कॉमनवेल्थ गेम्स: दिहाड़ी मजदूरी से सिल्वर मेडल तक, करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा बनी ऋषिकांत सिंह की कहानी
Commonwealth Games 2026: कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय वेटलिफ्टर ऋषिकांत सिंह चानंबम ने पुरुषों के 60 किलोग्राम वर्ग में शानदार प्रदर्शन करते हुए सिल्वर मेडल जीता. आर्थिक तंगी, दिहाड़ी मजदूरी और पिता के ब्लड कैंसर जैसी मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी.
Rishikanta Singh Chanambam: कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के लिए एक और बड़ी खुशखबरी आई है. भारतीय वेटलिफ्टर ऋषिकांत सिंह चानंबम ने पुरुषों के 60 किलोग्राम वर्ग में शानदार प्रदर्शन करते हुए रजत पदक (सिल्वर मेडल) अपने नाम किया. लेकिन यह जीत सिर्फ एक मेडल की नहीं, बल्कि सालों के संघर्ष, मेहनत और परिवार के लिए किए गए त्याग की कहानी भी है. एक समय ऐसा था जब ऋषिकांत अपने परिवार का खर्च चलाने के लिए दिहाड़ी मजदूरी करते थे. आज वही खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का नाम रोशन कर रहा है.
मुश्किल हालात में भी नहीं छोड़ा सपना
ऋषिकांत का बचपन आर्थिक तंगी में बीता. उनके परिवार के पास अपनी खेती की जमीन भी नहीं थी. घर चलाने के लिए उनके माता-पिता दूसरों के खेतों में मजदूरी करते थे. परिवार की मदद करने के लिए ऋषिकांत ने भी कुछ समय तक दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम किया. उन्होंने बताया कि करीब दो से तीन महीने तक रोज जो भी काम मिलता था, वह करते थे और इसके बदले करीब 150 रुपये प्रतिदिन कमाते थे. इन मुश्किल हालात के बावजूद उन्होंने अपने खेल के सपने को कभी नहीं छोड़ा और लगातार मेहनत करते रहे.
पहले बनना चाहते थे बॉक्सर
आज भले ही दुनिया उन्हें एक सफल वेटलिफ्टर के रूप में जानती है, लेकिन उनका पहला सपना बॉक्सर बनने का था. उन्होंने कुछ समय तक बॉक्सिंग की ट्रेनिंग भी ली. मशहूर मुक्केबाज डिंग्को सिंह से प्रेरित होकर उन्होंने बॉक्सिंग को चुना था. लेकिन जब उन्होंने वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू किया और पहली जीत हासिल की, तब उन्हें एहसास हुआ कि उनका भविष्य इसी खेल में है. इसके बाद उन्होंने पूरी तरह वेटलिफ्टिंग पर ध्यान देना शुरू कर दिया.
पिता की बीमारी के बीच जीता सिल्वर
कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान ऋषिकांत के लिए सबसे मुश्किल समय यह था कि उनके पिता ब्लड कैंसर का इलाज करा रहे थे. वह राजस्थान के AIIMS जोधपुर में भर्ती थे, जबकि ऋषिकांत ग्लासगो में भारत के लिए पदक जीतने की तैयारी कर रहे थे. उन्होंने बताया कि बचपन से ही उनकी कोशिश रही है कि वह अपने पिता के चेहरे पर मुस्कान ला सकें. हाल ही में वह अपने पिता को स्कूटर खरीदने के लिए शोरूम भी लेकर गए थे, क्योंकि यह उनके पिता की लंबे समय से इच्छा थी.
चोट के बावजूद नहीं हारी हिम्मत
ऋषिकांत ने बताया कि प्रतियोगिता से पहले वह घुटने की चोट से परेशान थे. इसी वजह से वह अपनी योजना के मुताबिक अभ्यास नहीं कर पाए. उनका मानना है कि अगर वह पूरी तरह फिट होते तो गोल्ड मेडल भी जीत सकते थे. इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत के लिए सिल्वर मेडल जीत लिया. यह उनकी मेहनत और मजबूत इरादों का सबसे बड़ा उदाहरण है.
प्रधानमंत्री मोदी ने दी बधाई
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ऋषिकांत सिंह को उनकी शानदार सफलता पर बधाई दी. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि, ऋषिकांत ने सिल्वर मेडल जीतने के साथ अपना अब तक का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन भी किया है. प्रधानमंत्री ने कहा कि ऋषिकांत की कड़ी मेहनत, मजबूत इरादों और शानदार खेल ने पूरे देश का नाम रोशन किया है. उन्होंने उम्मीद जताई कि ऋषिकांत आगे भी ऐसे ही बेहतरीन प्रदर्शन करते रहेंगे और देश के युवाओं को खेलों में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेंगे.
युवाओं के लिए मिसाल बनी सफलता
ऋषिकांत सिंह चानंबम की कहानी इस बात का सबूत है कि अगर मेहनत और हौसला मजबूत हो, तो कोई भी मुश्किल रास्ता रोक नहीं सकती. कभी दिहाड़ी मजदूरी करने वाले ऋषिकांत आज अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के लिए सिल्वर मेडल जीतकर देश का नाम रोशन कर रहे हैं. उनका यह सफर सिर्फ खिलाड़ियों के लिए ही नहीं, बल्कि हर उस युवा के लिए प्रेरणा है, जो मुश्किल हालात के बावजूद अपने सपनों को पूरा करने की कोशिश कर रहा है. ऋषिकांत ने दिखा दिया कि लगन, मेहनत और कभी हार न मानने का जज्बा इंसान को बड़ी से बड़ी सफलता दिला सकता है.