कश्मीर में घटता जा रहा धान की खेती का दायरा, लगातार नुकसान और पानी की कमी से किसान परेशान

डीजल और बिजली की बढ़ती कीमतों के कारण खेती का खर्च पहले से ज्यादा बढ़ गया है. छोटे किसान सबसे ज्यादा परेशान हैं क्योंकि उनके पास महंगे पंप और अतिरिक्त सिंचाई का खर्च उठाने की क्षमता नहीं है. कई किसानों का कहना है कि अगर जल्द बारिश नहीं हुई तो धान की फसल बुरी तरह प्रभावित हो सकती है.

नई दिल्ली | Updated On: 12 May, 2026 | 09:43 AM

paddy farming crisis: कश्मीर घाटीमें इस बार धान की खेती करने वाले किसानों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है. एक तरफ पिछले साल आई बाढ़ का दर्द अभी तक किसानों के मन से नहीं निकला है, तो दूसरी तरफ इस साल कम बारिश और सूखती सिंचाई नहरों ने खेती की चिंता और बढ़ा दी है. घाटी के कई इलाकों में किसान अब खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए मोटर पंप का सहारा लेने को मजबूर हैं, जिससे खेती की लागत लगातार बढ़ रही है.

धान की खेती कश्मीर की पारंपरिक खेती मानी जाती है और हजारों परिवारों की आजीविका इससे जुड़ी हुई है. लेकिन लगातार बदलते मौसम और पानी की कमी ने किसानों की उम्मीदों पर बड़ा असर डाला है.

पिछले साल की बाढ़ के बाद अब सूखे जैसे हालात

बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, पिछले साल सितंबर में कश्मीर के कई इलाकों में आई बाढ़ ने धान की फसल को भारी नुकसान पहुंचाया था. खासतौर पर पुलवामा, अनंतनाग और झेलम नदी के किनारे बसे क्षेत्रों में खेत पूरी तरह पानी में डूब गए थे. कई जगह खेतों में गाद भर गई थी, जिससे किसानों को पूरी फसल छोड़नी पड़ी.

अब जब किसान नए सीजन की तैयारी कर रहे हैं, तब बारिश की कमी ने नई मुसीबत खड़ी कर दी है. खेतों में पानी नहीं पहुंच पा रहा है और कई सिंचाई नहरें समय से पहले सूखने लगी हैं.

26 प्रतिशत कम बारिश से बिगड़ी स्थिति

इस साल 1 मार्च से अब तक जम्मू-कश्मीर में सामान्य से करीब 26 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है. धान उत्पादन वाले जिलों में हालात और ज्यादा गंभीर बताए जा रहे हैं.

बारिश की कमी के आंकड़े इस तरह हैं-

कम बारिश की वजह से खेतों में नमी तेजी से खत्म हो रही है. धान की खेती के लिए लगातार पानी की जरूरत होती है, लेकिन इस बार किसानों को सिंचाई के लिए काफी संघर्ष करना पड़ रहा है.

मोटर पंप से बढ़ रही खेती की लागत

पुलवामा के पहू गांव के किसान मुजफ्फर अहमद बिजनेसलाइन को बताते हैं कि इस बार बोआई से पहले ही सिंचाई चैनल सूखने लगे हैं. ऐसे में किसानों को खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए मोटर पंप चलाने पड़ रहे हैं.

डीजल और बिजली की बढ़ती कीमतों के कारण खेती का खर्च पहले से ज्यादा बढ़ गया है. छोटे किसान सबसे ज्यादा परेशान हैं क्योंकि उनके पास महंगे पंप और अतिरिक्त सिंचाई का खर्च उठाने की क्षमता नहीं है. कई किसानों का कहना है कि अगर जल्द बारिश नहीं हुई तो धान की फसल बुरी तरह प्रभावित हो सकती है.

धीरे-धीरे घट रहा धान की खेती का क्षेत्र

लगातार नुकसान और पानी की कमी के कारण घाटी में धान की खेती का दायरा लगातार घटता जा रहा है. कई किसान अब धान छोड़कर दूसरी फसलों और बागवानी की तरफ बढ़ रहे हैं.

अनंतनाग के किसान अली मोहम्मद का कहना है कि धान की खेती अब पहले जितनी फायदे वाली नहीं रही. इसलिए कई किसान सेब बागवानी की ओर रुख कर रहे हैं.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2012 में करीब 1.62 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खेती होती थी, वहीं वर्ष 2023 तक यह घटकर लगभग 1.29 लाख हेक्टेयर रह गई यानि एक दशक में करीब 33 हजार हेक्टेयर से ज्यादा जमीन धान उत्पादन से बाहर हो गई.

जलवायु परिवर्तन का दिख रहा असर

विशेषज्ञों का मानना है कि कश्मीर में मौसम का बदलता पैटर्न खेती के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है. कभी बाढ़ तो कभी सूखे जैसे हालात किसानों की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं.

धान की खेती पूरी तरह पानी पर निर्भर होती है. लेकिन लगातार कम होती बारिश और अस्थिर मौसम ने खेती के पारंपरिक तरीके को प्रभावित कर दिया है. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते सिंचाई व्यवस्था मजबूत नहीं की गई, तो आने वाले वर्षों में घाटी में धान उत्पादन और कम हो सकता है.

किसानों की बढ़ रही चिंता

कश्मीर के किसान इस समय दोहरी मार झेल रहे हैं. एक तरफ मौसम की अनिश्चितता है, दूसरी तरफ खेती की बढ़ती लागत. कई किसान कर्ज लेकर खेती करते हैं और फसल खराब होने पर उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ता है.

ग्रामीण इलाकों में लोगों का कहना है कि अगर सरकार सिंचाई नहरों की मरम्मत, जल संरक्षण और आधुनिक सिंचाई तकनीक पर ध्यान दे, तो किसानों को कुछ राहत मिल सकती है.

Published: 12 May, 2026 | 10:02 AM

Topics: