हरियाणा में पराली जलाने के मामलों में बड़ा विस्फोट, एक साल में 92 फीसदी बढ़ीं खेतों में आग की घटनाएं
कृषि और किसान कल्याण विभाग के अधिकारियों का कहना है कि कई मामलों में खेतों में आग शॉर्ट सर्किट जैसी दुर्घटनाओं की वजह से लगी. हालांकि अधिकारियों ने यह भी माना कि कुछ किसानों ने जानबूझकर पराली में आग लगाई, जो बाद में तेज हवाओं और सूखे मौसम के कारण आसपास के खेतों तक फैल गई.
Haryana stubble burning: हरियाणा में इस बार गेहूं कटाई के सीजन के दौरान खेतों में आग लगाने के मामलों में बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई है. राज्य में पराली और फसल अवशेष जलाने की घटनाएं पिछले साल के मुकाबले लगभग दोगुनी हो गई हैं. इससे पर्यावरण प्रदूषण को लेकर चिंता बढ़ गई है और प्रशासन भी अलर्ट मोड में आ गया है.
आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2026 में अब तक खेतों में आग लगने के 3,355 मामले सामने आ चुके हैं, जबकि 2025 में इसी अवधि में यह संख्या 1,745 थी. यानी सिर्फ एक साल में 1,610 मामलों की बढ़ोतरी हुई है, जो करीब 92 प्रतिशत अधिक है. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इसी तरह घटनाएं बढ़ती रहीं तो आने वाले समय में वायु गुणवत्ता और खेती दोनों पर गंभीर असर पड़ सकता है.
पांच साल में सबसे ज्यादा मामले
द ट्रिब्यून की खबर के अनुसार, राज्य सरकार के रिकॉर्ड बताते हैं कि पिछले पांच वर्षों में इस बार खेतों में आग लगने के सबसे ज्यादा मामले सामने आए हैं. 2024 में हरियाणा में 3,077 मामले दर्ज हुए थे. वहीं 2023 में यह संख्या 1,887 और 2022 में 2,872 थी. इस बार के आंकड़े इन सभी वर्षों से ज्यादा चिंता बढ़ाने वाले माने जा रहे हैं.
जींद बना सबसे ज्यादा प्रभावित जिला
इस बार खेतों में आग लगने के मामलों में जींद जिला सबसे आगे निकल गया है. 19 मई तक यहां 492 मामले दर्ज किए गए हैं. इसके बाद रोहतक में 429, झज्जर में 324 और सोनीपत में 306 घटनाएं सामने आई हैं. कैथल में 276, फतेहाबाद में 255, सिरसा में 254 और करनाल में 198 मामले दर्ज हुए हैं.
इसके अलावा पानीपत में 172, हांसी में 146, हिसार में 90, भिवानी में 89 और अंबाला में 85 मामले सामने आए हैं. कुरुक्षेत्र में 77, पलवल में 43, फरीदाबाद में 26, चरखी दादरी और गुरुग्राम में 25-25 मामले दर्ज किए गए हैं.
यमुनानगर में 19, नूंह में 13, पंचकूला में 6 और रेवाड़ी में 5 घटनाएं दर्ज की गई हैं. पिछले साल की तुलना करें तो उस समय फतेहाबाद सबसे ज्यादा प्रभावित जिला था, जहां 215 मामले सामने आए थे. इसके बाद सोनीपत में 205 और जींद में 171 घटनाएं हुई थीं.
प्रशासन बोला- कई घटनाएं हादसे भी
कृषि और किसान कल्याण विभाग के अधिकारियों का कहना है कि कई मामलों में खेतों में आग शॉर्ट सर्किट जैसी दुर्घटनाओं की वजह से लगी. हालांकि अधिकारियों ने यह भी माना कि कुछ किसानों ने जानबूझकर पराली में आग लगाई, जो बाद में तेज हवाओं और सूखे मौसम के कारण आसपास के खेतों तक फैल गई. खबर के अनुसार, ऐसे मामलों में किसानों के खिलाफ FIR दर्ज की गई है और जुर्माना भी लगाया गया है.
किसानों के खिलाफ कार्रवाई शुरू
प्रशासन अब पराली जलाने के मामलों को गंभीरता से ले रहा है. करनाल जिले में ही नियम तोड़ने वाले किसानों के खिलाफ 14 एफआईआर दर्ज की गई हैं. इसके अलावा करीब 70 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है.
करनाल के डिप्टी डायरेक्टर एग्रीकल्चर (DDA) डॉ. वजीर सिंह ने बताया कि विभाग की टीमें पूरे सीजन में गांव-गांव जाकर किसानों को जागरूक कर रही हैं. किसानों को समझाया जा रहा है कि पराली जलाने की बजाय उसका इस्तेमाल पशुओं के चारे और दूसरे कामों में किया जा सकता है.
जागरूकता अभियान भी तेज
राज्य सरकार ने जिला, ब्लॉक और गांव स्तर पर समितियां बनाई हैं, जो किसानों को जागरूक करने का काम कर रही हैं. अधिकारियों का कहना है कि किसानों को लगातार बताया जा रहा है कि खेतों में आग लगाने से मिट्टी की उर्वरता कम होती है और पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचता है. सरकार चाहती है कि किसान फसल अवशेषों का सही उपयोग करें और आग लगाने से बचें.
किसानों की भी अपनी मजबूरी
कई किसानों का कहना है कि समय की कमी और मशीनों का खर्च ज्यादा होने की वजह से वे पराली जलाने को मजबूर हो जाते हैं. हालांकि कुछ किसान अब जागरूक भी हो रहे हैं. राजिंदर नाम के एक किसान के अनुसार, वह पराली नहीं जलाते, बल्कि उसे पशुओं के चारे के रूप में इस्तेमाल करते हैं. उनका कहना है कि अगर सही तरीके से उपयोग किया जाए तो पराली किसानों के लिए फायदेमंद भी साबित हो सकती है.
प्रदूषण और मौसम पर बढ़ता असर
विशेषज्ञों के अनुसार खेतों में आग लगने की घटनाओं का असर सिर्फ गांवों तक सीमित नहीं रहता. इससे धुआं और प्रदूषण बढ़ता है, जो शहरों तक पहुंचता है. इसके अलावा लगातार बढ़ रही गर्मी और बदलते मौसम के बीच खेतों में आग की घटनाएं पर्यावरण के लिए और खतरनाक बनती जा रही हैं.