लीची किसानों पर संकट! माइट अटैक से घट सकती है क्वालिटी और बाजार कीमत, कृषि विभाग ने जारी की एडवाइजरी
Litchi Crop Disease: लीची माइट एक खतरनाक कीट है जो लीची की पत्तियों और फलों को नुकसान पहुंचाता है. इसके संक्रमण से पत्तियां सिकुड़ने और भूरी पड़ने लगती हैं, जबकि फल छोटे, कमजोर और कम मीठे हो जाते हैं. इससे फसल की क्वालिटी और बाजार कीमत दोनों प्रभावित होती हैं. समय पर पहचान और सही उपचार से लीची की फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है.
Mite Attack In Litchi: बिहार समेत देश के कई हिस्सों में इन दिनों लीची की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है. खासकर मुजफ्फरपुर की लीची अपनी मिठास और गुणवत्ता के लिए देशभर में मशहूर है. लेकिन अब लीची उत्पादक किसानों के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो रही है, ‘लीची माइट’ का हमला. बागवानी निदेशालय, कृषि विभाग (बिहार) के अनुसार, अगर समय रहते इसकी पहचान और नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह कीट लीची की क्वालिटी और उत्पादन दोनों को काफी नुकसान पहुंचा सकता है.
क्या है लीची माइट?
लीची माइट एक बेहद छोटा कीट होता है, जिसे सामान्य आंखों से देख पाना मुश्किल होता है. यह कीट लीची के पत्तों पर हमला करता है और धीरे-धीरे पूरे पौधे को प्रभावित करने लगता है. कृषि विभाग के अनुसार, इसकी वजह से पत्तियां सिकुड़ने लगती हैं और उनका रंग भूरा पड़ जाता है. हालांकि, कई किसान इसके शुरुआती लक्षणों को सामान्य बीमारी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यही लापरवाही बाद में बड़े नुकसान की वजह बन सकती है.
फसल को कैसे पहुंचाता है नुकसान?
लीची माइट का असर सीधे फलों की क्वालिटी पर पड़ता है. संक्रमित पेड़ों पर लगने वाले फल छोटे और कमजोर हो जाते हैं. इतना ही नहीं, फलों की नेचुरल मिठास और रंग भी कम होने लगता है. जब फल की क्वालिटी खराब होती है, तो बाजार में उसकी कीमत भी घट जाती है. इसका असर किसानों की कमाई पर पड़ता है. खासकर एक्सपोर्ट होने वाली लीची के लिए यह समस्या और गंभीर मानी जाती है, क्योंकि खराब क्वालिटी वाले फलों की मांग विदेशी बाजारों में कम हो जाती है.
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समय पर पहचान और सही प्रबंधन ही आपकी लीची फसल को सुरक्षित रख सकता है।@iprdbihar @mygovindia
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किन लक्षणों से करें पहचान?
अगर लीची के पेड़ों की पत्तियां सिकुड़ने लगें, उन पर भूरे रंग के धब्बे दिखाई दें या पत्तियां असामान्य रूप से सूखने लगें, तो यह लीची माइट के संक्रमण का संकेत हो सकता है. इसके अलावा पेड़ों की नई पत्तियों का विकास रुक जाना और फलों का सामान्य आकार से छोटा रह जाना भी इस कीट का असर है. विभाग के अनुसार अगर शुरुआती अवस्था में ही पहचान कर ली जाए तो फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है.
बचाव के लिए क्या करें?
कृषि विभाग ने इससे बचाव के लिए किसानों को सलाह दी है कि, संक्रमित और भूरी पत्तियों को तुरंत तोड़कर नष्ट कर दें. इससे माइट का फैलाव काफी हद तक रोका जा सकता है. इसके साथ ही सल्फर 80 फीसदी WP का 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने की सलाह दी गई है. यह छिड़काव माइट नियंत्रण में असरदार माना जाता है. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी दवा का इस्तेमाल कृषि विशेषज्ञ की सलाह के बाद ही करना चाहिए, ताकि सही मात्रा और सही समय पर उपचार किया जा सके.
लीची की बेहतर पैदावार और क्वालिटी बनाए रखने के लिए किसानों का जागरूक होना बेहद जरूरी है. समय पर पहचान, सही दवा और नियमित निगरानी से लीची माइट के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है.