सिर्फ 10 रुपये में नीलगाय से बचाएं फसल, प्रोफेसर एसके सिंह ने बताया असरदार देसी उपाय
देश के कई राज्यों में किसान नीलगाय से फसल नुकसान की समस्या झेल रहे हैं. अब कृषि विशेषज्ञों ने बेहद सस्ता और आसान देसी उपाय बताया है, जिससे खेतों को सुरक्षित रखा जा सकता है. यह तरीका कम खर्च वाला, प्राकृतिक और किसानों के लिए काफी उपयोगी माना जा रहा है, जिससे फसल नुकसान कम हो सकता है.
Nilgai Control: देश के कई राज्यों में किसान इन दिनों नीलगाय के आतंक से परेशान हैं. खेतों में घुसकर नीलगाय फसलों को भारी नुकसान पहुंचा रही हैं, जिससे किसानों को हर साल हजारों रुपये का नुकसान उठाना पड़ता है. खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश के किसानों के लिए यह बड़ी समस्या बन चुकी है. डॉ. एस के सिंह (Dr SK Singh) के अनुसार अब किसानों के लिए एक बेहद सस्ता और आसान देसी उपाय सामने आया है, जिसकी मदद से बिना किसी महंगे खर्च के नीलगाय को खेतों से दूर रखा जा सकता है. प्रोफेसर का कहना है कि यह तरीका काफी असरदार साबित हो रहा है और कई किसानों को इसका फायदा भी मिला है.
सड़े अंडे से तैयार होता है नीलगाय भगाने वाला घोल
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (Dr. Rajendra Prasad Central Agricultural University) के प्रोफेसर डॉ. एस के सिंह ने बताया कि इस देसी तकनीक में बहुत कम खर्च आता है और किसान इसे आसानी से घर पर तैयार कर सकते हैं. इसके लिए केवल दो सड़े हुए अंडे, 15 लीटर पानी और एक प्लास्टिक की बाल्टी या ड्रम की जरूरत होती है. सबसे पहले सड़े अंडों को पानी में अच्छी तरह मिलाया जाता है. इसके बाद इस मिश्रण को ढककर 5 से 10 दिनों तक छायादार जगह पर रखा जाता है. कुछ दिनों बाद इसमें तेज दुर्गंध पैदा हो जाती है. यही गंध नीलगाय को खेतों के पास आने से रोकती है. तैयार घोल को हर 15 दिन में खेत की मेड़ों पर छिड़का जाता है. खासकर उस दिशा में जहां से नीलगाय खेत में प्रवेश करती है. ध्यान रखने वाली बात यह है कि इस घोल को सीधे फसल पर नहीं डालना चाहिए. इसका इस्तेमाल केवल खेत की जमीन और मेड़ों पर करना चाहिए.
क्यों असरदार माना जा रहा है ये तरीका
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार नीलगाय पूरी तरह शाकाहारी जानवर है और उसे सड़ी हुई या तेज बदबू वाली चीजें बिल्कुल पसंद नहीं होतीं. सड़े अंडे की गंध नीलगाय को खेतों से दूर रखने में मदद करती है. यही कारण है कि यह घोल प्राकृतिक रिपेलेंट की तरह काम करता है. इस तकनीक का फायदा केवल नीलगाय तक सीमित नहीं है. बंदर जैसे दूसरे जानवर भी इस गंध से खेतों के पास आने से बचते हैं. सबसे अच्छी बात ये है कि इस उपाय में किसी रासायनिक दवा का इस्तेमाल नहीं होता. इससे मिट्टी और फसल को कोई नुकसान नहीं पहुंचता. कम लागत और आसान उपयोग की वजह से यह तरीका छोटे किसानों के लिए भी काफी फायदेमंद माना जा रहा है.
केला की फसल बचाने में मिला अच्छा परिणाम
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय में चल रही अनुसंधान परियोजना के दौरान इस तकनीक का इस्तेमाल केला की फसल को बचाने के लिए किया गया. जानकारी के अनुसार नीलगाय अक्सर केले के गुच्छों को नुकसान पहुंचाती है. इससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान होता है. इस समस्या से बचने के लिए खेत की मेड़ों पर सड़े अंडे के घोल का छिड़काव किया गया. साथ ही केले के गुच्छों को मोटे काले पॉलीथिन से ढक दिया गया ताकि नीलगाय उन्हें देख न सके. इस तरीके से केला की फसल को काफी हद तक सुरक्षित रखने में सफलता मिली. इससे किसानों को नुकसान कम हुआ और उत्पादन बच गया.
किसानों के लिए राहत का आसान और सस्ता तरीका
इस देसी तकनीक की सबसे बड़ी खासियत इसकी कम लागत है. केवल 10 रुपये के खर्च में किसान अपनी फसल को नीलगाय से बचा सकते हैं. इसमें किसी महंगे उपकरण या बाजार से खरीदी जाने वाली दवा की जरूरत नहीं होती. किसान घर में उपलब्ध सामान से ही यह घोल तैयार कर सकते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि खेत के चारों ओर लगातार इस घोल का इस्तेमाल करने से नीलगाय के खेत में घुसने की संभावना काफी कम हो जाती है. बारिश के मौसम में दोबारा छिड़काव करना जरूरी माना गया है, क्योंकि पानी से गंध का असर कम हो सकता है. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक नीलगाय की समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं निकलता, तब तक ऐसे देसी और सस्ते उपाय किसानों के लिए बड़ी राहत साबित हो सकते हैं.