भारतीय बासमती पर ब्रेक: 2000 करोड़ की चावल खेप बंदरगाहों पर अटकी, वजह बना ईरान का ये फैसला

नीति बदलते ही भारतीय निर्यातकों ने नई शिपमेंट रोक दी, लेकिन जो माल पहले ही भेजा जा चुका था, वह बंदरगाहों पर फंस गया. बताया जा रहा है कि करीब 2000 करोड़ रुपये मूल्य का बासमती चावल ईरान से क्लियरेंस का इंतजार कर रहा है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 10 Jan, 2026 | 07:59 AM

Rice export to Iran: भारत के चावल निर्यात के लिए ईरान हमेशा एक भरोसेमंद और बड़ा बाजार रहा है, खासतौर पर प्रीमियम बासमती चावल के लिए. लेकिन जनवरी की शुरुआत में ईरान सरकार के एक अहम फैसले ने भारतीय निर्यातकों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. ईरान ने खाने-पीने के सामानों के आयात पर दी जाने वाली सब्सिडी वाले एक्सचेंज रेट को खत्म कर दिया है. इसका सीधा असर भारत से भेजे गए बासमती चावल पर पड़ा है और करीब 2000 करोड़ रुपये की खेप अंतरराष्ट्रीय बंदरगाहों पर अटक गई है.

भारत का चावल निर्यात और ईरान की अहमियत

भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है. हर साल भारत से 160 से ज्यादा देशों में चावल जाता है. नॉन-बासमती चावल की बात करें तो बांग्लादेश, नेपाल, अफ्रीकी और कुछ एशियाई देश बड़े खरीदार हैं, जबकि बासमती चावल के लिए ईरान, इराक और सऊदी अरब जैसे देश अहम बाजार माने जाते हैं. वैश्विक स्तर पर जहां करीब 4.5 करोड़ टन चावल का व्यापार होता है, उसमें अकेले भारत की हिस्सेदारी लगभग आधी है. ऐसे में ईरान जैसे बाजार में रुकावट आना भारतीय व्यापार के लिए बड़ा झटका है.

ईरान की करेंसी गिरी, बदली आयात नीति

दरअसल, ईरान की मुद्रा रियाल अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई है. इससे सरकार पर आर्थिक दबाव काफी बढ़ गया. इसी दबाव के बीच ईरानी सरकार ने यह तय किया कि अब आयात पर सब्सिडी देने के बजाय वह सीधे अपने नागरिकों को मदद देगी. इसके तहत खाने-पीने के सामानों के लिए मिलने वाला सब्सिडी एक्सचेंज रेट बंद कर दिया गया. इस फैसले के बाद आयातित खाद्य वस्तुएं अचानक महंगी हो गईं.

2000 करोड़ की खेप क्यों अटकी?

नीति बदलते ही भारतीय निर्यातकों ने नई शिपमेंट रोक दी, लेकिन जो माल पहले ही भेजा जा चुका था, वह बंदरगाहों पर फंस गया. बताया जा रहा है कि करीब 2000 करोड़ रुपये मूल्य का बासमती चावल ईरान से क्लियरेंस का इंतजार कर रहा है. नई व्यवस्था में आयातकों को पूरा टैक्स और शुल्क चुकाना होगा, जिससे लागत बहुत बढ़ रही है. ऐसे में ईरानी खरीदार भी पीछे हट रहे हैं और सौदे अटके हुए हैं.

सब्सिडी हटने का सीधा असर व्यापार पर

सब्सिडी खत्म होने से भारतीय निर्यातकों का मुनाफा सीधे प्रभावित हुआ है. पहले सब्सिडी वाले रेट से कीमतें काबू में रहती थीं, लेकिन अब वही चावल ईरान में आम लोगों की पहुंच से बाहर हो सकता है. इससे मांग घटने का खतरा है. इसका असर सिर्फ व्यापारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों के किसानों और राइस मिलर्स पर भी पड़ेगा, जहां बासमती की खेती बड़े पैमाने पर होती है.

ईरान सरकार की दलील क्या है?

ईरान सरकार का कहना है कि आयात पर दी जाने वाली सब्सिडी का फायदा आम जनता तक नहीं पहुंच रहा था. कई बार इसका दुरुपयोग होता था और बाजार में महंगाई व कालाबाजारी बढ़ जाती थी. इसी वजह से सरकार ने तय किया कि सब्सिडी का पैसा सीधे लोगों के खातों में डाला जाएगा. अगले कुछ महीनों तक हर नागरिक को तय रकम देने की योजना बनाई गई है, ताकि लोग अपनी जरूरत के हिसाब से सामान खरीद सकें.

भारतीय निर्यातकों की चिंता

भारतीय निर्यातकों का मानना है कि यह फैसला अचानक लिया गया, जिससे उन्हें संभलने का मौका नहीं मिला. पहले भी अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान के साथ व्यापार आसान नहीं रहा है. कभी बार्टर सिस्टम, कभी सीमित बैंकिंग चैनलों के जरिए कारोबार चला. अब नई नीति ने हालात और मुश्किल बना दिए हैं.

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