बढ़ती गर्मी और अल नीनो ने बिगाड़ा ‘आम के राजा’ का स्वाद, किसानों को भारी नुकसान
इस बार सिर्फ मौसम ही नहीं बल्कि पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव का असर भी आम कारोबार पर दिखाई दे रहा है. भारत दुनिया के सबसे बड़े आम उत्पादक देशों में शामिल है और हर साल बड़ी मात्रा में आम विदेशों में निर्यात करता है. लेकिन ईरान युद्ध और खाड़ी देशों के आसपास बढ़ते तनाव के कारण शिपिंग लागत काफी बढ़ गई है.
Alphonso mango crop loss: भारत में गर्मियों का मौसम आते ही आम की मिठास लोगों को लुभाने लगती है, लेकिन इस बार महाराष्ट्र के मशहूर अल्फांसो आम यानी हापुस की फसल पर मौसम की ऐसी मार पड़ी है कि किसान भारी संकट में आ गए हैं. देश और विदेश में सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले इस खास आम का उत्पादन इस साल बेहद कम हुआ है. लगातार बदलते मौसम, बढ़ती गर्मी और अल नीनो के असर ने अल्फांसो आम की खेती को बुरी तरह प्रभावित किया है.
इकोनॉमिक्स टाइम्स की खबर के अनुसार, महाराष्ट्र के देवगढ़, मालवन और कोंकण क्षेत्र अपने अल्फांसो आम के लिए दुनियाभर में मशहूर हैं. लेकिन इस बार यहां के कई बागों में फसल लगभग खत्म हो गई है. किसानों का कहना है कि पेड़ों पर या तो आम बहुत कम लगे या फिर समय से पहले खराब हो गए.
तापमान में उतार-चढ़ाव बना बड़ी वजह
कृषि अधिकारियों के मुताबिक दिसंबर और जनवरी के दौरान दिन और रात के तापमान में बड़ा अंतर देखने को मिला. इसका असर आम के फूल आने और फल बनने की प्रक्रिया पर पड़ा. इसके बाद अप्रैल और मई में सामान्य से ज्यादा गर्मी ने बची हुई फसल को भी नुकसान पहुंचा दिया.
विशेषज्ञों का कहना है कि अल नीनो की वजह से इस बार मौसम का पैटर्न काफी बदला हुआ है. अल नीनो एक ऐसा मौसमीय प्रभाव है जो दुनियाभर में अत्यधिक गर्मी, सूखा और असामान्य मौसम की स्थिति पैदा कर सकता है. इसका असर सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका की फसलों पर भी पड़ रहा है.
85 से 90 प्रतिशत तक फसल नुकसान
सरकारी वैज्ञानिकों और कृषि अधिकारियों द्वारा किए गए एक सर्वे में सामने आया कि देवगढ़ इलाके में इस बार अल्फांसो आम की फसल को 85 से 90 प्रतिशत तक नुकसान हुआ है. कई किसानों के बागों में मुश्किल से कुछ प्रतिशत ही फल बच पाए हैं.
26 वर्षीय बागवानी विशेषज्ञ और किसान कोमल वाल्के ने इकोनॉमिक्स टाइम्स को बताया कि उनके परिवार के तीन एकड़ के बाग में इस बार लगभग कोई उत्पादन नहीं हुआ. ऑनलाइन किराना कंपनियों के ऑर्डर पूरे करने के लिए उन्हें दूसरे बड़े किसानों से आम खरीदना पड़ रहा है. उनका कहना है कि अगर समय पर सप्लाई नहीं दी गई तो अगले साल बड़े ग्राहक वापस नहीं आएंगे.
आम व्यापार पर भी पड़ा असर
इस बार सिर्फ मौसम ही नहीं बल्कि पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव का असर भी आम कारोबार पर दिखाई दे रहा है. भारत दुनिया के सबसे बड़े आम उत्पादक देशों में शामिल है और हर साल बड़ी मात्रा में आम विदेशों में निर्यात करता है. लेकिन ईरान युद्ध और खाड़ी देशों के आसपास बढ़ते तनाव के कारण शिपिंग लागत काफी बढ़ गई है. आम निर्यातकों का कहना है कि माल ढुलाई का खर्च दोगुने से ज्यादा हो गया है. कई जगहों पर शिपमेंट में देरी और कैंसिलेशन की वजह से निर्यात करीब 40 प्रतिशत तक घट गया है. जो आम विदेश भेजे जाने थे, अब उन्हें स्थानीय बाजारों में बेचना पड़ रहा है. इससे बाजार में सप्लाई बढ़ गई और कीमतों पर दबाव पड़ने लगा, जबकि उत्पादन कम हुआ है.
हजारों लोगों की आजीविका पर असर
महाराष्ट्र के कोंकण इलाके की अर्थव्यवस्था काफी हद तक आम और मछली कारोबार पर निर्भर करती है. ऐसे में आम की फसल खराब होने से सिर्फ किसानों ही नहीं बल्कि मजदूरों, पैकिंग कारोबारियों और ट्रांसपोर्ट सेक्टर को भी नुकसान हो रहा है.
मालवन में आम के डिब्बे बनाने वाले कारोबारी संजय नारे ने बताया कि इस साल उनके कारखाने में करीब एक लाख खाली डिब्बे बिना बिके पड़े हैं. उनका कहना है कि आम का सीजन यहां के लोगों की कमाई का सबसे बड़ा सहारा होता है.
भारत के आम बाजार पर भी असर
भारत दुनिया का सबसे बड़ा आम उत्पादक देश है. साल 2024-25 में देश में करीब 2.8 करोड़ टन आम उत्पादन हुआ था. पिछले साल भारत के आम बाजार की कीमत करीब 2.3 अरब डॉलर आंकी गई थी और आने वाले वर्षों में इसके और बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही थी. लेकिन इस बार मौसम की मार ने किसानों की उम्मीदों को बड़ा झटका दिया है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जलवायु परिवर्तन और असामान्य मौसम का असर इसी तरह बढ़ता रहा तो आने वाले वर्षों में आम उत्पादन पर और बड़ा संकट खड़ा हो सकता है.
कृषि विशेषज्ञ अब किसानों को आधुनिक सिंचाई, मौसम आधारित खेती और फसल सुरक्षा तकनीकों को अपनाने की सलाह दे रहे हैं ताकि बदलते मौसम के असर को कुछ हद तक कम किया जा सके.