45 दिन में पहली तुड़ाई, फिर लगातार कमाई! बरसात में तोरई-गिलकी की खेती से किसान बना सकते हैं अच्छा मुनाफा
अगस्त में तोरई और गिलकी की खेती किसानों के लिए कम समय में आमदनी का मौका बन सकती है. करीब 45 से 50 दिन में पहली तुड़ाई शुरू हो सकती है. बारिश के दौरान मचान विधि अपनाकर फसल को संभालना आसान होता है और बाजार में ताजी सब्जियों की मांग का फायदा मिल सकता है.
Rainy Season Farming: बरसात के मौसम में किसान अगर कम समय में तैयार होने वाली सब्जियों की खेती करें तो अतिरिक्त आमदनी का अच्छा मौका मिल सकता है. अगस्त महीने में तोरई और गिलकी की बुवाई की जा सकती है. इन सब्जियों की खासियत यह है कि बुवाई के करीब 45 से 50 दिन बाद पहली तुड़ाई शुरू हो सकती है. ऐसे में किसान सितंबर के अंत से अक्टूबर की शुरुआत तक बाजार में ताजी सब्जियां पहुंचाकर कमाई कर सकते हैं.
अगस्त में तोरई और गिलकी की बुवाई का सही समय
बागवानी विशेषज्ञों डॉ. रजनीश मिश्रा, संयुक्त निदेशक के अनुसार, अगस्त का महीना तोरई और गिलकी की खेती के लिए उपयोगी हो सकता है. कम अवधि में तैयार होने वाली इन सब्जियों की बाजार में नियमित मांग रहती है. किसान अपनी जमीन, पानी की उपलब्धता और स्थानीय बाजार की मांग को ध्यान में रखते हुए इन फसलों का चयन कर सकते हैं. इनकी बुवाई के बाद फसल की उचित देखभाल की जाए तो करीब डेढ़ महीने में पहली तुड़ाई शुरू होने की संभावना रहती है. इसके बाद भी पौधों से कुछ समय तक लगातार फल मिलते रहते हैं. इससे किसान को एक ही बार में नहीं, बल्कि कई चरणों में उपज बेचकर आमदनी हासिल करने का अवसर मिलता है.
45-50 दिन में पहली तुड़ाई से मिलेगा फायदा
तोरई और गिलकी जल्दी तैयार होने वाली सब्जियों में शामिल हैं. बुवाई के लगभग 45 से 50 दिन के भीतर पहली तुड़ाई शुरू हो सकती है. इस हिसाब से अगस्त में फसल लगाने वाले किसान सितंबर के आखिरी सप्ताह या अक्टूबर की शुरुआत में उपज बाजार में पहुंचा सकते हैं. बरसात के दौरान कई इलाकों में खेतों में जलभराव और मौसम संबंधी समस्याओं के कारण सब्जियों की आवक प्रभावित हो सकती है. ऐसे समय में बाजार में ताजी हरी सब्जियों की उपलब्धता कम होने पर किसानों को बेहतर भाव मिलने की संभावना रहती है. हालांकि, बाजार भाव मांग और आवक के आधार पर बदलते रहते हैं.
मचान विधि से बारिश में संभालें फसल
बरसात के मौसम में तोरई और गिलकी की खेती के लिए मचान विधि अपनाना फायदेमंद माना जाता है. इस विधि में बेलों को जमीन पर फैलने देने के बजाय ऊपर तैयार किए गए ढांचे पर चढ़ाया जाता है. इससे बेलों और फलों का सीधा संपर्क गीली मिट्टी से कम होता है. मचान पर बेलें फैलने से खेत में हवा का आवागमन भी बेहतर रहता है और फलों को तोड़ना आसान हो जाता है. साथ ही, जमीन पर बेल फैलाने की तुलना में खेत का बेहतर उपयोग किया जा सकता है. बारिश के समय किसानों को खेत में पानी जमा नहीं होने देना चाहिए और जरूरत के अनुसार जल निकासी की व्यवस्था करनी चाहिए.
फसल की देखभाल से बढ़ सकता है उत्पादन
बागवानी विशेषज्ञ डॉ. रजनीश मिश्रा, संयुक्त निदेशक (बागवानी) के अनुसार, बरसात में सब्जियों की खेती करते समय किसान को खेत की जल निकासी, बेलों को सहारा देने और फसल की नियमित निगरानी पर विशेष ध्यान देना चाहिए. अच्छी गुणवत्ता वाले बीज का इस्तेमाल और संतुलित पोषण देने से पौधों की बढ़वार बेहतर हो सकती है. किसानों को फसल में कीट और रोग के लक्षण दिखाई देने पर विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए. सब्जियों की तुड़ाई समय पर करने से बाजार में बेहतर गुणवत्ता की उपज पहुंचाई जा सकती है. अगस्त में तोरई और गिलकी की खेती उन किसानों के लिए अच्छा विकल्प हो सकती है, जो कम अवधि में तैयार होने वाली फसल के जरिए अपनी आमदनी बढ़ाना चाहते हैं.