Report: फिशरी सेक्टर की बड़ी नाकामी, दुनिया भर में करोड़ों टन मछली हो रही बर्बाद, ये है बड़ी वजह

दुनिया में हर साल 25 से 35 मिलियन टन मछली सिर्फ इसलिए बर्बाद हो जाती है क्योंकि उसे संभालने, सहेजने और बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था कमजोर है. यह नुकसान न सिर्फ भोजन की बर्बादी है, बल्कि पोषण सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए भी गंभीर खतरा बनता जा रहा है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 13 Feb, 2026 | 07:30 AM

Global fish wastage: दुनिया भर में मछली को सबसे पौष्टिक और सस्ता प्रोटीन माना जाता है. करोड़ों लोगों की थाली में मछली रोजाना पोषण का अहम हिस्सा है और लाखों परिवारों की रोजी-रोटी इसी पर टिकी है. लेकिन इसी बीच एक चौंकाने वाली सच्चाई सामने आई है. एक नए वैश्विक अध्ययन के मुताबिक, दुनिया में हर साल 25 से 35 मिलियन टन मछली सिर्फ इसलिए बर्बाद हो जाती है क्योंकि उसे संभालने, सहेजने और बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था कमजोर है. यह नुकसान न सिर्फ भोजन की बर्बादी है, बल्कि पोषण सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए भी गंभीर खतरा बनता जा रहा है.

किस अध्ययन में हुआ खुलासा

यह अहम अध्ययन Food and Agriculture Organization (FAO) और Bay of Bengal Programme Inter-Governmental Organisation (BOBP-IGO) द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है. अध्ययन के नतीजे 2025–26 के दौरान 11 एशियाई देशों में किए गए गहन सर्वे और विश्लेषण पर आधारित हैं. इनमें भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका, थाईलैंड, वियतनाम जैसे प्रमुख मछली उत्पादक देश शामिल हैं.

इस अध्ययन को पुडुचेरी में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला के दौरान पेश किया गया, जहां बे ऑफ बंगाल क्षेत्र में मरीन फिशरीज वैल्यू चेन पर चर्चा की गई.

विकासशील देशों में हालात ज्यादा गंभीर

अध्ययन में सामने आया कि विकासशील देशों में मछली की 20 से 35 प्रतिशत तक की कुल पैदावार खराब हो जाती है. कुछ इलाकों में यह नुकसान 75 प्रतिशत तक पहुंच जाता है. यानी जितनी मछली समुद्र से निकाली जाती है, उसका बड़ा हिस्सा लोगों तक पहुंचने से पहले ही नष्ट हो जाता है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति आने वाले समय में वैश्विक पोषण सुरक्षा के लिए बड़ा संकट बन सकती है.

सबसे ज्यादा नुकसान कहां हो रहा है

रिपोर्ट के अनुसार मछली का सबसे बड़ा नुकसान पोस्ट-हार्वेस्ट, यानी समुद्र से पकड़ने के बाद होता है. आंकड़े बताते हैं कि कुल नुकसान का 43.5 प्रतिशत हिस्सा सीधे लैंडिंग साइट्स पर होता है. इसकी मुख्य वजह है वहां पर्याप्त बर्फ (आइसिंग) की सुविधा न होना और अधिक तापमान. गर्मी में मछली को अगर तुरंत ठंडा न किया जाए तो वह बहुत जल्दी खराब हो जाती है.

इंफ्रास्ट्रक्चर की कमजोर कड़ियां

BOBP-IGO के निदेशक पी. कृष्णन ने बताया कि बे ऑफ बंगाल क्षेत्र में मरीन फिशरीज सेक्टर कई बुनियादी कमियों से जूझ रहा है. उन्होंने कहा कि लैंडिंग सेंटर्स पर कोल्ड स्टोरेज की कमी, आइस प्लांट्स का अभाव, कूल-चेन लॉजिस्टिक्स का सही तरीके से न जुड़ना और कमजोर प्रोसेसिंग व पैकेजिंग सिस्टम इस संकट को और बढ़ा रहे हैं.

एशिया में ‘साइलेंट क्राइसिस’

अध्ययन में यह भी कहा गया कि एशिया में मछली की बर्बादी अब एक “साइलेंट क्राइसिस” बन चुकी है. अनुमान है कि कुल पकड़ का 20 से 60 प्रतिशत हिस्सा वैल्यू चेन के अलग-अलग चरणों में नष्ट हो जाता है. इसका सीधा असर मछुआरों की आमदनी पर पड़ता है और उपभोक्ताओं तक पहुंचने वाली मछली की मात्रा भी घट जाती है.

भारत में क्यों ज्यादा नुकसान

भारत को दुनिया के बड़े मछली उत्पादक देशों में गिना जाता है, लेकिन यहां समस्या थोड़ी अलग है. पी. कृष्णन के मुताबिक भारत में उत्पादन और मछली पकड़ने पर सरकारी निवेश तो काफी है, लेकिन पोस्ट-हार्वेस्ट मैनेजमेंट पर ध्यान बेहद कम दिया गया है. बाजार तक पहुंच की व्यवस्था कमजोर है और निजी निवेश भी न के बराबर है. इसी वजह से मछली पकड़ने के बाद होने वाला नुकसान लगातार बढ़ रहा है.

समाधान क्या सुझाता है अध्ययन

अध्ययन में इस समस्या से निपटने के लिए मछली क्षेत्र की पूरी वैल्यू चेन को मजबूत करने की बात कही गई है. रिपोर्ट का कहना है कि मछुआरों को सिर्फ “दाम लेने वाला” नहीं, बल्कि “मूल्य बनाने वाला” बनाना होगा. इसके लिए मछली पकड़ने वाले बेड़े की बेहतर योजना, लैंडिंग सेंटर्स पर आधुनिक कोल्ड स्टोरेज और आइस प्लांट्स, अनिवार्य ट्रेसबिलिटी सिस्टम, नावों पर ही प्रोसेसिंग और संरक्षण तकनीक, और मछली पकड़ने वाली नौकाओं व प्रोसेसिंग इंडस्ट्री के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है.

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Published: 13 Feb, 2026 | 07:30 AM
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