चीनी के बढ़ते दाम के बीच किसानों की बड़ी मांग, गुड़ और अनाज से इथेनॉल बनाने की मिले मंजूरी

त्योहारी सीजन से पहले चीनी की कीमतों में तेजी के बीच कर्नाटक के गन्ना किसानों ने गुड़ इकाइयों को इथेनॉल बनाने की अनुमति देने की मांग की है. किसानों का कहना है कि इससे उनकी आय बढ़ सकती है. कर्नाटक में हर साल करीब 135 करोड़ लीटर इथेनॉल बनता है. राज्य उत्पादन के मामले में महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के बाद तीसरे स्थान पर है.

नोएडा | Updated On: 14 Sep, 2026 | 10:31 AM

त्योहारी सीजन से पहले चीनी की कीमतों में तेजी आई है. गौरी-गणेश उत्सव के बाद दशहरा और दिवाली तक चीनी की मांग बढ़ने की उम्मीद है. इसी बीच गन्ने को इथेनॉल उत्पादन में भेजे जाने की खबरों ने किसानों की पुरानी मांग को फिर से तेज कर दिया है. किसान अब गुड़ बनाने वाली इकाइयों और अनाज आधारित इकाइयों को भी इथेनॉल बनाने की अनुमति देने की मांग कर रहे हैं. केंद्र सरकार ने चीनी के दाम बढ़ने के पीछे गन्ने को इथेनॉल उत्पादन में भेजे जाने को कारण मानने से इनकार किया है. हालांकि, किसान संगठनों और खाद्य उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने का अनुपात बढ़ाने की सरकारी नीति से घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता पर दबाव पड़ रहा है.

कर्नाटक के गन्ना किसान लंबे समय से अपनी फसल का उचित दाम नहीं मिलने की शिकायत करते रहे हैं. राज्य गन्ना उत्पादक संघ के अध्यक्ष कुरुबुर शांताकुमार ने द हिन्दू से कहा कि इथेनॉल उत्पादन का फायदा सिर्फ बड़ी चीनी मिलों तक सीमित नहीं रहना चाहिए. उन्होंने कहा कि स्थानीय गुड़ बनाने वाली इकाइयों को भी इथेनॉल उत्पादन की तकनीक और अनुमति दी जानी चाहिए. इससे छोटे स्तर के उद्योगों और गन्ना किसानों को भी इथेनॉल से जुड़ी बढ़ती मांग का फायदा मिल सकेगा.

गुड़ इकाइयों को इथेनॉल बनाने की अनुमति मिले

कुरुबुर शांताकुमार ने कहा कि गुड़ बनाने वाली इकाइयों में तैयार इथेनॉल को सिर्फ ईंधन के तौर पर ही नहीं, बल्कि घरों में पर्यावरण के अनुकूल खाना पकाने के ईंधन के रूप में भी इस्तेमाल करने की अनुमति मिलनी चाहिए. किसान अपने वाहन और ट्रैक्टर चलाने के लिए भी इसका इस्तेमाल कर सकें. उन्होंने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां इथेनॉल  के लिए करीब 65 रुपये प्रति लीटर का भाव देती हैं. ऐसे में किसानों को अपनी अतिरिक्त उपज से इथेनॉल बनाने और बेचने की अनुमति मिलती है तो उनकी आय में काफी बढ़ोतरी हो सकती है.

इथेनॉल से किसानों को आर्थिक फायदा, पर्यावरण को भी लाभ

बेंगलुरु में हाल ही में ‘गन्ने, धान और मक्का से इथेनॉल उत्पादन’ विषय पर एक सेमिनार हुआ. इसमें वक्ताओं ने इथेनॉल को वाहन ईंधन के तौर पर इस्तेमाल करने के पर्यावरणीय और आर्थिक फायदों पर चर्चा की. खास बात यह रही कि सेमिनार में दीप जलाने के लिए भी इथेनॉल का इस्तेमाल किया गया. वक्ताओं ने कहा कि इथेनॉल उत्पादन बढ़ने से प्रदूषण कम करने के साथ किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है.

1840 से कर्नाटक में बन रहा इथेनॉल

महाराष्ट्र कृषि मूल्य आयोग के अध्यक्ष पाशा पटेल ने बताया कि कर्नाटक के मांड्या स्थित मैसूर शुगर फैक्ट्री में 1840 में ही इथेनॉल का उत्पादन होता था. उस समय इसे बॉम्बे भेजा जाता था, जहां वाहनों के ईंधन में मिलाया जाता था. कार्यक्रम में शामिल पूर्व मंत्री मुरुगेश निरानी ने कहा कि उनकी 11 चीनी मिलें मिलकर रोज करीब 1 लाख लीटर इथेनॉल का उत्पादन करती हैं. उन्होंने कहा कि देश में इथेनॉल उत्पादन बढ़ने से पहले मक्का का भाव 2,800 रुपये प्रति क्विंटल से ज्यादा नहीं था, जबकि अब यह 3,200 रुपये प्रति क्विंटल से ऊपर पहुंच गया है.

धान से गन्ने के मुकाबले ज्यादा इथेनॉल

वक्ताओं के मुताबिक, एक टन धान से करीब 460 लीटर इथेनॉल बनाया जा सकता है. वहीं, एक टन गन्ने से करीब 80 लीटर इथेनॉल का उत्पादन होता है. कुरुबुर शांताकुमार ने दावा किया कि भारत में हर साल करीब 1,700 से 1,800 करोड़ लीटर इथेनॉल बनाने की क्षमता है. इसमें गन्ने के उप-उत्पाद से इथेनॉल बनाने वाली मोलासिस आधारित इकाइयों के साथ मक्का और धान जैसी फसलों से इथेनॉल बनाने वाली अनाज आधारित इकाइयां भी शामिल हैं.

इथेनॉल उत्पादन में कर्नाटक तीसरे स्थान पर

शांताकुमार के मुताबिक, कर्नाटक में करीब 56 इथेनॉल उत्पादन इकाइयां हैं. इथेनॉल उत्पादन  में राज्य महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के बाद तीसरे स्थान पर है. कर्नाटक में हर साल करीब 135 करोड़ लीटर इथेनॉल का उत्पादन होता है. उन्होंने कहा कि गन्ने, मक्का, धान और दूसरी अनाज फसलों से इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने से किसानों को उनकी उपज का बेहतर दाम मिल सकता है. इससे गांवों में रोजगार और आय बढ़ने के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी.

Published: 14 Sep, 2026 | 10:22 AM

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