Livestock Disease: बरसात का मौसम जहां खेती के लिए फायदेमंद माना जाता है, वहीं पशुपालकों के लिए यह समय सबसे ज्यादा सावधानी बरतने का होता है. जुलाई से अक्टूबर के बीच मौसम में नमी, गंदगी और तापमान में बदलाव के कारण पशुओं में कई संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. अगर समय रहते इन बीमारियों की पहचान और बचाव नहीं किया जाए, तो पूरा पशुधन प्रभावित हो सकता है और पशुपालकों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है.
पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम (KVK Noida) के अनुसार, इस मौसम में गलघोंटू और लंगड़ी बुखार जैसी बीमारियां तेजी से फैलती हैं. इसलिए हर पशुपालक को इन बीमारियों के लक्षण और बचाव के उपाय जरूर पता होने चाहिए.
क्यों बढ़ जाता है बीमारी का खतरा?
बरसात के मौसम में पशु बाड़ों में नमी और गंदगी बढ़ जाती है. यही वातावरण बैक्टीरिया, वायरस और परजीवियों के पनपने के लिए अनुकूल होता है. मच्छर, मक्खी और किलनी (टिक) जैसे परजीवी भी इसी मौसम में तेजी से बढ़ते हैं. ये पशुओं का खून चूसने के साथ-साथ एक पशु से दूसरे पशु तक संक्रमण भी पहुंचा सकते हैं.
गलघोंटू रोग के लक्षण
गलघोंटू पशुओं में तेजी से फैलने वाली गंभीर बीमारी है. इसमें पशु को अचानक तेज बुखार आ जाता है, जो 106 से 107 डिग्री फारेनहाइट तक पहुंच सकता है.
इस बीमारी के प्रमुख लक्षण हैं:
- गले, गर्दन और छाती में सूजन
- सांस लेने में तकलीफ
- सांस लेते समय घरघराहट
- मुंह से ज्यादा लार निकलना
- आंखों का लाल होना
- सुस्ती और चारा-पानी छोड़ देना
अगर समय पर इलाज नहीं कराया जाए तो पशु की मौत भी हो सकती है.
लंगड़ी बुखार की पहचान कैसे करें?
लंगड़ी बुखार एक जीवाणु जनित बीमारी है, जो खासकर 6 महीने से 2 साल तक के स्वस्थ और मजबूत पशुओं में ज्यादा देखने को मिलती है.
इस बीमारी में:
- तेज बुखार आता है.
- टांगों की मांसपेशियों में सूजन हो जाती है.
- सूजन वाली जगह दबाने पर चर-चर जैसी आवाज आती है.
- प्रभावित हिस्सा ठंडा महसूस होता है.
- पशु लंगड़ाकर चलने लगता है या उठने-बैठने में परेशानी होती है.
ऐसे लक्षण दिखते ही तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए.
रोजाना रखें पशुओं पर नजर
पशु चिकित्सक के अनुसार, पशुपालकों को हर दिन अपने पशुओं के खानपान और व्यवहार पर ध्यान देना चाहिए. यदि पशु अचानक चारा कम खाने लगे, बिल्कुल खाना छोड़ दे या पहले की तुलना में सुस्त दिखाई दे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. कई बार बीमारी की शुरुआत ऐसे ही छोटे-छोटे संकेतों से होती है. समय रहते इलाज शुरू होने से पशु को बचाया जा सकता है और नुकसान भी कम होता है.
दूध उत्पादन पर भी पड़ता है असर
बीमार पशु केवल स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि दूध उत्पादन पर भी असर डालते हैं. जब पशु बीमार होता है, तो उसकी दूध देने की क्षमता घट जाती है. यदि रोजाना चारा बचने लगे या पशु की भूख कम हो जाए, तो यह भी बीमारी का संकेत हो सकता है. इसलिए पशुपालकों को पशु के खाने-पीने पर नियमित नजर रखनी चाहिए.
समय पर टीकाकरण जरूर कराएं
गलघोंटू, लंगड़ी बुखार और खुरपका-मुंहपका (FMD) जैसी बीमारियों के टीके समय पर लगवाने चाहिए. हालांकि टीका लगने के बाद भी लापरवाही नहीं करनी चाहिए. साफ-सफाई, नियमित निगरानी और पशु चिकित्सक की सलाह का पालन करना भी उतना ही जरूरी है. अगर पशुपालक समय रहते बीमारी के शुरुआती लक्षण पहचान लें, पशु बाड़े को साफ रखें और नियमित टीकाकरण कराएं, तो वे अपने पशुओं को गंभीर बीमारियों से बचाकर दूध उत्पादन और आय दोनों को सुरक्षित रख सकते हैं.