IVF तकनीक से बद्री गाय की बछिया का जन्म, देसी नस्ल बचाने में बड़ी सफलता

OPU IVF Technology: उत्तराखंड की देसी बद्री गाय के संरक्षण और नस्ल सुधार में वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता मिली है. OPU-IVF तकनीक से तैयार बद्री भ्रूण को साहीवाल गाय में प्रत्यारोपित किया गया, जिससे 11 सितंबर 2026 को स्वस्थ बद्री बछिया का जन्म हुआ. इस तकनीक से बेहतर आनुवंशिक गुणों वाली बद्री गायों की संख्या तेजी से बढ़ाने में मदद मिल सकती है.

नोएडा | Published: 12 Sep, 2026 | 01:53 PM

Badri Cow OPU IVF: उत्तराखंड की देसी बद्री गाय को बचाने और उसकी नस्ल को बेहतर बनाने की दिशा में वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता मिली है. पहली बार OPU-IVF जैसी आधुनिक प्रजनन तकनीक की मदद से एक स्वस्थ बद्री बछिया का जन्म हुआ है. खास बात यह है कि बद्री गाय से तैयार भ्रूण को साहीवाल गाय के गर्भ में विकसित किया गया और 11 सितंबर 2026 को स्वस्थ बछिया का जन्म हुआ. यह काम आईसीएआर-राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (ICAR-NDRI), करनाल और जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर के वैज्ञानिकों ने मिलकर किया है. इस परियोजना को उत्तराखंड जैव प्रौद्योगिकी परिषद, हल्दी से आर्थिक सहयोग मिला.

क्या है OPU-IVF तकनीक?

ओपीयू-आईवीएफ एक आधुनिक प्रजनन तकनीक है, जिसकी मदद से अच्छी नस्ल और बेहतर आनुवंशिक गुणों वाले पशुओं की संख्या बढ़ाने की कोशिश की जाती है. इस प्रक्रिया में चुनी गई बद्री गाय से अल्ट्रासाउंड की मदद से अंडाणु निकाले जाते हैं. इसके बाद इन अंडाणुओं को लैब में तैयार किया जाता है और बेहतर आनुवंशिक गुणों वाले बद्री सांड के वीर्य से उनका निषेचन कराया जाता है. इससे तैयार भ्रूण को कुछ समय तक नियंत्रित माहौल में विकसित किया जाता है.

इसके बाद इस भ्रूण को ऐसी गाय के गर्भ में डाला जाता है, जिसका प्रजनन चक्र भ्रूण के विकास के हिसाब से तैयार किया गया हो. इसी प्रक्रिया के तहत बद्री गाय का भ्रूण साहीवाल गाय के गर्भ में डाला गया. इसके बाद साहीवाल गाय ने एक स्वस्थ बद्री बछिया को जन्म दिया.

एक गाय के अच्छे गुण कई संतानों तक पहुंचाने का मौका

पारंपरिक तरीके से प्रजनन कराने पर एक मादा पशु से सीमित संख्या में ही बच्चे मिल पाते हैं. ओपीयू-आईवीएफ तकनीक से इस प्रक्रिया को और तेज किया जा सकता है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, अच्छे आनुवंशिक गुणों वाली एक बद्री गाय से कम समय में कई भ्रूण तैयार किए जा सकते हैं. इससे उसके अच्छे गुण अगली पीढ़ी के ज्यादा पशुओं में पहुंचाए जा सकते हैं. इससे बद्री नस्ल को बेहतर बनाने का काम तेजी से हो सकता है.

2023 में शुरू हुआ था काम

बद्री गाय पर इस परियोजना का काम साल 2023 में शुरू हुआ था. जीबी पंत विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डॉ. एम.एस. चौहान की पहल और नेतृत्व में विश्वविद्यालय और आईसीएआर-एनडीआरआई के बीच वैज्ञानिक सहयोग शुरू हुआ. करीब तीन साल तक वैज्ञानिकों ने बद्री गाय में ओपीयू-आईवीएफ, भ्रूण तैयार करने और उसे गाय के गर्भ में डालने की प्रक्रिया विकसित करने पर काम किया. इसके लिए बेहतर आनुवंशिक गुणों वाली बद्री गायों को चुना गया. वहीं, निषेचन के लिए उत्तराखंड पशुधन विकास बोर्ड से मिले बेहतर आनुवंशिक गुणों वाले बद्री सांड के वीर्य का इस्तेमाल किया गया.

एक और बद्री बछड़े के जन्म का इंतजार

इस परियोजना के तहत एक और भ्रूण को दूसरी गाय के गर्भ में डाला गया है. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस गाय से अगले 5 से 7 दिनों में बद्री बछड़े का जन्म हो सकता है. इससे वैज्ञानिकों को इस तकनीक के नतीजों को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिलेगी. साथ ही, आगे इसे बड़े स्तर पर इस्तेमाल करने का रास्ता भी साफ हो सकता है.

बद्री गाय के संरक्षण में क्यों अहम है यह काम?

बद्री गाय उत्तराखंड की प्रमुख देसी नस्लों में शामिल है और इसे राज्य पशु का दर्जा मिला हुआ है. पहाड़ी और हिमालयी इलाकों के मौसम के हिसाब से आसानी से ढल जाने वाली इस नस्ल का संरक्षण काफी जरूरी माना जाता है. वैज्ञानिकों का मकसद सिर्फ बद्री गायों की संख्या बढ़ाना नहीं है. वे ज्यादा दूध देने और दूसरे अच्छे गुणों वाले पशुओं की संख्या बढ़ाने पर भी काम कर रहे हैं. इसके लिए अच्छे आनुवंशिक गुणों वाले पशुओं की पहचान करना और उनके आनुवंशिक संसाधनों को सुरक्षित रखना जरूरी है.

बद्री गाय की क्लोनिंग पर भी चल रहा काम

वैज्ञानिक टीम अब बेहतर उत्पादन क्षमता वाली बद्री गायों की क्लोनिंग पर भी काम कर रही है. शोध के दौरान क्लोनिंग के जरिए बद्री भ्रूण तैयार करने में सफलता मिलने की बात सामने आई है. आगे OPU-IVF और क्लोनिंग से तैयार भ्रूणों को साहीवाल, क्रॉसब्रेड और बद्री गायों में प्रत्यारोपित करने की योजना है. इससे अच्छे आनुवंशिक गुणों वाली बद्री गायों की संख्या बढ़ाने में मदद मिल सकती है.

बद्री बछिया का जन्म इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. आधुनिक प्रजनन तकनीक के इस्तेमाल से देशी नस्लों को बचाने के साथ उनके बेहतर गुणों को आगे बढ़ाने का रास्ता भी खुल सकता है. इससे आने वाले समय में उत्तराखंड में बद्री गाय के संरक्षण, नस्ल सुधार और पशुपालकों की आय बढ़ाने के लिए नई संभावनाएं बन सकती हैं.

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