ICAR ने तैयार की अफ्रीकन स्वाइन फीवर की पहली स्वदेशी वैक्सीन, सूअर पालकों को मिलेगी बड़ी राहत

African Swine Fever Vaccine: ICAR ने अफ्रीकन स्वाइन फीवर (ASF) से बचाव के लिए भारत की पहली स्वदेशी वैक्सीन विकसित की है. यह वैक्सीन सूअरों में फैलने वाली जानलेवा बीमारी से सुरक्षा देगी और पशुपालकों के आर्थिक नुकसान को कम करने में मदद करेगी.

नोएडा | Updated On: 5 Aug, 2026 | 07:45 PM

ASF Vaccine India: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने पशुपालन के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है. वैज्ञानिकों ने अफ्रीकन स्वाइन फीवर (ASF) से बचाव के लिए भारत की पहली स्वदेशी वैक्सीन विकसित की है. इस वैक्सीन को ICAR के 97वें स्थापना दिवस के मौके पर केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह की मौजूदगी में देश को समर्पित किया. सरकार का मानना है कि यह वैक्सीन न सिर्फ सूअर पालकों को बड़ी राहत देगी, बल्कि भारत को पशु वैक्सीन निर्माण के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी अहम कदम साबित होगी.

क्या है अफ्रीकन स्वाइन फीवर?

अफ्रीकन स्वाइन फीवर (ASF) सूअरों में फैलने वाली एक बेहद खतरनाक वायरल बीमारी है. इस बीमारी में सूअरों को तेज बुखार, शरीर के अंदर रक्तस्राव और गंभीर संक्रमण हो जाता है. कई मामलों में इसकी मृत्यु दर 100 प्रतिशत तक पहुंच जाती है. भारत में यह बीमारी पहली बार साल 2020 में सामने आई थी. इसके बाद यह कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक फैल गई. इस बीमारी का सबसे ज्यादा असर पूर्वोत्तर राज्यों के छोटे और मध्यम सूअर पालकों पर पड़ा, जिनकी आजीविका इसी व्यवसाय पर निर्भर है.

करोड़ों रुपये का हुआ आर्थिक नुकसान

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, असम में 2020 और 2021 के दौरान ASF के कारण सूअरों की मौत और संक्रमित पशुओं को नष्ट करने से करीब 276 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. वहीं मिजोरम में वर्ष 2025 तक 11,382 से ज्यादा परिवार इस बीमारी से प्रभावित हुए और लगभग 982 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान दर्ज किया गया. यही वजह है कि, लंबे समय से इस बीमारी के लिए प्रभावी वैक्सीन की जरूरत महसूस की जा रही थी.

भोपाल के वैज्ञानिकों ने तैयार की स्वदेशी वैक्सीन

इस वैक्सीन को ICAR-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाई सिक्योरिटी एनिमल डिजीज (NIHSAD), भोपाल के वैज्ञानिकों ने विकसित किया है. यह एक लाइव एटेनुएटेड वैक्सीन है, जिसे ASF वायरस के जीनोटाइप-II के कमजोर रूप का इस्तेमाल करके तैयार किया गया है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे सामान्य MA-104 Cell Line तकनीक पर विकसित किया गया है, जिससे बड़े पैमाने पर कम लागत में इसका उत्पादन किया जा सकता है.

हर परीक्षण में साबित हुई प्रभावी

वैक्सीन को प्रयोगशाला और फील्ड दोनों स्तरों पर कई चरणों में परखा गया. वैज्ञानिकों ने इसकी सुरक्षा, शुद्धता, प्रभावशीलता, प्रतिरक्षा क्षमता और आनुवंशिक स्थिरता जैसे सभी महत्वपूर्ण मानकों की जांच की. सभी परीक्षण सफल रहे. पशुपालन एवं डेयरी विभाग (DAHD) के सहयोग से किए गए फील्ड ट्रायल में भी वैक्सीन ने अच्छे परिणाम दिए हैं.

कैसे दी जाएगी वैक्सीन?

सरकार के अनुसार यह वैक्सीन 8 सप्ताह या उससे अधिक उम्र के स्वस्थ सूअरों को लगाई जाएगी.

पशुपालकों को क्या होगा फायदा?

इस वैक्सीन के आने से देशभर के सूअर पालकों को कई बड़े फायदे मिलने की उम्मीद है.

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे छोटे और मध्यम स्तर के पशुपालकों को सबसे ज्यादा लाभ मिलेगा.

भारत बनेगा पशु वैक्सीन निर्माण में मजबूत

ICAR के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट ने कहा कि, यह उपलब्धि पशु विज्ञान के क्षेत्र में नए दौर की शुरुआत है. इससे भविष्य में अन्य पशु रोगों के लिए भी स्वदेशी वैक्सीन और नई तकनीकों के विकास का रास्ता खुलेगा. उन्होंने बताया कि, अभी तक व्यावसायिक रूप से लाइसेंस प्राप्त ASF वैक्सीन केवल वियतनाम में उपलब्ध थी. लेकिन भारत की यह स्वदेशी वैक्सीन कम लागत में बड़े स्तर पर तैयार की जा सकेगी, जिससे देश की जरूरतें पूरी होने के साथ-साथ भविष्य में निर्यात के अवसर भी बढ़ेंगे.

किसानों और पशुपालकों के लिए बड़ी राहत

सरकार का मानना है कि, यह वैक्सीन सिर्फ एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि पशुपालन क्षेत्र के लिए बड़ा आर्थिक सहारा भी है. अगर इसका व्यापक स्तर पर इस्तेमाल शुरू होता है, तो अफ्रीकन स्वाइन फीवर से होने वाले नुकसान में काफी कमी आ सकती है. इससे सूअर पालन से जुड़े लाखों किसानों और पशुपालकों की आय सुरक्षित होगी और भारत पशु स्वास्थ्य एवं वैक्सीन निर्माण के क्षेत्र में नई पहचान बना सकेगा.

Published: 5 Aug, 2026 | 08:22 PM

Topics: