2009 के बाद सबसे कमजोर मॉनसून! धान का रकबा 4 फीसदी घटा, 1.4 फीसदी कम हुई बुवाई
Kharif Sowing: कम मॉनसून के चलते इस खरीफ सीजन में कुल बुवाई रकबा 1.4 फीसदी घटकर 109.49 मिलियन हेक्टेयर रह गया है. धान की बुवाई करीब 4 फीसदी घटकर 42.68 मिलियन हेक्टेयर हुई है. उत्तर-पश्चिम, पूर्वी और दक्षिण भारत में बारिश की कमी ज्यादा रही.
Kharif Crop Sowing: खरीफ बुवाई का सीजन अब खत्म हो चुका है और अगले करीब 10 दिनों में मंडियों में नई फसलों की आवक शुरू होने की उम्मीद है. हालांकि, इस बार कम बारिश ने खरीफ फसलों को लेकर चिंता बढ़ा दी है. देश के कई हिस्सों में मॉनसून कमजोर रहने से कुल खरीफ रकबा पिछले साल की तुलना में 1.4 फीसदी घट गया है. इसका असर धान, मोटे अनाज, तिलहन और कुछ अन्य फसलों के उत्पादन पर पड़ने की आशंका है. कृषि मंत्रालय के शुरुआती आंकड़े बताते हैं कि इस बार कुल 109.49 मिलियन हेक्टेयर में खरीफ फसलों की बुवाई हुई है. पिछले साल के मुकाबले यह रकबा कम है. हालांकि, सरकार अभी उत्पादन का पूरा आकलन कर रही है और फिलहाल बड़े नुकसान की संभावना नहीं मान रही है.
धान की बुवाई में सबसे ज्यादा कमी
कम बारिश का सबसे साफ असर धान की खेती पर दिखाई दे रहा है. कृषि मंत्रालय के मुताबिक चालू खरीफ सीजन में धान का रकबा करीब 4 फीसदी घटकर 42.68 मिलियन हेक्टेयर रह गया है. धान की बुवाई में कमी मुख्य रूप से कर्नाटक, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में दर्ज की गई है. इनमें दक्षिण और पूर्वी भारत के कई इलाके ऐसे रहे, जहां बारिश की कमी के साथ सिंचाई के लिए जलाशयों में पानी भी कम रहा. इससे किसानों को बुवाई और फसल संभालने दोनों में परेशानी हुई. धान के साथ रागी जैसी फसलें भी कमजोर बारिश से प्रभावित हुई हैं.
दलहन का रकबा बढ़ा, लेकिन फसल पर खतरा बरकरार
दलहनों में अरहर, उड़द और मूंग का कुल रकबा पिछले साल के मुकाबले थोड़ा बढ़कर 11.71 मिलियन हेक्टेयर हो गया है. यानी बुवाई के स्तर पर दलहन की तस्वीर थोड़ी बेहतर है. लेकिन सिर्फ रकबा बढ़ने से अच्छी पैदावार की गारंटी नहीं होती. महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ इलाकों में अरहर की फसल को लेकर अभी भी चिंता बनी हुई है. बाजार से जुड़े जानकारों के मुताबिक अगले कुछ हफ्तों में होने वाली बारिश तय करेगी कि दलहन की फसल कितनी अच्छी रहती है.
2009 के बाद सबसे कमजोर मॉनसून का अनुमान
इस साल मॉनसून की स्थिति भी चिंता बढ़ाने वाली रही है. रविवार तक देश में कुल बारिश सामान्य से 14.7 फीसदी कम दर्ज की गई. मौजूदा अनुमान के मुताबिक पूरे सीजन में भी बारिश सामान्य से कम रह सकती है. ऐसे में यह 2009 के बाद सबसे कम बारिश वाले मॉनसून सीजन में शामिल हो सकता है. क्षेत्रवार देखें तो मध्य भारत में बारिश लगभग सामान्य रही, लेकिन उत्तर-पश्चिम भारत में 9.9 फीसदी, पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में 24.8 फीसदी और दक्षिण भारत में 27.8 फीसदी कम बारिश हुई है. देश के 740 जिलों में से करीब 343 जिलों यानी लगभग 47 फीसदी जिलों में सामान्य से कम या बहुत कम बारिश हुई है. इससे खेती के लिए पानी की उपलब्धता और मिट्टी की नमी पर असर पड़ा है.
जून में भारी कमी, जुलाई में सुधार के बाद अगस्त फिर कमजोर
मॉनसून के शुरुआती महीनों में बारिश का प्रदर्शन काफी असमान रहा. जून में बारिश सामान्य से करीब 36 फीसदी कम रही. इसके बाद जुलाई में स्थिति सुधरी और बारिश सामान्य से करीब 1 फीसदी ज्यादा रही. लेकिन अगस्त में फिर से बारिश ने निराश किया और सामान्य से 16.3 फीसदी कम पानी बरसा. अब सितंबर में भी बारिश सामान्य से नीचे यानी 91 फीसदी से कम रहने का अनुमान है.
मंडियों में आवक से साफ होगी फसल की तस्वीर
खरीफ की फसलें अब जल्द मंडियों में पहुंचने लगेंगी. अगले करीब 10 दिनों में आवक बढ़ने के साथ उत्पादन की वास्तविक तस्वीर भी सामने आने लगेगी. इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि कम बारिश का असर केवल बुवाई के रकबे तक सीमित रहा या पैदावार पर भी बड़ा प्रभाव पड़ा. फिलहाल कृषि मंत्रालय उत्पादन का विस्तृत आकलन कर रहा है. हालांकि रिपोर्ट्स के मुताबिक कम बारिश के बावजूद खरीफ उत्पादन क्षमता पर बहुत ज्यादा या गंभीर असर पड़ने की संभावना नहीं है. हालांकि, आने वाले हफ्तों का मौसम फसल की अंतिम स्थिति तय करने में अहम भूमिका निभाएगा.