केला किसानों को नुकसान, 27000 रुपये टन से कीमत गिरकर पहुंची 11000 रुपये पर.. कब बढ़ेगा भाव
किसानों का कहना है कि खरीदारों की कमी के कारण बड़ी मात्रा में केला बिक नहीं पा रहा है और खेतों में ही खराब हो रहा है. एक एकड़ में खेती की लागत लगभग 1.5 लाख रुपये तक पहुंच जाती है और उत्पादन 15 से 20 टन होने की उम्मीद रहती है, लेकिन मौजूदा कीमतें इस लागत को पूरा नहीं कर पा रही हैं, जिससे खेती घाटे का सौदा बनती जा रही है.
Banana Price Fall: आंध्र प्रदेश के कडप्पा जिले के केले किसान इन दिनों भारी नुकसान झेल रहे हैं. बाजार में केले कीमतों में बार-बार तेज उतार-चढ़ाव हो रहा है. इससे उन्हें आर्थिकन नुकसान उठाना पड़ रहा है. जनवरी और फरवरी में कीमतें अच्छी थीं. तब मार्केट में केले का भाव 18,000 से 27,000 रुपये प्रति टन तक पहुंच गया था. लेकिन मार्च से निर्यात की मांग कम होने के बाद दाम तेजी से गिरने लगे. एक समय कीमतें गिरकर 6,000 से 9,000 रुपये प्रति टन तक पहुंच गईं. हालांकि, अब थोड़ा सुधार हुआ है और दाम फिर से बढ़ कर 10,000 से 11,000 रुपये प्रति टन तक पहुंच गए हैं. लेकिन किसानों का कहना है कि यह कीमत अभी भी उत्पादन लागत के मुकाबले काफी कम है, जिससे उन्हें नुकसान हो रहा है.
किसानों और अधिकारियों के अनुसार इस अस्थिरता के कई कारण हैं. इनमें पश्चिम एशिया में तनाव के कारण निर्यात पर असर शामिल है. बिचौलियों की भूमिका भी कीमतों को प्रभावित कर रही है. महाराष्ट्र और पुलिवेंडुला में एक साथ फसल की कटाई हो रही है. इसके अलावा मौसम का अनियमित होना भी एक बड़ा कारण है. हालांकि, जनवरी और फरवरी में कीमतें अच्छी थीं. तब कीमतें 18,000 से 27,000 रुपये प्रति टन तक पहुंच गई थीं, लेकिन मार्च से निर्यात मांग घटने के बाद दाम तेजी से गिरने लगे.
लगभग 25,000 एकड़ में इसकी खेती
द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिवेंदुला जिले में केले की खेती का सबसे बड़ा हिस्सा रखता है, जहां लगभग 25,000 एकड़ में इसकी खेती की जाती है. केवल लिंगाला मंडल में ही करीब 5,350 हेक्टेयर भूमि पर केला उगाया जाता है. यहां के केले अपनी बेहतर गुणवत्ता और लंबे समय तक टिकने की क्षमता के लिए जाने जाते हैं. यहां के केले 12 से 14 दिन तक सुरक्षित रहते हैं, जबकि अन्य क्षेत्रों में यह अवधि 8 से 10 दिन ही होती है. इसी वजह से इनकी मांग घरेलू और निर्यात दोनों बाजारों में बनी रहती है.
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इन राज्यों में होती है केले की सप्लाई
औसतन रोजाना 1,000 टन से ज्यादा केला दिल्ली, कोलकाता और श्रीनगर जैसे शहरों के साथ-साथ हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भेजा जाता है. इसके अलावा अरब देशों में भी निर्यात होता है, जहां रोजाना 10 से 16 ट्रक केले भेजे जाते हैं. हर ट्रक में लगभग 20 से 25 टन केला होता है, जिसे अनंतपुर जिले के ताड़िपत्री रेलवे स्टेशन के रास्ते मुंबई बंदरगाह तक पहुंचाया जाता है.
हालांकि उत्पादन अच्छा होने के बावजूद, अधिक ट्रांसपोर्ट लागत किसानों के मुनाफे को कम कर रही है. 20 टन केले की ढुलाई पर किसानों को 80,000 रुपये से 1.1 लाख रुपये तक खर्च करना पड़ता है, जो लगभग 6 से 8 रुपये प्रति किलो बैठता है. वहीं महाराष्ट्र के किसानों का ट्रांसपोर्ट खर्च केवल 2 से 3 रुपये प्रति किलो है, जिससे उन्हें फायदा मिलता है. महाराष्ट्र से जल्दी बाजार में फसल आने के कारण कडप्पा के केले की मांग भी प्रभावित हो रही है.
खरीदारों की कमी के कारण केला बिक नहीं पा रहा
किसानों का कहना है कि खरीदारों की कमी के कारण बड़ी मात्रा में केला बिक नहीं पा रहा है और खेतों में ही खराब हो रहा है. एक एकड़ में खेती की लागत लगभग 1.5 लाख रुपये तक पहुंच जाती है और उत्पादन 15 से 20 टन होने की उम्मीद रहती है, लेकिन मौजूदा कीमतें इस लागत को पूरा नहीं कर पा रही हैं, जिससे खेती घाटे का सौदा बनती जा रही है.
कीमतों में गिरावट का कारण निर्यात में रुकावट
उद्यानिकी विभाग के अधिकारी राघवेंद्र के अनुसार, कीमतों में गिरावट का कारण निर्यात में रुकावट और महाराष्ट्र में उत्पादन बढ़ना है. उन्होंने उम्मीद जताई है कि मांग बढ़ने के साथ आने वाले समय में कीमतों में सुधार हो सकता है. हालांकि किसान अभी भी इस स्थिति को लेकर आशंकित हैं. सिम्हाद्रिपुरम के किसान रामप्रसाद रेड्डी का आरोप है कि बिचौलिये वैश्विक कारणों का बहाना बनाकर कीमतों को दबा रहे हैं. फरवरी से अप्रैल के बीच फसल की चरम कटाई का समय होने के कारण, किसान अब उत्तर भारत से बढ़ती मांग पर अपनी उम्मीदें लगाए बैठे हैं.