है कि टायर उद्योग इस समय वैश्विक हालात पर करीब से नजर बनाए हुए है. इसके अलावा ऑटोमोबाइल पार्ट्स, फुटवियर, कन्वेयर बेल्ट और अन्य औद्योगिक रबर उत्पादों के क्षेत्र में भी इसका असर देखने को मिल सकता है.
प्राकृतिक रबर की मांग बढ़ सकती है
हालांकि इस स्थिति का एक सकारात्मक पहलू भी सामने आ सकता है. यदि सिंथेटिक रबर बहुत ज्यादा महंगा हो जाता है, तो कंपनियां अपनी उत्पादन प्रक्रिया में प्राकृतिक रबर का उपयोग बढ़ा सकती हैं.
प्राकृतिक रबर एक कृषि उत्पाद है और इसकी लागत पेट्रोलियम उत्पादों की तरह सीधे कच्चे तेल पर निर्भर नहीं करती. इसलिए कई उद्योग लागत संतुलन के लिए प्राकृतिक रबर की हिस्सेदारी बढ़ाने पर विचार कर सकते हैं. अगर ऐसा होता है तो प्राकृतिक रबर उत्पादक देशों को इसका फायदा मिल सकता है. भारत, थाईलैंड, इंडोनेशिया और वियतनाम जैसे देश दुनिया के बड़े प्राकृतिक रबर उत्पादकों में शामिल हैं.
भारत के लिए क्या मायने हैं
भारत का रबर उद्योग ऑटोमोबाइल सेक्टर, बुनियादी ढांचा विकास और निर्यात से गहराई से जुड़ा हुआ है. इसलिए वैश्विक बाजार में होने वाले बदलावों का असर भारत पर भी पड़ता है. विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा स्थिति भारत के लिए एक अवसर भी हो सकती है. यदि देश प्राकृतिक रबर उत्पादन को बढ़ाने और सप्लाई चेन को मजबूत करने पर ध्यान देता है, तो भविष्य में ऐसे संकटों से बेहतर तरीके से निपटा जा सकता है. साथ ही रबर उद्योग को नई तकनीकों और टिकाऊ कच्चे माल पर निवेश बढ़ाने की भी जरूरत है, ताकि उत्पादन लागत को नियंत्रित किया जा सके.
वहीं अगर यह तनाव लंबा चलता है तो इसका असर वैश्विक उद्योगों पर और गहरा हो सकता है. रबर उद्योग के लिए यह समय सावधानी और रणनीति के साथ आगे बढ़ने का है. कंपनियों को कच्चे माल के नए स्रोत तलाशने होंगे और उत्पादन प्रक्रिया को ज्यादा लचीला बनाना होगा.