सुस्त पड़ी खरीफ बुवाई, रकबे में 3.9 फीसदी गिरावट.. जानें धान, दलहन और मोटे अनाज का हाल

खरीफ सीजन 2026 में 12 जून तक कुल बुवाई क्षेत्र पिछले साल के मुकाबले 3.9 फीसदी कम रहा. कपास और दालों की बुवाई में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है, जबकि धान का रकबा बढ़ा है. विशेषज्ञों का कहना है कि सामान्य से कमजोर मॉनसून की स्थिति में दाल, सोयाबीन और कपास उत्पादन पर सबसे ज्यादा असर पड़ सकता है.

नोएडा | Updated On: 18 Jun, 2026 | 09:12 AM

देश में खरीफ सीजन की बुवाई इस साल शुरुआती दौर में सुस्त रही है. कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 12 जून तक किसानों ने 84.6 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई की है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 88.04 लाख हेक्टेयर था. यानी इस बार अब तक कुल बुवाई क्षेत्र में करीब 3.9 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है. इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह कपास की बुवाई में आई कमी रही. 12 जून तक कपास का रकबा घटकर 9.53 लाख हेक्टेयर रह गया, जो पिछले साल इसी अवधि के 13.19 लाख हेक्टेयर की तुलना में करीब 28 प्रतिशत कम है. यानी कपास का क्षेत्रफल 3.66 लाख हेक्टेयर घट गया है.

दालों की बुवाई में भी कमी देखने को मिली है. इस साल 1.55 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में दालों की बुवाई हुई, जबकि पिछले साल यह 2.73 लाख हेक्टेयर थी. दालों में मूंग की बुवाई सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है. इसके अलावा अरहर और उड़द के रकबे में भी गिरावट दर्ज की गई है. हालांकि, जानकारों का कहना है कि यदि 2026 में मॉनसून सामान्य से कम रहता है तो इसका सबसे ज्यादा असर दालों, सोयाबीन और कपास के उत्पादन पर पड़ सकता है. इसकी मुख्य वजह यह है कि इन फसलों का बड़ा हिस्सा उन राज्यों में उगाया जाता है, जहां सिंचाई सुविधाएं अपेक्षाकृत कमजोर हैं और खेती काफी हद तक बारिश पर निर्भर करती है.

धान का रकबा बढ़कर 4.98 लाख हेक्टेयर हो गया

वहीं, अंग्रेजी न्यूज वेबसाइट मनीकंट्रोल के विश्लेषण में कहा गया है कि दालों का उत्पादन सबसे अधिक जोखिम में है. देश के कुल दाल उत्पादन का करीब 81.8 प्रतिशत हिस्सा महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक और मध्य प्रदेश से आता है. इनमें से केवल मध्य प्रदेश में सिंचाई का स्तर राष्ट्रीय औसत से अधिक है, जबकि बाकी राज्यों में किसान मॉनसून पर ज्यादा निर्भर हैं. खास बात यह है कि जहां कपास और दालों की बुवाई में गिरावट देखी गई, वहीं धान की खेती में बढ़ोतरी दर्ज की गई है. कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 12 जून तक धान का रकबा बढ़कर 4.98 लाख हेक्टेयर हो गया, जो पिछले साल इसी अवधि के 3.88 लाख हेक्टेयर से करीब 28 प्रतिशत अधिक है. विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ क्षेत्रों में मॉनसून के समय से पहले पहुंचने से धान की बुवाई को बढ़ावा मिला है.

किस फसल की कितनी हुई बुवाई (आंकड़े PIB से लिए गए हैं)

फसल सामान्य रकबा (2020-21 से 2024-25) (लाख हे.) 2025 अंतिम रकबा (लाख हे.) 2026 बुवाई (लाख हे.) 2025 बुवाई (लाख हे.) बदलाव (लाख हे.)
धान (Rice) 412.00 446.70 4.98 3.88 +1.09
दालें (Pulses) 123.64 118.97 1.55 2.73 -1.18
अरहर (Arhar) 44.32 44.60 0.09 0.21 -0.12
उड़द (Urdbean) 29.60 21.26 0.27 0.35 -0.07
मूंग (Moongbean) 35.48 37.45 0.69 1.54 -0.86
कुल्थी (Kulthi) 1.48 0.08 0.06 +0.02
मोठ (Mothbean) 9.69 0.00 0.00 0.00
अन्य दालें (Other Pulses) 3.07 15.66 0.41 0.57 -0.16
श्रीअन्न/मोटे अनाज (Coarse Cereals) 182.63 192.12 4.77 4.32 +0.45

बाजरे का रकबा बढ़कर 1.15 लाख हेक्टेयर पहुंच गया

देश के कुल धान उत्पादन में उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी करीब 32.7 प्रतिशत है. इन राज्यों में सिंचाई सुविधाएं  भी अपेक्षाकृत बेहतर हैं, जिससे धान की खेती को सहारा मिलता है. मोटे अनाज (कोर्स सीरियल) की बुवाई में भी मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई है. इसका रकबा बढ़कर 4.77 लाख हेक्टेयर हो गया, जो पिछले साल 4.32 लाख हेक्टेयर था. मोटे अनाजों में बाजरे की बुवाई में सबसे ज्यादा वृद्धि हुई है. बाजरे का रकबा बढ़कर 1.15 लाख हेक्टेयर पहुंच गया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह केवल 0.24 लाख हेक्टेयर था.

12 जून तक तिलहन फसलों का रकबा

खरीफ सीजन में तिलहनों की बुवाई लगभग स्थिर बनी हुई है. 12 जून तक तिलहन फसलों का रकबा 3.51 लाख हेक्टेयर रहा, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 3.54 लाख हेक्टेयर था. तिलहनों में मूंगफली की बुवाई बढ़ी है, जबकि सोयाबीन और सूरजमुखी के रकबे में कमी दर्ज की गई है. वहीं, गन्ने का रकबा मामूली रूप से घटकर 54.08 लाख हेक्टेयर रह गया, जो पिछले साल 54.29 लाख हेक्टेयर था. दूसरी ओर जूट और मेस्टा की बुवाई में हल्की बढ़ोतरी हुई है. इनका रकबा बढ़कर 6.18 लाख हेक्टेयर हो गया, जो पिछले साल 6.09 लाख हेक्टेयर था.

औसत की तुलना में 35 प्रतिशत कम बारिश

देश में अब तक सामान्य औसत की तुलना में 35 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है. शुरुआती खरीफ बुवाई  के आंकड़े बताते हैं कि विभिन्न फसलों की बुवाई की रफ्तार एक जैसी नहीं है. बेहतर नमी की स्थिति के कारण धान की बुवाई बढ़ी है, जबकि कपास जैसी नकदी फसलें अभी भी पिछड़ रही हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले हफ्तों में बुवाई की गति काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रमुख कृषि राज्यों में मॉनसून की बारिश कितनी और कहां-कहां होती है.

Published: 18 Jun, 2026 | 09:08 AM

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