खुशबू के लिए मशहूर है ‘जम्मू बासमती’.. 120 दिनों में तैयार हो जाती है फसल.. स्वाद भी लाजवाब
जम्मू-कश्मीर में इस बार खरीफ धान की बुवाई तेजी से चल रही है, जिसमें जम्मू बासमती की खास भूमिका है. आरएस पुरा सहित कई क्षेत्रों में इसकी खेती होती है. उपजाऊ मिट्टी, चिनाब नदी और अनुकूल जलवायु इसे खास बनाते हैं. 2016 में इसे GI टैग मिला, जिससे वैश्विक पहचान मिली.
Basmati Farming: पंजाब, हरियाणा सहित पूरे देश में खरीफ धान की बुवाई शुरू हो गई है. अलग-अलग राज्यों में किसान धान की अलग-अलग किस्मों की बुवाई कर रहे हैं. जम्मू-कश्मीर में इस बार किसान बड़े स्तर पर धान बुवाई की तैयारी में लगे हुए हैं. हालांकि, ऐसे लोगों को लगता है कि जम्मू-कश्मीर में किसान सिर्फ सेब और ड्राई फ्रूट ही उगाते हैं, लेकिन ऐसी बात नहीं है. यहां पर किसान धान की भी बड़े स्तर पर खेती करते हैं. यहां पर उगाए जाने वाले मशहूर जम्मू बासमती चावल को जीआई टैग भी मिला है. तो आइए आज जानते हैं जम्मू बासमती की खासियत के बारे में.
जम्मू क्षेत्र में जम्मू बासमती चावल की खेती बड़े पैमाने पर होती है. खासकर उत्तर-पश्चिम में छंब क्षेत्र से लेकर दक्षिण में कठुआ जिले के लखनपुर तक करीब 60,000 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन पर जम्मू बासमती की खेती की जाती है. यहां पर बासमती की 12 से अधिक किस्में उगाई जाती हैं, जिनमें 370, 1121 और RH30 जैसी प्रमुख किस्में शामिल हैं. जम्मू बासमती की सबसे बड़ी खासियत इसकी सुगंध है, जो इसे दुनिया की दूसरी किस्मों से अलग बनाती है. इसके पौधे आमतौर पर लंबे होते हैं और इसका चावल मध्यम आकार का होता है.
चिनाब नदी है किसानों के लिए वरदान
जम्मू में बासमती चावल की खेती की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और यह यहां की संस्कृति और अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है. उपजाऊ जमीन और अच्छी जलवायु के कारण आरएस पुरा क्षेत्र बासमती की खेती के लिए खास माना जाता है. यहां से बहने वाली चिनाब नदी खेतों को पानी उपलब्ध कराती है, जिससे धान की खेती को लंबे समय से सहारा मिलता रहा है. चिनाब नदी से आने वाली उपजाऊ मिट्टी इस क्षेत्र में अच्छे बासमती चावल के उत्पादन में बहुत मदद करती है. यह मिट्टी खेती के लिए काफी उपयुक्त होती है. यहां का मौसम, तापमान और धूप भी मिलकर चावल के दानों को खास बनाते हैं. इसी वजह से आरएस पुरा बासमती चावल की गुणवत्ता बहुत अच्छी मानी जाती है और इसकी मांग देश-विदेश में काफी ज्यादा है.
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जून में तैयार की जाती है नर्सरी
धान की खेती की शुरुआत जून के पहले पखवाड़े में नर्सरी तैयार करने से होती है. इसमें बीजों को सीधे खेत में न बोकर छोटी क्यारियों में बोया जाता है. इसके लिए क्यारियों को पहले अच्छी तरह तैयार किया जाता है और उनमें जैविक खाद मिलाई जाती है ताकि पौधे अच्छे से विकसित हो सकें. इसके बाद जून के मध्य से जुलाई तक जब पौधे लगभग 1 से 2 फीट तक बढ़ जाते हैं, तब मुख्य खेत की तैयारी की जाती है. इस दौरान खेत में पानी भरकर जुताई की जाती है, जिसे कद्दो या पडलिंग कहा जाता है. इससे मिट्टी नरम और कीचड़ जैसी हो जाती है, जिससे धान की रोपाई आसानी से की जा सकती है.
120 दिनों में तैयार हो जाती है फसल
धान की खेती में जून-जुलाई के दौरान नर्सरी से तैयार छोटे पौधों को सावधानीपूर्वक निकालकर मुख्य खेत में रोपा जाता है. रोपाई के समय कतारों के बीच उचित दूरी रखी जाती है ताकि पौधों को बढ़ने के लिए पर्याप्त जगह मिल सके. इसके बाद जल प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया जाता है. रोपाई के शुरुआती 15 से 20 दिनों तक खेत में 2 से 3 इंच पानी बनाए रखना जरूरी होता है, जिससे पौधे सुरक्षित रहते हैं और उनकी जड़ें मजबूत होती हैं. जुलाई-अगस्त में फसल की बेहतर बढ़वार के लिए जरूरत के अनुसार यूरिया, पोटाश और जिंक जैसे उर्वरकों का उपयोग कृषि विशेषज्ञों की सलाह से किया जाता है. फसल आमतौर पर 120 से 150 दिनों में तैयार हो जाती है. अक्टूबर-नवंबर में जब धान की बालियां सुनहरी हो जाती हैं और नमी कम हो जाती है, तब इसकी कटाई की जाती है. कटाई के बाद दानों को धूप में अच्छी तरह सुखाया जाता है.
60,000 हेक्टेयर में किसान करते हैं खेती
जम्मू क्षेत्र अपने बेहतरीन बासमती चावल के लिए दुनिया भर में जाना जाता है. यहां बासमती की खेती का मुख्य केंद्र आरएस पुरा है. आंकड़ों के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में बासमती की खेती लगभग 46,000 से 60,000 हेक्टेयर क्षेत्र में की जाती है. इसमें सबसे ज्यादा उत्पादन जम्मू, कठुआ और सांबा जिलों से होता है. अकेले आरएस पुरा क्षेत्र में करीब 30,000 हेक्टेयर में जम्मू बासमती धान की खेती होती है. उत्पादन की बात करें तो जम्मू क्षेत्र में हर साल लगभग 1.6 लाख मीट्रिक टन बासमती चावल का उत्पादन होता है. यहां कई किस्मों की खेती होती है, जिनमें पारंपरिक बासमती-370 सबसे प्रमुख है. इसके अलावा बासमती 1121, CSR 30 और कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित नई किस्में जैसे ‘जम्मू बासमती 118’ और ‘जम्मू बासमती 123’ भी किसानों द्वारा उगाई जा रही हैं. ऐसे जम्मू बासमती चावल को 5 फरवरी 2016 को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्रदान किया गया. इस मान्यता के बाद जम्मू बासमती को उसकी विशेष गुणवत्ता और पहचान के लिए आधिकारिक रूप से संरक्षण मिला.
खबर से जुड़े मुख्य आंकड़े
- जम्मू बासमती को साल 2016 में मिला जीआई टैग का दर्जा
- 60,000 हेक्टेयर है जम्मू बासमती का रकबा
- आरएस पुरा क्षेत्र में सबसे अधिक होती है खेती
- सलाना लगभग 1.6 लाख मीट्रिक टन है उत्पादन
- 120 दिनों में तैयार हो जाती है फसल
- चावल के दाने आकार में होते हैं लंबे