बासमती निर्यातकों की सरकार से गुहार, 83 रुपये प्रति टन शुल्क हटाने की मांग, युद्ध के बीच बढ़ा संकट

भारतीय बासमती चावल का बड़ा बाजार मिडिल ईस्ट और यूरोप में है, जहां कीमत का बहुत महत्व होता है. ऐसे में जब लागत बढ़ती है, तो भारत की स्थिति पाकिस्तान जैसे देशों के मुकाबले कमजोर हो जाती है, क्योंकि वहां से चावल सस्ता पड़ सकता है. इससे भारतीय निर्यातकों के ऑर्डर कम होने का खतरा भी बढ़ जाता है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 17 Apr, 2026 | 09:40 AM

Basmati rice export: देश के बासमती चावल निर्यातकों के लिए इस समय हालात आसान नहीं हैं. पहले से ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे तनाव और युद्ध जैसी परिस्थितियों के कारण कारोबार प्रभावित है, और अब ऊपर से लगाया गया अतिरिक्त शुल्क उनकी परेशानी और बढ़ा रहा है. इसी वजह से निर्यातकों ने सरकार से इस शुल्क को हटाने या फिलहाल रोकने की मांग की है.

युद्ध का सीधा असर निर्यात कारोबार पर

अमेरिका-ईरान के बीच जारी तनाव और युद्ध जैसे हालात का असर अब बासमती चावल के निर्यात पर साफ दिखाई दे रहा है. निर्यातकों का कहना है कि शिपमेंट में देरी हो रही है, कई बार माल रास्ते में ही अटक जा रहा है या वापस लौटाना पड़ रहा है.

इसके अलावा भुगतान मिलने में भी देरी हो रही है, जिससे उनका पैसा लंबे समय तक फंसा रहता है. जहाजों का किराया (फ्रेट) बढ़ गया है, बीमा महंगा हो गया है और कई जगह ‘वार रिस्क सरचार्ज’ भी देना पड़ रहा है. इन सब वजहों से लागत बढ़ रही है और मुनाफा लगातार घट रहा है.

70 रुपये प्रति टन शुल्क बना भारी बोझ

बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, हरियाणा राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (HREA) के अध्यक्ष सुशील जैन ने 7 अप्रैल को एपीडा के चेयरमैन अभिषेक देव को पत्र लिखकर इस मुद्दे को उठाया है. उन्होंने बताया कि इस समय 70 रुपये प्रति टन का शुल्क लिया जा रहा है, जिस पर जीएसटी जोड़ने के बाद यह करीब 82-83 रुपये प्रति टन बैठता है.

भारत हर साल 60 लाख टन से ज्यादा बासमती चावल का निर्यात करता है. ऐसे में इस शुल्क से सालाना करीब 42 करोड़ रुपये से ज्यादा की वसूली होती है, जो निर्यातकों के लिए बहुत बड़ा खर्च बन गया है.

बड़े ऑर्डर पर करोड़ों का अतिरिक्त खर्च

निर्यातकों ने उदाहरण देकर समझाया कि अगर कोई व्यापारी 50,000 टन चावल निर्यात करता है, तो उसे करीब 41.3 लाख रुपये(जीएसटी सहित) शुल्क देना पड़ता है. अगर मात्रा 2 लाख टन हो जाए, तो यह खर्च बढ़कर करीब 1.65 करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है. ऐसे में जब पहले से ही मुनाफा कम हो, तो इतना अतिरिक्त खर्च संभालना काफी मुश्किल हो जाता है.

अन्य संगठनों ने भी जताई चिंता

इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन (IREF) ने भी इस मुद्दे पर सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है. IREF के बासमती डिवीजन के कार्यकारी अध्यक्ष राजीव सेतिया के अनुसार, अगस्त 2025 में इस शुल्क को 30 रुपये प्रति टन से बढ़ाकर 70 रुपये कर दिया गया था. जीएसटी जोड़ने के बाद यह और बढ़ गया है. उनका कहना है कि इससे निर्यातकों की लागत बढ़ गई है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो रहा है.

पाकिस्तान से बढ़ी प्रतिस्पर्धा

भारतीय बासमती चावल का बड़ा बाजार मिडिल ईस्ट और यूरोप में है, जहां कीमत का बहुत महत्व होता है. ऐसे में जब लागत बढ़ती है, तो भारत की स्थिति पाकिस्तान जैसे देशों के मुकाबले कमजोर हो जाती है, क्योंकि वहां से चावल सस्ता पड़ सकता है. इससे भारतीय निर्यातकों के ऑर्डर कम होने का खतरा भी बढ़ जाता है.

छोटे निर्यातकों पर ज्यादा असर

इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा असर छोटे और मध्यम निर्यातकों पर पड़ रहा है. ये निर्यातक ज्यादा मार्जिन पर काम नहीं करते, इसलिए अतिरिक्त खर्च उनके लिए बड़ी चुनौती बन जाता है. अगर यही स्थिति बनी रही, तो कई छोटे निर्यातक बाजार से बाहर हो सकते हैं.

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Published: 17 Apr, 2026 | 09:40 AM
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