खाड़ी देशों में तनाव से भारत के 11.8 अरब डॉलर के कृषि निर्यात पर संकट, चावल और मसालों पर सबसे ज्यादा असर
भारत के कृषि और खाद्य उत्पादों का बड़ा बाजार पश्चिम एशिया के देश हैं. इन देशों में भारत से बड़ी मात्रा में चावल, फल, सब्जियां, मसाले, मांस और डेयरी उत्पाद भेजे जाते हैं. वर्ष 2025 के आंकड़ों के अनुसार भारत ने पश्चिम एशिया के देशों को करीब 11.8 अरब डॉलर के कृषि और खाद्य उत्पाद निर्यात किए थे.
West Asia conflict impact: पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव और युद्ध जैसे हालात अब वैश्विक व्यापार पर भी असर डालने लगे हैं. इसका सीधा प्रभाव भारत के कृषि निर्यात पर पड़ सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस क्षेत्र में अस्थिरता लंबे समय तक बनी रहती है, तो भारत के किसानों, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग और निर्यातकों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं.
दरअसल, भारत के कृषि और खाद्य उत्पादों का बड़ा बाजार पश्चिम एशिया के देश हैं. इन देशों में भारत से बड़ी मात्रा में चावल, फल, सब्जियां, मसाले, मांस और डेयरी उत्पाद भेजे जाते हैं. वर्ष 2025 के आंकड़ों के अनुसार भारत ने पश्चिम एशिया के देशों को करीब 11.8 अरब डॉलर के कृषि और खाद्य उत्पाद निर्यात किए थे. यह देश के कुल कृषि निर्यात का पांचवें हिस्से से भी अधिक है. ऐसे में यदि वहां व्यापार प्रभावित होता है तो इसका असर सीधे भारतीय किसानों और व्यापारियों पर पड़ना तय है.
चावल निर्यात पर सबसे बड़ा असर
डेक्कन क्रॉनिकल की खबर के अनुसार, भारत के कृषि निर्यात में चावल का महत्वपूर्ण स्थान है और खाड़ी देशों में भारतीय चावल की बड़ी मांग रहती है. खासकर बासमती चावल सऊदी अरब, इराक और ईरान जैसे देशों में काफी लोकप्रिय है.
साल 2025 में भारत ने पश्चिम एशिया को करीब 4.43 अरब डॉलर का चावल निर्यात किया था. यह भारत के कुल वैश्विक चावल निर्यात का लगभग 36.7 प्रतिशत हिस्सा था. लेकिन मौजूदा हालात में समुद्री व्यापार और शिपिंग मार्गों में आ रही बाधाओं के कारण चावल का निर्यात प्रभावित होने लगा है.
उद्योग से जुड़े सूत्रों के अनुसार इस समय करीब चार लाख मीट्रिक टन बासमती चावल बंदरगाहों या ट्रांजिट में फंसा हुआ है. यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो इसका असर पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों के किसानों पर पड़ेगा, जहां बड़े पैमाने पर धान की खेती होती है.
कई अन्य खाद्य उत्पाद भी प्रभावित हो सकते हैं
चावल के अलावा कई अन्य कृषि उत्पाद भी पश्चिम एशिया के बाजारों पर काफी हद तक निर्भर हैं. भारत से इन देशों में बड़ी मात्रा में केले, मसाले, मांस और डेयरी उत्पाद भेजे जाते हैं. कुछ खाद्य उत्पादों के मामले में भारत की निर्भरता खाड़ी देशों पर बहुत अधिक है. उदाहरण के तौर पर भेड़ और बकरी के मांस, ताजा बफ, केले, नारियल से बने उत्पाद और कुछ मसालों के 70 प्रतिशत से अधिक निर्यात पश्चिम एशिया में ही होता है. इसके अलावा डेयरी उत्पाद, चाय, पेय पदार्थ और कुछ खाद्य तेल भी इन देशों में बड़ी मात्रा में भेजे जाते हैं. यदि युद्ध के कारण व्यापार मार्ग प्रभावित होते हैं या जहाजों की आवाजाही में बाधा आती है तो इन उत्पादों के निर्यात पर भी असर पड़ सकता है.
मसालों के व्यापार पर भी खतरा
भारत दुनिया के प्रमुख मसाला उत्पादक देशों में से एक है और पश्चिम एशिया भारतीय मसालों का बड़ा बाजार है. खासकर जायफल, जावित्री और इलायची जैसे मसालों की मांग खाड़ी देशों में अधिक रहती है.
वर्ष 2025 में भारत से जीरा और धनिया जैसे मसाला बीजों का करीब 163 मिलियन डॉलर का निर्यात हुआ था. वहीं अदरक और हल्दी का निर्यात लगभग 173 मिलियन डॉलर का रहा. इन उत्पादों के कुल निर्यात का करीब 23 प्रतिशत हिस्सा पश्चिम एशिया के देशों में जाता है.
इन मसालों की खेती मुख्य रूप से केरल, कर्नाटक, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में होती है. ऐसे में यदि निर्यात प्रभावित होता है तो इन राज्यों के किसानों की आय पर भी असर पड़ सकता है.
होर्मुज जलडमरूमध्य की अहम भूमिका
पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष का असर केवल कृषि व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध वैश्विक ऊर्जा बाजार से भी है. इस क्षेत्र में स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है.
यह समुद्री मार्ग ईरान और ओमान के बीच स्थित है और इसके जरिए दुनिया के कई देशों को तेल और अन्य जरूरी सामान की आपूर्ति होती है. भारत के लिए भी यह मार्ग बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश के लगभग 40 प्रतिशत तेल आयात इसी रास्ते से होकर आते हैं. अगर इस मार्ग पर तनाव बढ़ता है या जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो इसका असर ऊर्जा कीमतों और व्यापार दोनों पर पड़ सकता है.
नए बाजार तलाशना जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपने कृषि निर्यात के लिए नए अंतरराष्ट्रीय बाजार तलाशने की जरूरत है. पिछले एक दशक में कई खाद्य उत्पादों के लिए भारत की निर्भरता पश्चिम एशिया के बाजारों पर काफी बढ़ गई है.
यदि भारत अपने निर्यात बाजारों को विविध बनाए और अन्य क्षेत्रों में भी व्यापार बढ़ाए, तो भविष्य में ऐसे संकटों का असर कम किया जा सकता है. फिलहाल पश्चिम एशिया की स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर है, क्योंकि इसका प्रभाव ऊर्जा बाजार के साथ-साथ वैश्विक खाद्य व्यापार पर भी पड़ रहा है.