AI बनेगा किसानों की ताकत, हर साल मिल सकता है 70,000 करोड़ रुपये का फायदा: जितेंद्र सिंह
सरकार ने बजट 2026–27 में ‘भारत-विस्तार’ (Bharat-VISTAAR) नाम का एक बहुभाषी एआई प्लेटफॉर्म प्रस्तावित किया है. यह प्लेटफॉर्म एग्रीस्टैक पोर्टल और आईसीएआर की कृषि जानकारी को एआई से जोड़कर किसानों को उनकी जरूरत के अनुसार सलाह देगा.
भारत की खेती अब एक नए मोड़ पर खड़ी है. जिस तरह हरित क्रांति ने देश को अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बनाया था, उसी तरह अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI खेती की अगली बड़ी क्रांति बन सकता है. केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा है कि अगर सही तरीके से AI का उपयोग किया जाए तो किसानों की आय में हर साल लगभग 70,000 करोड़ रुपये तक की बढ़ोतरी संभव है.
नई दिल्ली में आयोजित “ग्लोबल कॉन्फ्रेंस ऑन AI इन एग्रीकल्चर एंड इन्वेस्टर समिट 2026” में बोलते हुए उन्होंने बताया कि AI अब सिर्फ एक तकनीकी शब्द नहीं रहा, बल्कि यह खेती की असली समस्याओं का व्यावहारिक समाधान बनकर सामने आ रहा है.
छोटी बचत, बड़ा बदलाव
डॉ. सिंह ने एक सरल उदाहरण देते हुए समझाया कि देश में करीब 14 करोड़ खेती जोतें हैं, जिनमें से अधिकतर छोटे और सीमांत किसान हैं. अगर AI आधारित सलाह से हर किसान साल में केवल 5,000 रुपये भी बचा ले, चाहे वह सही समय पर बीज बोने से हो, उर्वरक का संतुलित उपयोग हो, कीटों की समय रहते पहचान हो या बेहतर बाजार से जुड़ाव, तो कुल मिलाकर देश के किसानों को करीब 70,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त फायदा हो सकता है.
उन्होंने कहा कि यह बदलाव किसी बड़े चमत्कार से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे सही फैसलों से आएगा. AI किसानों को सही समय पर सही जानकारी देकर जोखिम कम करेगा और उत्पादन बढ़ाने में मदद करेगा.
भारत-विस्तार और इंडिया AI मिशन
सरकार ने बजट 2026–27 में ‘भारत-विस्तार’ (Bharat-VISTAAR) नाम का एक बहुभाषी AI प्लेटफॉर्म प्रस्तावित किया है. यह प्लेटफॉर्म एग्रीस्टैक पोर्टल और आईसीएआर की कृषि जानकारी को AI से जोड़कर किसानों को उनकी जरूरत के अनुसार सलाह देगा. खास बात यह है कि यह सिस्टम कम इंटरनेट वाले ग्रामीण क्षेत्रों में भी मोबाइल फोन के जरिए काम कर सकेगा.
इसके साथ ही 10,372 करोड़ रुपये के ‘इंडिया AI मिशन’ के तहत देश में अपनी कंप्यूटिंग क्षमता, डेटा और स्टार्टअप इकोसिस्टम को मजबूत किया जा रहा है. सरकार चाहती है कि AI समाधान भारतीय मिट्टी, जलवायु और फसलों के अनुसार तैयार किए जाएं.
अपनी भाषा में मिलेगी सलाह
डॉ. सिंह ने ‘भारतजेन’ (BharatGen) पहल का भी जिक्र किया, जिसके तहत ‘एग्री परम’ नाम का एक विशेष कृषि मॉडल विकसित किया गया है. यह मॉडल 22 भारतीय भाषाओं में काम कर सकता है. इसका मतलब है कि अब किसान मराठी, भोजपुरी, कन्नड़ या किसी भी स्थानीय भाषा में सवाल पूछकर सलाह पा सकता है.
उन्होंने कहा कि तकनीक तभी सफल होगी जब वह किसान की भाषा बोले और उसकी जरूरत को समझे. AI का मकसद सिर्फ डेटा इकट्ठा करना नहीं, बल्कि किसान के काम को आसान बनाना है.
ड्रोन, सैटेलाइट और जलवायु पूर्वानुमान
आज ड्रोन और सैटेलाइट मैपिंग के जरिए मिट्टी की सेहत, जमीन का सही माप और फसल की स्थिति का आकलन किया जा रहा है. इससे ‘स्वामित्व मिशन’ और मृदा स्वास्थ्य कार्ड जैसी योजनाओं को मजबूती मिली है.
जलवायु परिवर्तन के दौर में मौसम की सही और समय पर जानकारी बेहद जरूरी है. AI आधारित अर्ली वार्निंग सिस्टम किसानों को पहले से आगाह कर सकता है, ताकि वे घबराने की बजाय योजना बनाकर काम करें.
शोध और साझेदारी पर जोर
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) एक ओपन और इंटरऑपरेबल इंडिया AI ओपन स्टैक विकसित कर रहा है, जिससे देश के अलग-अलग हिस्सों में बने एग्री-AI समाधान एक राष्ट्रीय ढांचे से जुड़ सकें.
अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन, आईआईटी, आईआईएससी और आईसीएआर जैसे संस्थानों के साथ मिलकर गहरे शोध को बढ़ावा दे रहा है. प्रस्तावित ‘नेशनल एग्री-AI रिसर्च नेटवर्क’ के जरिए फसल, मिट्टी और जलवायु से जुड़े भारतीय डेटा को मजबूत किया जाएगा.
निवेशकों के लिए बड़ा अवसर
डॉ. सिंह ने निवेशकों से भी अपील की कि वे कृषि AI को दुनिया का सबसे बड़ा अनछुआ उत्पादकता बाजार मानें. उन्होंने कहा कि जरूरत केवल पायलट प्रोजेक्ट्स की नहीं, बल्कि ऐसे मजबूत प्लेटफॉर्म्स की है जो लाखों किसानों तक पहुंचे.
उन्होंने साफ शब्दों में कहा, “किसान को AI सिर्फ दिखावे के लिए नहीं चाहिए, उसे उपयोगी समाधान चाहिए.” यही सोच इस पूरी पहल का आधार है.