महंगी खाद छोड़ें, छाछ अपनाएं… पौधों की सेहत में दिखेगा जबरदस्त बदलाव

छाछ में लैक्टिक एसिड, कैल्शियम, नाइट्रोजन और कई तरह के लाभकारी बैक्टीरिया मौजूद होते हैं. ये तत्व मिट्टी को जीवंत बनाते हैं. जब हम छाछ को पानी में मिलाकर पौधों में डालते हैं, तो यह मिट्टी में मौजूद अच्छे जीवाणुओं की संख्या बढ़ाती है. इससे पौधों की जड़ें मजबूत होती हैं और वे पोषक तत्व बेहतर तरीके से अवशोषित कर पाती हैं.

नई दिल्ली | Published: 16 Feb, 2026 | 08:46 AM

Gardening Tips: आजकल लोग अपने घरों की छत, बालकनी या खेत में बागवानी तो कर रहे हैं, लेकिन अक्सर यह शिकायत रहती है कि पौधे ठीक से बढ़ नहीं रहे, पत्तियां पीली पड़ रही हैं या फल-फूल कम लग रहे हैं. इसकी एक बड़ी वजह मिट्टी की घटती उर्वरता और रासायनिक खादों पर बढ़ती निर्भरता है. ऐसे में अगर हम रसोई में मौजूद कुछ प्राकृतिक चीजों का सही तरीके से उपयोग करें, तो पौधों की सेहत को बेहतर बनाया जा सकता है.

छाछ, जिसे अंग्रेजी में बटरमिल्क कहा जाता है, सिर्फ सेहत के लिए ही नहीं बल्कि बागवानी के लिए भी बेहद फायदेमंद है. सही मात्रा और तरीके से इस्तेमाल करने पर यह पौधों की वृद्धि तेज करती है, मिट्टी में अच्छे सूक्ष्मजीव बढ़ाती है और कई रोगों से बचाव करती है.

छाछ क्यों है पौधों के लिए लाभकारी?

छाछ में लैक्टिक एसिड, कैल्शियम, नाइट्रोजन और कई तरह के लाभकारी बैक्टीरिया मौजूद होते हैं. ये तत्व मिट्टी को जीवंत बनाते हैं. जब हम छाछ को पानी में मिलाकर पौधों में डालते हैं, तो यह मिट्टी में मौजूद अच्छे जीवाणुओं की संख्या बढ़ाती है. इससे पौधों की जड़ें मजबूत होती हैं और वे पोषक तत्व बेहतर तरीके से अवशोषित कर पाती हैं.

छाछ प्राकृतिक फफूंदनाशक के रूप में भी काम करती है. कई बार पौधों की पत्तियों पर पाउडरी मिल्ड्यू या काले धब्बों जैसी फफूंद लग जाती है. ऐसे में छाछ का हल्का घोल नियमित छिड़काव करने से फफूंद की समस्या काफी हद तक कम हो सकती है. इसके अलावा छाछ की हल्की गंध कई कीटों को पौधों से दूर रखने में मदद करती है. एफिड्स और मिलीबग जैसे कीटों के नियंत्रण में यह सहायक मानी जाती है.

छाछ का उपयोग कैसे करें?

छाछ का उपयोग हमेशा पानी में घोलकर करना चाहिए. सीधे गाढ़ी छाछ डालने से मिट्टी अधिक अम्लीय हो सकती है. सामान्य तौर पर एक लीटर पानी में लगभग 200 से 250 मिली बिना नमक वाली ताजा छाछ मिलाकर पौधों की जड़ों में डाली जा सकती है. महीने में दो से तीन बार यह प्रयोग पर्याप्त होता है.

अगर पत्तियों पर छिड़काव करना हो तो छाछ का पतला घोल बनाकर स्प्रे बोतल से हल्का छिड़काव करें. ध्यान रहे कि छाछ में नमक या मसाले न हों, क्योंकि इससे पौधों को नुकसान हो सकता है.

सब्जियों जैसे टमाटर, मिर्च, बैंगन, लौकी, तोरई, साथ ही फलदार पौधों और अधिकांश गमले वाले पौधों में इसका उपयोग किया जा सकता है. हालांकि रसीले पौधों में इसका प्रयोग सावधानी से करना चाहिए.

मिट्टी की उर्वरता घटने की असली वजह

आज खेती और बागवानी में रासायनिक उर्वरकों का अधिक उपयोग मिट्टी के लिए बड़ी समस्या बन गया है. लगातार रासायनिक खाद डालने से मिट्टी की प्राकृतिक संरचना कमजोर हो जाती है. उसकी जलधारण क्षमता कम होती है और वह सख्त होने लगती है.

जैविक खादों का उपयोग कम होने से मिट्टी में लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या घटती जा रही है. गोबर की सड़ी खाद, हरी खाद और वर्मी कम्पोस्ट जैसी पारंपरिक खादें मिट्टी को जीवंत बनाए रखती थीं, लेकिन इनके कम उपयोग से मिट्टी की सेहत प्रभावित हो रही है. गहरी और बार-बार जुताई भी मिट्टी में ऑक्सीजन की मात्रा कम कर देती है, जिससे जड़ों का विकास प्रभावित होता है.

घर पर मिट्टी की जांच का आसान तरीका

अगर आप जानना चाहते हैं कि आपकी मिट्टी में रेत, गाद और चिकनी मिट्टी कितनी मात्रा में है, तो जार मिट्टी परीक्षण एक आसान उपाय है. इसके लिए पारदर्शी कांच या प्लास्टिक का जार लें. जमीन से लगभग तीन फुट गहराई से मिट्टी निकालें. उसमें से कंकड़ और जड़ें हटा दें. जार को आधा मिट्टी से भरें और बाकी हिस्सा पानी से भर दें. कुछ बूंदें लिक्विड सोप डालें ताकि मिट्टी अच्छी तरह घुल सके.

जार का ढक्कन कसकर बंद करें और लगभग दो मिनट तक अच्छी तरह हिलाएं. कुछ ही मिनटों में रेत नीचे बैठ जाएगी. लगभग आधे घंटे में गाद की परत बनेगी और 24 घंटे बाद चिकनी मिट्टी ऊपर की परत के रूप में दिखाई देगी. इन परतों की मोटाई मापकर आप समझ सकते हैं कि आपकी मिट्टी किस प्रकार की है और उसमें सुधार की जरूरत है या नहीं.

प्राकृतिक उपायों से लौटेगी मिट्टी की सेहत

अगर हम रासायनिक खादों पर निर्भरता कम कर जैविक उपाय अपनाएं, जैसे छाछ, गोबर खाद और कम्पोस्ट का उपयोग करें, तो मिट्टी की सेहत धीरे-धीरे सुधर सकती है. स्वस्थ मिट्टी ही स्वस्थ पौधों और अच्छी पैदावार की आधारशिला है. छोटे-छोटे प्राकृतिक उपाय अपनाकर हम अपने बगीचे और खेत को ज्यादा उपजाऊ और टिकाऊ बना सकते हैं.

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