जलवायु परिवर्तन की मार से जूझ रहा भारत का झींगा उद्योग, बीमारियां और नुकसान भी बने बड़ी समस्या

झींगा पालन में पानी का तापमान बेहद महत्वपूर्ण होता है. जब तापमान सामान्य सीमा से थोड़ा भी ऊपर जाता है, तो झींगों के शरीर पर असर पड़ता है. तापमान बढ़ने से झींगों की गतिविधि तो बढ़ती है, लेकिन उनकी बढ़ोतरी सही तरीके से नहीं हो पाती. इससे उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है और वे जल्दी बीमार पड़ने लगते हैं.

नई दिल्ली | Published: 3 May, 2026 | 12:28 PM

Shrimp farming: भारत का झींगा (श्रिम्प) उद्योग लंबे समय से देश के समुद्री निर्यात का मजबूत आधार रहा है. लेकिन अब इस क्षेत्र के सामने एक नई चुनौती तेजी से उभर रही है जलवायु परिवर्तन. पहले जिसे भविष्य का खतरा माना जाता था, वह अब किसानों और उत्पादकों की रोजमर्रा की हकीकत बन चुका है.

आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु और गुजरात जैसे तटीय राज्यों में झींगा पालन करने वाले किसानों को अब मौसम के बदलते मिजाज के साथ तालमेल बिठाना पड़ रहा है. पानी के तापमान में बदलाव, अनियमित बारिश और बढ़ते रोगों के कारण उत्पादन पर सीधा असर पड़ रहा है.

बढ़ता तापमान बना सबसे बड़ी समस्या

बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, झींगा पालन में पानी का तापमान बेहद महत्वपूर्ण होता है. जब तापमान सामान्य सीमा से थोड़ा भी ऊपर जाता है, तो झींगों के शरीर पर असर पड़ता है. तापमान बढ़ने से झींगों की गतिविधि तो बढ़ती है, लेकिन उनकी बढ़ोतरी सही तरीके से नहीं हो पाती. इससे उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है और वे जल्दी बीमार पड़ने लगते हैं.

खासतौर पर गर्मियों के मौसम में “अर्ली मॉर्टेलिटी सिंड्रोम” और “व्हाइट स्पॉट वायरस” जैसी बीमारियां तेजी से फैल रही हैं. इसके कारण कई बार पूरी फसल खराब हो जाती है और किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है.

मौसम की अनिश्चितता से उत्पादन पर असर

सिर्फ तापमान ही नहीं, बल्कि मौसम की अनिश्चितता भी बड़ी समस्या बन चुकी है. चक्रवात, बाढ़ और अचानक बारिश जैसी घटनाएं झींगा पालन को प्रभावित कर रही हैं. बारिश के कारण पानी की खारापन (लवणता) अचानक बदल जाता है, जिससे झींगों के खाने और बढ़ने की प्रक्रिया प्रभावित होती है. कई बार तालाबों को भी नुकसान पहुंचता है, जिससे पूरी फसल खत्म हो सकती है. बड़े किसान तो इन समस्याओं से निपटने के लिए संसाधन जुटा लेते हैं, लेकिन छोटे किसानों के लिए यह स्थिति बेहद कठिन हो जाती है.

लवणता में बदलाव और बढ़ती लागत

झींगा पालन में पानी की लवणता संतुलित रहना बहुत जरूरी है. लेकिन बदलते मौसम के कारण इसे बनाए रखना मुश्किल हो गया है. कभी ज्यादा बारिश तो कभी समुद्री पानी का प्रभाव, दोनों मिलकर तालाब के पानी की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं. इससे झींगों की वृद्धि धीमी हो जाती है और उनका जीवन चक्र भी लंबा हो जाता है.

इस स्थिति को संभालने के लिए किसानों को ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है. उन्हें पानी बदलना, एरेशन सिस्टम लगाना और रसायनों का उपयोग बढ़ाना पड़ रहा है. इससे लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि बाजार में कीमतें उसी हिसाब से नहीं बढ़ रहीं.

निर्यात पर निर्भरता और बाजार का दबाव

भारत का झींगा उद्योग मुख्य रूप से निर्यात पर आधारित है. अमेरिका सबसे बड़ा खरीदार है, जहां 2024–25 में 3,11,948 टन झींगा निर्यात हुआ. इसके बाद चीन (1,36,164 टन) और यूरोपीय संघ (99,310 टन) का स्थान आता है. लेकिन जब उत्पादन मौसम के कारण प्रभावित होता है, तो इसका असर सीधे निर्यात पर पड़ता है. इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की स्थिति कमजोर हो सकती है.

नई तकनीकों से समाधान की कोशिश

इन चुनौतियों के बीच किसान और वैज्ञानिक नए समाधान खोजने में जुटे हैं. कुछ क्षेत्रों में बायोफ्लॉक तकनीक और पुनर्चक्रण जल प्रणाली (रीसर्कुलेटिंग सिस्टम) अपनाई जा रही है. इन तकनीकों की मदद से पानी की गुणवत्ता को नियंत्रित किया जा सकता है और बाहरी मौसम पर निर्भरता कम होती है. इसके अलावा, ऐसे झींगों की प्रजातियों पर भी शोध हो रहा है, जो बीमारियों के प्रति ज्यादा प्रतिरोधी हों. हालांकि, इन तकनीकों को अपनाने में लागत ज्यादा आती है, जिससे छोटे किसानों के लिए यह अभी आसान नहीं है.

नीतियों और सहायता की जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए बेहतर नीतियों की जरूरत है. किसानों को समय पर मौसम की जानकारी, मजबूत बीमा योजना और बुनियादी ढांचे की सुविधा मिलनी चाहिए. अभी कई किसान बीमा के दायरे में नहीं आते, जिससे उन्हें नुकसान का पूरा भार खुद उठाना पड़ता है.

वहीं भारत के झींगा उद्योग के लिए अब सिर्फ उत्पादन बढ़ाना ही काफी नहीं है, बल्कि बदलते मौसम के अनुसार खुद को ढालना भी जरूरी है. अगर सही तकनीक, नीति और बाजार का संतुलन बनाया जाए, तो यह उद्योग भविष्य में भी मजबूत बना रह सकता है. अब समय आ गया है कि खेती और मत्स्य पालन में “स्थिरता” को उतना ही महत्व दिया जाए जितना उत्पादन को दिया जाता है. तभी किसान सुरक्षित रहेंगे और देश की अर्थव्यवस्था भी मजबूत बनी रहेगी.

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