यूरोप में गर्मी ने बिगाड़ा फसलों का खेल! समय से पहले पक रहा अनाज, भारतीय किसानों को बड़ी चेतावनी

यूरोप में बढ़ती गर्मी ने खेती की चिंता बढ़ा दी है. कई फसलें 20 दिन पहले पक रही हैं, लेकिन इससे पैदावार और दाने की गुणवत्ता घटने का खतरा है. विशेषज्ञों ने इसे भारत की रबी फसलों के लिए भी सीधी चेतावनी बताया है.

नोएडा | Updated On: 10 Sep, 2026 | 11:46 AM

लगातार बढ़ता तापमान और बेमौसम बारिश अब खेती के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं. गर्मी के कारण फसलों का पकने का समय कम हो रहा है, जिससे दाने का वजन और गुणवत्ता प्रभावित होने का खतरा बढ़ गया है. यूरोप में इसका असर साफ दिखाई दे रहा है, जहां 20 साल पहले की तुलना में कई फसलें अब कई हफ्ते पहले पक रही हैं. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यूरोप की यह स्थिति भारत के लिए भी बड़ी चेतावनी है, खासकर रबी फसलों के लिए.

गर्मी से समय से पहले पक रही फसलें

यूरोपीय आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, यूरोपीय संघ के कुछ हिस्सों में सर्दियों का गेहूं, मक्का और तिलहन  जैसी फसलें साल 2000 की तुलना में करीब 20 दिन पहले पक रही हैं. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, ‘एसएंडपी ग्लोबल एनर्जी’ की कृषि व्यापार सलाहकार स्वाति माथुर के अनुसार, फसल का जल्दी पकना हमेशा किसानों के लिए फायदे की बात नहीं होती. गर्मी और पानी की कमी के कारण फसल तेजी से पक जाती है, लेकिन दानों को पूरा पोषण मिलने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता. इससे उपज के साथ अनाज की गुणवत्ता भी घट सकती है. फ्रांस के कृषि मंत्रालय ने इस साल मक्के के उत्पादन में पिछले साल की तुलना में 35 प्रतिशत गिरावट का अनुमान जताया है. यानी फसल जल्दी पकने का मतलब यह नहीं है कि प्रति हेक्टेयर अधिक अनाज मिलेगा.

भारत की रबी फसलों पर भी बढ़ रहा खतरा

यूरोप का यह बदलाव भारत के लिए इसलिए अहम है क्योंकि यहां गेहूं जैसी रबी फसलें सर्दियों में बोई जाती हैं. मार्च-अप्रैल में जब गेहूं के दानों में दूध भरने का महत्वपूर्ण चरण होता है, उस समय तापमान बढ़ने से फसल का विकास प्रभावित हो सकता है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सीईएफ ग्रुप के संस्थापक और सीईओ मनिंदर सिंह नैय्यर के अनुसार, यूरोप की स्थिति भारत के लिए सीधी चेतावनी है. भारत में भी गर्मी के कारण गेहूं और दूसरी रबी फसलों में दाना बनने का समय कम हो रहा है. पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की मार्च 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, 1901 से 2018 के बीच भारत का औसत सतही तापमान 0.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है. हालांकि, फरवरी 2026 में गर्मी के बावजूद अधिक बुवाई और मौसम की मार सहने वाले बीजों के इस्तेमाल से भारत में उत्पादन संतुलित रहा.

फसल उत्पादन घटा तो किसानों की आमदनी पर असर

भारत में करीब 46.1 प्रतिशत लोग रोजगार के लिए पूरी तरह कृषि पर निर्भर हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2014-15 से 2025-26 के बीच कृषि क्षेत्र की आय यानी GVA 20.94 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 52.08 लाख करोड़ रुपये हो गई. इसी अवधि में खाद्यान्न उत्पादन  265.05 मिलियन टन से बढ़कर 376.56 मिलियन टन पहुंच गया है. कृषि निर्यात में भी बढ़ोतरी हुई है. लेकिन मौसम में लगातार हो रहे बदलाव से आने वाले समय में फसल की उपज पर दबाव बढ़ सकता है. मनिंदर सिंह नैय्यर के मुताबिक, उत्पादन में गिरावट का असर सरकारी खरीद, अनाज के स्टॉक और व्यापार पर पड़ सकता है. इसका सीधा असर किसानों की आमदनी और बाजार में खाद्यान्न की कीमतों पर भी देखने को मिल सकता है.

जलवायु-अनुकूल बीज और नई सिंचाई तकनीक जरूरी

बदलते मौसम के बीच कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को खेती  की रणनीति में तेजी से बदलाव करना होगा. बढ़ती आबादी की भोजन और पशुओं के लिए चारे की जरूरत पूरी करने के लिए ऐसी फसल किस्मों को बढ़ावा देना जरूरी है, जो अधिक गर्मी और बदलते मौसम की मार सह सकें. इसके साथ ही पानी की उपलब्धता को देखते हुए नई और बेहतर सिंचाई तकनीकों को अपनाना भी जरूरी हो गया है. जलवायु-अनुकूल बीज, बेहतर सिंचाई व्यवस्था और मौसम के अनुसार खेती की रणनीति किसानों को उत्पादन में संभावित गिरावट से बचाने में अहम भूमिका निभा सकती है. यूरोप में समय से पहले पकती फसलें इस बात का संकेत हैं कि बदलती जलवायु का असर अब खेती के भविष्य पर सीधे पड़ रहा है.

Published: 10 Sep, 2026 | 11:37 AM

Topics: