Rice exports India: भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है और वैश्विक बाजार में उसकी मजबूत पहचान बनी हुई है. लेकिन बदलते अंतरराष्ट्रीय हालात, बढ़ती लागत और पर्यावरण से जुड़ी चुनौतियों के बीच चावल निर्यातकों को अब सरकार से अतिरिक्त सहारे की उम्मीद है. इसी कड़ी में भारतीय चावल निर्यातक महासंघ ने आगामी आम बजट 2026 में सेक्टर के लिए विशेष रियायतों की मांग की है, ताकि निर्यात की रफ्तार बनी रहे और भारत की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति और मजबूत हो सके.
भारत की वैश्विक पकड़ और आर्थिक अहमियत
बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, चावल निर्यात भारत के लिए केवल व्यापार नहीं, बल्कि रणनीतिक आर्थिक ताकत भी है. वैश्विक चावल व्यापार में भारत की हिस्सेदारी करीब 40 प्रतिशत है. वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने लगभग 20.1 मिलियन टन चावल का निर्यात किया, जो 170 से अधिक देशों तक पहुंचा. इससे न सिर्फ किसानों की आय को सहारा मिला, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार भी बढ़ा. निर्यात से मिलने वाली विदेशी मुद्रा ने देश की आर्थिक मजबूती और कूटनीतिक प्रभाव को भी बढ़ाया है.
बढ़ती चुनौतियां, घटता मुनाफा
हालांकि, इस मजबूत स्थिति के बावजूद चावल निर्यात सेक्टर कई मुश्किलों से जूझ रहा है. प्रमुख धान उत्पादक राज्यों में भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है. इसके अलावा सरकारी खरीद, भंडारण और लॉजिस्टिक्स की लागत भी लगातार बढ़ रही है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों का उतार-चढ़ाव और परिवहन खर्च में अस्थिरता निर्यातकों के मुनाफे पर असर डाल रही है. ऐसे में निर्यातकों का मानना है कि बिना सरकारी सहयोग के वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिके रहना मुश्किल हो सकता है.
बजट से क्या चाहते हैं निर्यातक
चावल निर्यातक महासंघ (IREF) ने सरकार से निर्यात ऋण पर 4 प्रतिशत ब्याज सब्सिडी देने की मांग की है, जिससे कार्यशील पूंजी की लागत कम हो सके. खासतौर पर छोटे और मझोले निर्यातकों के लिए यह राहत बेहद जरूरी मानी जा रही है. इसके साथ ही सड़क और रेल परिवहन के जरिए बंदरगाहों तक चावल पहुंचाने पर 3 प्रतिशत फ्रेट सपोर्ट देने की भी मांग रखी गई है. निर्यातकों का कहना है कि इससे लॉजिस्टिक्स खर्च घटेगा और दूर-दराज के उत्पादन क्लस्टरों को भी फायदा मिलेगा.
खेती पर प्रोत्साहन की मांग
निर्यातक संगठन का जोर सिर्फ लागत घटाने पर नहीं, बल्कि टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने पर भी है. उनका सुझाव है कि जल संरक्षण और कम उत्सर्जन वाली तकनीकों को अपनाने वाले किसानों और मिलों को टैक्स व निवेश प्रोत्साहन दिए जाएं. वैकल्पिक सिंचाई पद्धतियां, डायरेक्ट सीडेड राइस और ऊर्जा दक्ष मिलिंग जैसी तकनीकें लंबे समय में पर्यावरण और उत्पादन दोनों के लिए फायदेमंद हो सकती हैं.
उच्ची कीमत वाली किस्मों पर फोकस
महासंघ ने यह भी कहा है कि बजट के जरिए प्रीमियम बासमती, जीआई टैग वाली और ऑर्गेनिक चावल किस्मों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. इससे किसानों को बेहतर दाम मिलेंगे और MSP पर सरकारी दबाव भी कम होगा. साथ ही भारत की छवि एक गुणवत्तापूर्ण और भरोसेमंद निर्यातक के रूप में और मजबूत होगी.
निर्यात स्थिरता की ओर कदम
वहीं, चावल निर्यातक चाहते हैं कि बजट 2026-27 में ऐसे फैसले हों, जो लागत घटाने, टिकाऊ खेती बढ़ाने और निर्यात को स्थिर बनाए रखने में मदद करें. यदि सरकार इन सुझावों पर ध्यान देती है, तो भारत न सिर्फ वैश्विक चावल बाजार में अपनी बादशाहत कायम रख पाएगा, बल्कि किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी लंबे समय तक मजबूती मिलेगी.