पराली जलाई तो खेत हो जाएगा कमजोर! बिहार कृषि विभाग ने बताया पैदावार बढ़ाने का सबसे आसान तरीका

कटाई के बाद खेत में बची पराली को जलाना मिट्टी, फसल और पर्यावरण तीनों के लिए नुकसानदायक है. बिहार कृषि विभाग किसानों को मशीन से मिट्टी में मिलाने, खाद बनाने और पशु चारे में उपयोग की सलाह दे रहा है, जिससे मिट्टी उपजाऊ होगी, लागत घटेगी और अगली फसल बेहतर होगी.

Saurabh Sharma
नोएडा | Published: 12 Apr, 2026 | 02:59 PM

Stubble Management: कटाई के बाद खेत में बची फसल का अवशेष यानी पराली अक्सर किसानों के लिए परेशानी बन जाता है. जल्दी खेत खाली करने के लिए कई किसान इसे जला देते हैं, लेकिन यही जल्दबाजी मिट्टी, फसल और सेहत तीनों के लिए नुकसानदायक साबित होती है. बिहार कृषि विभाग ने किसानों से साफ अपील की है कि पराली को जलाने के बजाय सही तरीके से प्रबंधन करें, क्योंकि यही अवशेष अगली फसल की ताकत बन सकता है. बिहार कृषि विभाग के अनुसार मशीनों की मदद से इसे मिट्टी में मिलाना, खाद बनाना या पशुओं के चारे में उपयोग करना ज्यादा फायदेमंद है. आसान शब्दों में कहें तो जो पराली आज बेकार लग रही है, वही कल खेत की उपज और किसानों की कमाई बढ़ा सकती है.

पराली जलाना क्यों है सबसे बड़ी गलती?

बिहार कृषि विभाग के अनुसार, कटाई के बाद खेत  में बचा अवशेष ही पराली कहलाता है. कई किसान समय बचाने के लिए इसे आग लगा देते हैं, लेकिन इसका सबसे बड़ा नुकसान मिट्टी की उर्वरता पर पड़ता है. पराली जलाने से मिट्टी के अंदर मौजूद अच्छे जीवाणु और जरूरी पोषक तत्व खत्म हो जाते हैं. इससे जमीन की ताकत कमजोर होती है और अगली फसल की पैदावार कम हो सकती है. सिर्फ खेत ही नहीं, इसका धुआं आसपास के लोगों और पशुओं के लिए भी परेशानी बढ़ाता है. सांस की दिक्कत, आंखों में जलन और प्रदूषण जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ती हैं. ऐसे में पराली जलाने से खेत भी कमजोर होता है और हवा भी खराब होती है.

मशीन से मिट्टी में मिलाएं, बनेगी प्राकृतिक खाद

कृषि विभाग किसानों को सलाह दे रहा है कि सुपर सीडर (Super Seeder), हैप्पी सीडर
(Happy Seeder) या CHH मशीनों की मदद से पराली को मिट्टी में मिला  दें. जब यह अवशेष मिट्टी में मिल जाता है, तो कुछ समय बाद सड़कर प्राकृतिक खाद बन जाता है. इससे मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़ता है और जमीन ज्यादा उपजाऊ बनती है. इस तरीके से किसान अगली फसल के लिए खाद पर होने वाला खर्च भी कम कर सकते हैं. ऐसे में पराली को मिट्टी में मिलाना खेत के लिए मुफ्त खाद देने जैसा है.

खाद और पशु चारे में भी हो सकता है उपयोग

बिहार कृषि विभाग ने यह भी बताया है कि पराली को सिर्फ मिट्टी  में मिलाना ही जरूरी नहीं, बल्कि इसे कम्पोस्ट खाद बनाने में भी इस्तेमाल किया जा सकता है. खेत के किनारे गड्ढा बनाकर पराली, गोबर और पानी मिलाकर अच्छी जैविक खाद तैयार की जा सकती है. यह खाद फसलों के लिए बहुत फायदेमंद रहती है. इसके अलावा कई फसलों की पराली को पशुओं के चारे के रूप में भी उपयोग किया जा सकता है. इससे पशुपालकों का चारे का खर्च कम होता है. यानी पराली को सही तरीके से संभालकर किसान एक साथ खेती और पशुपालन दोनों में फायदा ले सकते हैं.

साफ पर्यावरण और बेहतर पैदावार का डबल फायदा

पराली प्रबंधन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे पर्यावरण साफ रहता है और खेत की ताकत बढ़ती  है. जब किसान आग लगाने के बजाय अवशेष का उपयोग करते हैं, तो हवा प्रदूषित नहीं होती और मिट्टी में नमी भी बनी रहती है. इससे अगली फसल मजबूत होती है और पैदावार बेहतर मिलती है. बिहार कृषि विभाग लगातार किसानों को जागरूक कर रहा है कि वे पराली को बोझ नहीं, बल्कि खेत की संपत्ति समझें. विभाग का साफ संदेश है कि पराली जलाना नहीं, संभालना है समझदारी.

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