इंडिया-यूएस ट्रेड डील में दालों पर सस्पेंस बरकरार, लेकिन बातचीत अब भी जारी… जानें आखिर चल क्या रहा है?

6 फरवरी को जारी संयुक्त बयान में दालों का जिक्र नहीं था, लेकिन बाद में व्हाइट हाउस की फैक्टशीट में “कुछ दालों” का नाम शामिल हो गया. इस बात को लेकर देश में बहस शुरू हो गई. कुछ किसान संगठनों ने चिंता जताई कि अगर सस्ती विदेशी दालें बड़े पैमाने पर आएंगी तो घरेलू किसानों को नुकसान हो सकता है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 18 Feb, 2026 | 07:49 AM

India US trade deal: भारत और अमेरिका के बीच हो रहे अंतरिम व्यापार समझौते को लेकर इन दिनों खूब चर्चा हो रही है. खासतौर पर दालों को लेकर मामला थोड़ा उलझा हुआ नजर आ रहा है. पहले व्हाइट हाउस की फैक्टशीट में भारतीय दालों का जिक्र आया, फिर उसे हटा दिया गया. इसके बाद लोगों के मन में सवाल उठने लगे कि क्या दालें अब इस समझौते से बाहर हो गई हैं? लेकिन हकीकत यह है कि दालों पर बातचीत अभी भी जारी है, बस अंतिम फैसला नहीं हुआ है.

दालें बाहर नहीं, चर्चा अभी बाकी

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, दालों को लेकर दोनों देशों के बीच अभी कोई पक्की सहमति नहीं बनी है. अगले हफ्ते वॉशिंगटन में भारत और अमेरिका की टीमें आमने-सामने बैठकर बातचीत करेंगी. माना जा रहा है कि वहीं तय होगा कि किन कृषि उत्पादों पर टैरिफ कम किया जाएगा या खत्म किया जाएगा.

6 फरवरी को जारी संयुक्त बयान में दालों का जिक्र नहीं था, लेकिन बाद में व्हाइट हाउस की फैक्टशीट में “कुछ दालों” का नाम शामिल हो गया. इस बात को लेकर देश में बहस शुरू हो गई. कुछ किसान संगठनों ने चिंता जताई कि अगर सस्ती विदेशी दालें बड़े पैमाने पर आएंगी तो घरेलू किसानों को नुकसान हो सकता है. विवाद बढ़ने के बाद फैक्टशीट से दालों का जिक्र हटा दिया गया.

हालांकि, जानकारों का कहना है कि कृषि व्यापार में सैकड़ों उत्पाद शामिल होते हैं. हर चीज का नाम हर दस्तावेज में होना जरूरी नहीं होता. इसलिए केवल फैक्टशीट से नाम हटने का मतलब यह नहीं है कि दालों पर चर्चा खत्म हो गई है.

सरकार का पक्ष क्या है?

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस मुद्दे पर खुलकर अपनी बात रखी है. उन्होंने कहा कि भारत गेहूं, चावल और मक्का जैसे अनाज में आत्मनिर्भर है, इसलिए इनका आयात करने की जरूरत नहीं है. लेकिन दालों के मामले में स्थिति अलग है.

उन्होंने साफ कहा कि देश में दालों की खपत उत्पादन से ज्यादा है. ऐसे में अगर जरूरत के हिसाब से आयात किया जाता है तो उसका विरोध क्यों? उनका कहना है कि सरकार का मकसद किसानों को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि देश की जरूरत पूरी करना है.

किसानों की चिंता भी जायज

दूसरी तरफ किसानों की चिंता भी समझी जा सकती है. अगर विदेश से सस्ती दालें आती हैं तो बाजार में कीमतें गिर सकती हैं. इससे स्थानीय किसानों को अपनी उपज का सही दाम नहीं मिल पाएगा. यही वजह है कि कुछ किसान संगठनों ने इस मुद्दे पर सवाल उठाए हैं.

लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि दालों का आयात कोई नई बात नहीं है. भारत कई सालों से मसूर जैसी दालें अमेरिका और अन्य देशों से खरीदता रहा है. जब देश में उत्पादन कम होता है या कीमतें ज्यादा बढ़ जाती हैं, तब आयात से बाजार संतुलित किया जाता है ताकि आम उपभोक्ता को राहत मिल सके.

फिलहाल स्थिति यह है कि दालों पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है. बातचीत जारी है और आने वाले दिनों में स्थिति साफ हो सकती है. यह समझौता केवल दालों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कई अन्य कृषि और औद्योगिक उत्पाद भी शामिल हैं.

Get Latest   Farming Tips ,  Crop Updates ,  Government Schemes ,  Agri News ,  Market Rates ,  Weather Alerts ,  Equipment Reviews and  Organic Farming News  only on KisanIndia.in

आम में सबसे ज्यादा पाया जाने वाला विटामिन कौन सा है?