सोयाबीन-कपास की खेती अब और नहीं करेंगे किसान, रेशम की अच्छी कीमत और सब्सिडी ने मोड़ा रुख
Maharashtra Farmers opt Sericulture: सीएम देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि किसानों को केवल सोयाबीन और कपास पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, क्योंकि इन फसलों से होने वाली आय हमेशा संतोषजनक नहीं होती. उन्होंने खेती में विविधता लाने और रेशम उत्पादन को एक महत्वपूर्ण नकदी फसल के रूप में अपनाने की अपील की.
महाराष्ट्र के किसानों की दिलचस्पी रेशम की खेती पर तेजी से बढ़ी है. अकेले मराठवाड़ा रीजन के 8 जिलों में इसकी खेती का रकबा 4670 हेक्टेयर के पार पहुंच गया है और 3 हजार टन से ज्यादा रेशम उत्पादन हासिल किया गया है. वहीं, रेशम कीट पर सब्सिडी और रेशम उत्पादन पर प्रोत्साहन राशि सरकार की ओर से मिलने की वजह से किसान पारंपरिक कपास और सोयाबीन की खेती से मुंह मोड़कर रेशम उत्पादन की ओर बढ़ रहे हैं.
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने जालना जिले में रेशम बाजार भवन का उद्घाटन किया और किसानों से सोयाबीन एवं कपास जैसी पारंपरिक फसलों के साथ रेशम की खेती को आय का एक लाभकारी विकल्प बनाने का आग्रह किया. उन्होंने कहा कि किसानों को केवल सोयाबीन और कपास पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, क्योंकि इन फसलों से होने वाली आय हमेशा संतोषजनक नहीं होती. उन्होंने खेती में विविधता लाने और रेशम उत्पादन को एक महत्वपूर्ण नकदी फसल के रूप में अपनाने की अपील की.
रेशम कोकून की कीमत 960 रुपये प्रति किलो
सीएम फडणवीस ने जालना में रेशम कोकून की पहली नीलामी का जिक्र करते हुए कहा कि रेशम की कीमत अनुमानित 700 रुपये के मुकाबले 960 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई. उन्होंने नीलामी में शामिल प्रतिनिधियों से किसानों को बेहतर कीमत दिलाने के प्रयास करने को कहा. उन्होंने कहा कि रेशम की साड़ियां बुनने वाली महिलाओं ने उत्पादन बढ़ाने के लिए अपने घरों में करघे लगाने की मांग की है. उन्होंने रेशम क्षेत्र की मूल्य शृंखला मजबूत करने के लिए अधिक किसानों को प्रशिक्षण और कौशल विकास उपलब्ध कराने पर जोर दिया.
भारत अपनी जरूरत का 80 फीसदी रेशम चीन से मंगा रहा
मुख्यमंत्री ने कहा कि रेशम उत्पादन में मजबूत मूल्य शृंखला विकसित करने की क्षमता है. उन्होंने कहा कि भारत कभी रेशम के प्रमुख निर्यातकों में शामिल था और देश वैश्विक रेशम बाजार में अपनी स्थिति फिर मजबूत कर सकता है. फडणवीस ने कहा कि जालना अपने रेशम उत्पादों का ब्रांड विकसित कर सकता है और इस दिशा में कई नामों पर विचार किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र को आयातित रेशम पर भारत की निर्भरता कम करने की दिशा में काम करना चाहिए. भारत की रेशम जरूरतों का करीब 80 फीसदी चीन से आयात किया जाता है.
अकेले मराठवाड़ा में 4670 हेक्टेयर में रेशम की खेती
मुख्यमंत्री के आह्वान से पहले ही महाराष्ट्र के किसानों की दिलचस्पी रेशम की खेती पर तेजी से बढ़ी है. 2025-26 के आंकड़े बताते हैं कि अकेले मराठवाड़ा रीजन के 8 जिलों में इसकी खेती का रकबा 4670 हेक्टेयर के पार पहुंच गया है और यहां पर 3 हजार टन से ज्यादा रेशम उत्पादन हासिल किया गया है. जबकि, अन जिलों में भी तेजी से रेशम उत्पादन की शुरुआत हो चुकी है. वहीं, रेशम कीट पर सब्सिडी और रेशम उत्पादन पर प्रोत्साहन राशि सरकार की ओर से मिलने की वजह से किसान पारंपरिक कपास और सोयाबीन की खेती से मुंह मोड़कर रेशम उत्पादन की ओर बढ़ रहे हैं.
कैसे होती है रेशम की खेती और उत्पादन
रेशम की खेती को रेशम कीट पालन (सेरीकल्चर) कहा जाता है. इसमें सबसे पहले रेशम के कीड़ों के लिए उपयुक्त शहतूत के पौधे लगाए जाते हैं. शहतूत की पत्तियों को खिलाकर रेशम के कीड़ों को पाला जाता है. कीड़े पत्तियां खाकर बड़े होने के बाद अपने चारों ओर कोकून (रेशम का जाल) बनाते हैं. इन्हीं कोकून से रेशम का महीन धागा निकाला जाता है. इसके लिए स्वस्थ अंडों से कीट तैयार किए जाते हैं, उनकी साफ-सफाई और तापमान-नमी का ध्यान रखा जाता है और पर्याप्त शहतूत की पत्तियां उपलब्ध कराई जाती हैं. कोकून तैयार होने के बाद उन्हें गर्म पानी में संसाधित करके रेशम का धागा निकाला जाता है, जिसे आगे कपड़े और अन्य रेशमी उत्पाद बनाने में इस्तेमाल किया जाता है.