गाय-भैंस का दूध अचानक हुआ कम? भूलकर भी न करें नजरअंदाज, ये रोग दे सकता है बड़ा झटका

अगर गाय या भैंस का दूध अचानक कम होने लगे, थनों में सूजन या दूध की गुणवत्ता बदल जाए तो इसे नजरअंदाज न करें. पशुपालन विशेषज्ञ कुंवर घनश्याम के अनुसार यह थनैला रोग का संकेत हो सकता है. समय पर पहचान, साफ-सफाई और इलाज से बड़ा आर्थिक नुकसान टाला जा सकता है.

नोएडा | Published: 9 Aug, 2026 | 10:48 AM

Mastitis in Cows: बरसात का मौसम दुधारू पशुओं के लिए कई संक्रामक बीमारियों का खतरा लेकर आता है. इस दौरान बढ़ी हुई नमी, गंदगी और बैक्टीरिया के कारण गाय और भैंस में थनैला रोग (मास्टाइटिस) होने की आशंका काफी बढ़ जाती है. यह बीमारी न केवल पशु के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, बल्कि दूध उत्पादन में भी भारी गिरावट ला सकती है. इससे पशुपालकों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है. पशुपालन विशेषज्ञ कुंवर घनश्याम के अनुसार, यदि समय रहते थनैला रोग के लक्षण पहचान लिए जाएं और उचित उपचार कराया जाए, तो इस बीमारी से होने वाले नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है.

थनों में संक्रमण से होता है थनैला रोग

पशुपालन विशेषज्ञ कुंवर घनश्याम के अनुसार, थनैला रोग  मुख्य रूप से बैक्टीरिया के संक्रमण के कारण होता है. यह संक्रमण पशु के थनों के माध्यम से शरीर में प्रवेश करता है और धीरे-धीरे पूरे थन को प्रभावित कर सकता है. बरसात के मौसम में बाड़े में नमी, गंदगी और अस्वच्छ वातावरण इस बीमारी के फैलने की संभावना को और बढ़ा देते हैं. थनैला रोग होने पर थनों में सूजन, गर्माहट और दर्द महसूस होता है. कई बार दूध सामान्य न होकर फटा हुआ, गाढ़ा, पानी जैसा या उसमें छोटे-छोटे थक्के दिखाई देने लगते हैं. यदि बीमारी बढ़ जाए तो पशु का भोजन कम हो जाता है, बुखार आ सकता है और दूध उत्पादन में तेजी से गिरावट आने लगती है.

इन लक्षणों को बिल्कुल न करें नजरअंदाज

विशेषज्ञों का कहना है कि पशुपालकों को रोजाना दूध निकालते  समय थनों की अच्छी तरह जांच करनी चाहिए. यदि थनों में लालिमा, सूजन, कठोरपन या अधिक गर्माहट महसूस हो, तो इसे सामान्य समस्या समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. इसी तरह यदि दूध का रंग, गाढ़ापन या गुणवत्ता बदलने लगे तो यह भी थनैला रोग का शुरुआती संकेत हो सकता है. ऐसी स्थिति में घरेलू उपचार पर निर्भर रहने के बजाय तुरंत पशु चिकित्सक की सलाह लेना जरूरी है. समय पर उपचार शुरू होने से संक्रमण फैलने से रोका जा सकता है और दूध उत्पादन को भी सुरक्षित रखा जा सकता है.

दूध निकालने से पहले और बाद में रखें पूरी सफाई

कुंवर घनश्याम के अनुसार, थनैला रोग से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका साफ-सफाई है. दूध निकालने से पहले  पशु के थनों को साफ पानी से धोकर साफ कपड़े से अच्छी तरह पोंछना चाहिए. दूध निकालने के बाद भी थनों की सफाई करना जरूरी है. आवश्यकता होने पर पशु चिकित्सक की सलाह से उपयुक्त कीटाणुनाशक घोल का उपयोग किया जा सकता है, जिससे हानिकारक जीवाणुओं की संख्या कम होती है. दूध निकालने वाले व्यक्ति को भी हाथों की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए. गंदे हाथ या दूषित बर्तन संक्रमण फैलाने का बड़ा कारण बन सकते हैं.

साफ बाड़ा और संतुलित आहार से मिलेगा बेहतर बचाव

बरसात के मौसम में पशुओं के रहने का स्थान हमेशा सूखा, साफ और हवादार होना चाहिए. बाड़े में पानी जमा नहीं होने देना चाहिए और गोबर व गंदगी की नियमित सफाई करनी चाहिए. साथ ही पशुओं को संतुलित आहार, स्वच्छ पेयजल और पर्याप्त खनिज मिश्रण उपलब्ध कराना भी जरूरी है, ताकि उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत बनी रहे. पशुपालन विशेषज्ञ कुंवर घनश्याम का कहना है कि यदि पशुपालक नियमित स्वास्थ्य जांच, साफ-सफाई, संतुलित पोषण और समय पर उपचार जैसी वैज्ञानिक व्यवस्थाओं को अपनाते हैं, तो थनैला रोग से काफी हद तक बचाव संभव है. इससे दुधारू पशु स्वस्थ रहते हैं, दूध उत्पादन बेहतर बना रहता है और पशुपालकों की आय पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है.

Topics: