यूरिया के दामों में जोरदार उछाल, भारत को दोगुनी कीमत पर खरीदनी पड़ रही खाद… किसानों पर बढ़ सकता है बोझ
हाल ही में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव, खासकर अमेरिका-इजराइल द्वारा ईरान पर हमले के बाद वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई है. इसी वजह से उर्वरकों की कीमतों में तेजी आई है. भारत, जो दुनिया का सबसे बड़ा यूरिया आयातक है, उसे अब पहले की तुलना में काफी महंगी दरों पर यूरिया खरीदना पड़ रहा है.
India urea import 2026: भारत में खेती-किसानी की रीढ़ मानी जाने वाली खाद (उर्वरक) एक बार फिर चर्चा में है. इस बार वजह है अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती कीमतें और सप्लाई में आई बाधा. ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत को अब यूरिया पहले के मुकाबले लगभग दोगुनी कीमत पर खरीदना पड़ रहा है, जिसका सीधा असर किसानों और सरकार दोनों पर पड़ सकता है.
अंतरराष्ट्रीय हालात का असर भारत पर
हाल ही में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव, खासकर अमेरिका-इजराइल द्वारा ईरान पर हमले के बाद वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई है. इसी वजह से उर्वरकों की कीमतों में तेजी आई है. भारत, जो दुनिया का सबसे बड़ा यूरिया आयातक है, उसे अब पहले की तुलना में काफी महंगी दरों पर यूरिया खरीदना पड़ रहा है.
युद्ध से पहले पश्चिम एशिया से मिलने वाला यूरिया लगभग 490 डॉलर प्रति टन के आसपास मिल रहा था, लेकिन अब यही कीमत बढ़कर 935 से 959 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई है. यानी कीमतों में लगभग 90 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो चुकी है.
भारत ने कितनी मात्रा में खरीद का फैसला किया
बिजनेस स्टैंडर्ड की खबर के अनुसार, सरकारी एजेंसी इंडियन पोटाश लिमिटेड के जरिए भारत सरकार ने बड़ी मात्रा में यूरिया खरीदने का निर्णय लिया है. जानकारी के अनुसार लगभग 25 लाख टन यूरिया आयात किया जाएगा. इसमें से 15 लाख टन पश्चिमी तट पर 935 डॉलर प्रति टन के हिसाब से और 10 लाख टन पूर्वी तट पर 959 डॉलर प्रति टन के हिसाब से डिलीवर होगा. हालांकि यह टेंडर अभी औपचारिक रूप से अंतिम नहीं हुआ है, लेकिन उम्मीद है कि इसे जल्द ही मंजूरी मिल जाएगी.
क्यों बढ़ रही हैं कीमतें
यूरिया की कीमतों में बढ़ोतरी के पीछे सबसे बड़ी वजह सप्लाई में रुकावट है. उर्वरक उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस की जरूरत होती है, जो मुख्य रूप से पश्चिम एशिया से आती है. लेकिन हाल के तनाव के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास आवाजाही प्रभावित हुई है.
इस क्षेत्र से दुनिया की करीब 45 प्रतिशत यूरिया सप्लाई गुजरती है. ऐसे में थोड़ी सी भी बाधा पूरे बाजार को प्रभावित कर देती है. कई उत्पादन इकाइयों को भी अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा, जिससे सप्लाई और कम हो गई.
किसानों और खेती पर असर
यह समय भारत के लिए बेहद अहम है क्योंकि मानसून के साथ खरीफ फसलों की बुवाई शुरू होने वाली है. धान, मक्का और सोयाबीन जैसी फसलों के लिए यूरिया की जरूरत बहुत अधिक होती है. ऐसे में महंगे यूरिया का असर खेती की लागत पर पड़ सकता है. हालांकि सरकार किसानों को सब्सिडी देती है, लेकिन इतनी बड़ी कीमत बढ़ोतरी का असर सरकारी खजाने पर भी पड़ेगा. अगर स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो आने वाले समय में खाद की उपलब्धता और कीमत दोनों चिंता का विषय बन सकते हैं.
वैश्विक बाजार में तेजी
युद्ध शुरू होने के बाद से वैश्विक स्तर पर यूरिया की कीमतों में लगातार उछाल देखा जा रहा है. कई देशों में सप्लाई की कमी के कारण प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है, जिससे कीमतें और ऊपर जा सकती हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पश्चिम एशिया में हालात जल्दी सामान्य नहीं हुए तो उर्वरक बाजार में और अस्थिरता देखने को मिल सकती है.
आगे की रणनीति
भारत सरकार अब अन्य देशों और सप्लायर्स से सीधे समझौते करने की कोशिश कर रही है, ताकि उर्वरकों की नियमित सप्लाई सुनिश्चित की जा सके. साथ ही नाइट्रोजन और फॉस्फेट आधारित उर्वरकों के विकल्पों पर भी काम किया जा रहा है.