कपास के रकबे में 28 फीसदी की गिरावट, 9.53 लाख हेक्टेयर पर सिमटी बुवाई; किसान क्यों बना रहे दूरी?

उत्तर भारत में इस खरीफ सीजन कपास की बुवाई में 22 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. किसान बेहतर दाम और सरकारी खरीद की गारंटी के कारण धान की ओर रुख कर रहे हैं. पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में कपास का रकबा घटा है, जबकि गुलाबी सुंडी, मौसम की मार और बढ़ते जोखिम भी किसानों को कपास से दूर कर रहे हैं.

Kisan India
नोएडा | Updated On: 18 Jun, 2026 | 08:01 AM

Cotton Cultivation: उत्तर भारत में इस खरीफ सीजन के दौरान किसानों का रुझान कपास की बजाय धान की खेती की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है. धान की सरकारी खरीद की गारंटी और बेहतर कीमत मिलने की उम्मीद के चलते कई किसानों ने कपास का रकबा कम कर दिया है. इसका असर बुवाई के आंकड़ों में भी दिख रहा है. इसके चलते उत्तर भारत में कपास की बुवाई में करीब 22 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है. वहीं, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में इस साल कपास का रकबा घटकर 9 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 11.56 लाख हेक्टेयर था. कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 12 जून तक पूरे देश में कपास का कुल रकबा 9.53 लाख हेक्टेयर रहा, जो पिछले साल की इसी अवधि के 13.19 लाख हेक्टेयर से करीब 28 प्रतिशत कम है.

गुजरात, कर्नाटक और राजस्थान के कुछ हिस्सों में अभी भी बुवाई जारी है, लेकिन कुल मिलाकर कपास की खेती में गिरावट देखी जा रही है. उत्तर भारत में कपास की बुवाई आमतौर पर अप्रैल के मध्य से मई के अंत तक पूरी हो जाती है, और इस साल भी अधिकांश क्षेत्रों में यह प्रक्रिया लगभग समाप्त हो चुकी है. इस खरीफ सीजन में उत्तर भारत में कपास की खेती का रकबा घटा है. पंजाब में 11 जून तक कपास का क्षेत्र घटकर 0.80 लाख हेक्टेयर रह गया, जबकि पिछले साल यह 1.19 लाख हेक्टेयर था.

हरियाणा में 2.92 लाख हेक्टेयर में कपास की बुवाई

बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, हरियाणा में भी गिरावट दर्ज की गई है. यहां इस साल 2.92 लाख हेक्टेयर में कपास की बुवाई हुई, जबकि पिछले साल यह 3.94 लाख हेक्टेयर थी. इसी तरह राजस्थान में भी रकबा कम हुआ है, जो इस साल 5.28 लाख हेक्टेयर है, जबकि पिछले साल यह 6.43 लाख हेक्टेयर था. हालांकि, कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CAI) के चेयरमैन अतुल गणात्रा के अनुसार, राजस्थान के कुछ हिस्सों में बारिश होने के कारण वहां कपास की बुवाई अभी जारी है. उनका कहना है कि आगे चलकर यहां रकबा स्थिर रह सकता है या 3-4 प्रतिशत तक बढ़ भी सकता है. कृषि मंत्रालय के अनुसार, 2025-26 में देश में कुल 114.82 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की बुवाई हुई थी.

कपास की बुवाई में गिरावट के राज्यवार आंकड़े

क्षेत्र/राज्य 2026-27 रकबा (लाख हेक्टेयर) 2025-26 रकबा (लाख हेक्टेयर) बदलाव
उत्तर भारत (पंजाब, हरियाणा, राजस्थान) 9.00 11.56 -22%
पंजाब 0.80 1.19 -32.8%
हरियाणा 2.92 3.94 -25.9%
राजस्थान 5.28 6.43 -17.9%
भारत (12 जून तक) 9.53 13.19 -27.7% (करीब 28%)

कपास का कितना है न्यूनतम समर्थन मूल्य

वहीं 2026-27 सीजन के लिए केंद्र सरकार ने कपास के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में 557 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की है. इसके बाद मध्यम रेशे वाली कपास का MSP 8,267 रुपये और लंबे रेशे वाली कपास का MSP 8,667 रुपये प्रति क्विंटल हो गया है. उत्तर भारत के कपास क्षेत्र में किसान तेजी से धान की खेती की ओर रुख कर रहे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि इसका मुख्य कारण धान से मिलने वाली बेहतर और सुनिश्चित आमदनी है, क्योंकि इसमें सरकारी खरीद की गारंटी मिलती है.

फसल को अप्रैल-मई की तेज गर्मी में नुकसान होता है

विशेषज्ञों का कहना है कि कपास की फसल को अप्रैल-मई की तेज गर्मी में नुकसान होता है, जैसे पौधों का मुरझाना, जड़ सड़ना और कमजोर पौध विकास. इन समस्याओं के कारण भी किसान कपास से दूर हो रहे हैं. इन सभी कृषि और आर्थिक कारणों की वजह से पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में किसान अब कपास की तुलना में धान को ज्यादा सुरक्षित और लाभकारी फसल मान रहे हैं.

किसान इस वजह से कर रहे धान की खेती

सिरसा स्थित सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ कॉटन रिसर्च (CICR) के क्षेत्रीय केंद्र के पूर्व प्रमुख दिलीप मोंगा ने कहा है कि उत्तर भारत में कपास का क्षेत्र पिछले कुछ वर्षों से लगातार घट रहा है. उनके अनुसार, इसका एक बड़ा कारण गुलाबी सुंडी का गंभीर संक्रमण है, जिससे फसल को भारी नुकसान  होता है. इसके अलावा, अनियमित मौसम भी कपास की खेती पर असर डाल रहा है. पिछले साल अगस्त-सितंबर में अधिक बारिश हुई, जिससे उत्पादन प्रभावित हुआ, जबकि बुवाई के समय तेज गर्मी ने भी फसल को नुकसान पहुंचाया. उन्होंने यह भी कहा कि किसान अब अन्य फसलों, खासकर धान से बेहतर आमदनी प्राप्त कर रहे हैं. इसी वजह से वे धीरे-धीरे कपास की खेती छोड़कर दूसरी फसलों की ओर बढ़ रहे हैं.

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Published: 18 Jun, 2026 | 07:54 AM

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