बासमती को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से चली आ रही जंग के बारे में ज्यादातर लोग जानते हैं. बासमती को जीआई टैग मिलने की लड़ाई यूरोपीय सहित तमाम देशों के साथ चली आ रही है. अब यूरोपियन यूनियन के मामले में लड़ाई में नया ट्विस्ट आ गया है. इस लड़ाई में कश्मीर की एंट्री हो गई है. दरअसल, पिछले दिनों पाकिस्तान और यूरोपियन यूनियन ने एक साझा बयान दिया. यह बयान कश्मीर को लेकर था, जिसमें संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों का उल्लेख किया गया. भारत ने इसी पर सख्त आपत्ति जताई है.
संकेत यह मिल रहे हैं कि इस साझा बयान के जवाब में भारत यूरोपीय संघ को वाइन, स्पिरिट और चीज जैसी चीजों के लिए दी हुई विशेष जीआई सुविधा हटा सकता है. अगर भारत ने यह कदम उठाया, तो जवाबी कार्रवाई में भारत का जो नुकसान होगा, वो खासतौर पर बासमती चावल के इर्द–गिर्द है.
1 जून को पाकिस्तान और यूरोपीय संघ की बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में दोनों पक्षों ने जम्मू–कश्मीर मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों का उल्लेख किया था. भारत ने इसे अपने आंतरिक मामलों में दखल माना है. इसी के बाद व्यापार और जीआई वार्ताओं पर भी इसका असर दिखाई देने लगा है.
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लंबी है भारत और पाकिस्तान के बीच बासमती की लड़ाई
भारत ने 2018 में यूरोपीय संघ में बासमती चावल के लिए जीआई टैग का आवेदन किया था. पाकिस्तान लगातार इसका विरोध कर रहा है और दावा करता है कि बासमती दोनों देशों की साझा विरासत है. विशेषज्ञों का कहना है कि कश्मीर को लेकर यूरोपीय संघ की हालिया स्थिति भारत के आवेदन को और जटिल बना सकती है. पाकिस्तान स्वयं भी यूरोपीय संघ में बासमती के लिए जीआई आवेदन कर चुका है.
केवल बासमती तक सीमित नहीं है. पाकिस्तान चाहता है कि जम्मू–कश्मीर क्षेत्र को बासमती उत्पादन क्षेत्र के रूप में मान्यता मिले, जबकि भारत इसे अपने संप्रभु अधिकारों से जुड़ा विषय मानता है. यही कारण है कि जीआई विवाद अब कृषि उत्पादों के दायरे से निकलकर कूटनीतिक टकराव का रूप ले चुका है.
दो हजार करोड़ के बाजार पर है संकट
दांव भी छोटा नहीं है. यूरोप में बासमती का बाजार लगभग 2000 करोड़ रुपये का माना जाता है. यूरोपीय संघ भारतीय बासमती का एक महत्वपूर्ण बाजार है. भारत का तर्क है कि बासमती की ऐतिहासिक पहचान, खेती की परंपरा और उत्पादन का बड़ा हिस्सा भारतीय क्षेत्रों से जुड़ा है. दूसरी ओर पाकिस्तान साझा विरासत का हवाला देकर अधिकार मांग रहा है.
अंग्रेजी अखबार बिजनेसलाइन के मुताबिक वाइन, स्पिरिट और चीजों जैसों का भारत में बाजार नौ हजार करोड़ रुपए के करीब है. इसलिए अगर मामला फंसता है तो भारत के मुकाबले यूरोपियन यूनियन का घाटा ज्यादा है. हालांकि इसमें यह बात समझनी पड़ेगी कि बासमती व्यापारियों के लिए यूरोपियन बाजार में कमी का मतलब बड़ा घाटा होगा.
विवाद से पड़ सकता है मुक्त व्यापार समझौते की बातचीत पर असर
यूरोपीय संघ के साथ प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की बातचीत भी इस विवाद से प्रभावित हो सकती है. विश्लेषकों का मानना है कि यदि कश्मीर मुद्दा व्यापारिक चर्चाओं में प्रवेश करता है, तो भारत के लिए जीआई मान्यता हासिल करना और कठिन हो सकता है.
दिलचस्प बात यह है कि भारत केवल बासमती ही नहीं, बल्कि दार्जिलिंग चाय, मदिरा और कुछ डेयरी उत्पादों के जीआई संरक्षण को लेकर भी यूरोपीय संघ से व्यापक समझौता चाहता है. ऐसे में बासमती विवाद दोनों पक्षों के बीच जीआई अधिकारों की बड़ी जंग का प्रतीक बन गया है.
कुल मिलाकर, बासमती की लड़ाई अब सिर्फ चावल की खुशबू तक सीमित नहीं रही. कश्मीर विवाद के साये में यह भारत, पाकिस्तान और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार, कूटनीति और संप्रभुता के टकराव का नया मैदान बनती दिख रही है.