हरियाणा में पराली जलाने के मामलों ने तोड़े 5 साल के सारे रिकॉर्ड, हजारों खेतों में लगी आग… प्रशासन अलर्ट पर
Haryana stubble burning: राज्य में इस साल एक अप्रैल से 13 मई तक 3279 जगहों पर खेतों में आग लगने की घटनाएं दर्ज की गई हैं. पिछले पांच सालों में यह सबसे ज्यादा आंकड़ा है. सबसे बड़ी बात यह है कि पिछले साल इसी समय केवल 1493 मामले सामने आए थे. यानी एक साल में पराली जलाने की घटनाएं दोगुने से भी ज्यादा बढ़ गई हैं.
Haryana stubble burning: हरियाणा में इस बार गेहूं की कटाई के बाद खेतों में पराली जलाने के मामलों ने प्रशासन और पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है. राज्य में इस साल एक अप्रैल से 13 मई तक 3279 जगहों पर खेतों में आग लगने की घटनाएं दर्ज की गई हैं. पिछले पांच सालों में यह सबसे ज्यादा आंकड़ा है.
सबसे बड़ी बात यह है कि पिछले साल इसी समय केवल 1493 मामले सामने आए थे. यानी एक साल में पराली जलाने की घटनाएं दोगुने से भी ज्यादा बढ़ गई हैं. इससे पहले वर्ष 2022 में 2810 और वर्ष 2024 में 2793 मामले सामने आए थे. वहीं वर्ष 2023 में यह संख्या 1783 रही थी. उपग्रह से मिली निगरानी रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल के आखिरी सप्ताह के बाद खेतों में आग लगाने की घटनाएं तेजी से बढ़ने लगीं. मई के शुरुआती दिनों में हालात और ज्यादा गंभीर हो गए.
गेहूं की कटाई के बाद बढ़े आग लगाने के मामले
TOI की खबर के अनुसार, कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि गेहूं की कटाई पूरी होने के बाद किसान अगली फसल की तैयारी में जुट जाते हैं. खेत जल्दी खाली करने के लिए कई किसान पराली में आग लगा देते हैं.
हरियाणा में अप्रैल महीने से गेहूं की कटाई शुरू हो जाती है और मई के आखिर तक पराली जलाने के मामले सामने आते रहते हैं. इस बार मौसम ज्यादा सूखा रहा और गर्मी भी तेज पड़ी. यही वजह है कि खेतों में सूखी पराली तेजी से आग पकड़ रही है.
जींद जिले में सबसे ज्यादा मामले
इस बार सबसे ज्यादा पराली जलाने की घटनाएं जींद जिले में दर्ज की गई हैं. यहां 487 मामलों की पुष्टि हुई है. इसके बाद रोहतक में 425, झज्जर में 323 और सोनीपत में 299 घटनाएं सामने आईं. कैथल में 252, सिरसा में 248, फतेहाबाद में 246 और हिसार में 229 मामले दर्ज किए गए.
कुछ जिलों में पिछले साल के मुकाबले काफी ज्यादा बढ़ोतरी देखने को मिली. करनाल में पिछले साल 100 मामले थे, जो इस बार बढ़कर 196 हो गए. पानीपत में 57 से बढ़कर 170 मामले दर्ज किए गए. कुरुक्षेत्र में 41 से बढ़कर 72 और भिवानी में 30 से बढ़कर 87 घटनाएं सामने आईं.
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के जिलों में भी बढ़ी परेशानी
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से जुड़े जिलों में भी इस बार खेतों में आग लगाने के मामलों ने चिंता बढ़ा दी है. गुरुग्राम में पिछले साल एक भी मामला सामने नहीं आया था, लेकिन इस बार यहां 24 घटनाएं दर्ज की गई हैं.
फरीदाबाद में पिछले साल केवल 6 मामले थे, जबकि इस बार यह संख्या बढ़कर 25 पहुंच गई. पलवल में 13 से बढ़कर 43 मामले हो गए. वहीं मेवात में भी इस बार 13 घटनाएं दर्ज की गईं, जबकि पिछले साल वहां कोई मामला नहीं था. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते इस पर रोक नहीं लगी तो इसका असर आने वाले दिनों में हवा की गुणवत्ता पर साफ दिखाई देगा.
मौसम और गर्मी बनी बड़ी वजह
कृषि विभाग के मुताबिक इस बार गर्मी सामान्य से ज्यादा रही है. तेज धूप और सूखे मौसम के कारण खेतों में बचा गेहूं का अवशेष जल्दी सूख गया. ऐसे में आग लगने और फैलने की घटनाएं तेजी से बढ़ीं. अधिकारियों का कहना है कि कई किसान समय और खर्च बचाने के लिए पराली में आग लगा देते हैं, लेकिन इससे मिट्टी की उर्वरता पर बुरा असर पड़ता है. साथ ही वातावरण में धुआं और जहरीली गैसें फैलती हैं.
किसानों को जागरूक करने में जुटा प्रशासन
राज्य सरकार ने जिलों के प्रशासन को पराली जलाने से रोकने के लिए जागरूकता अभियान तेज करने के निर्देश दिए हैं. कृषि विभाग की टीमें गांव-गांव जाकर किसानों को इसके नुकसान समझा रही हैं. अधिकारियों का कहना है कि किसानों को मशीनें उपलब्ध कराने और सही जानकारी देने से इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है.
खबर के अनुसार, किसानों को यह भी बताया जा रहा है कि पराली को जलाने के बजाय खेत में मिलाकर जैविक खाद बनाई जा सकती है. इसके लिए फसल अवशेष प्रबंधन मशीनों के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जा रहा है.
विशेषज्ञों ने जताई चिंता
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि धान की पराली की तुलना में गेहूं की पराली से प्रदूषण कम होता है, लेकिन इस बार मामलों में आई तेज बढ़ोतरी चिंता बढ़ाने वाली है. 1 अप्रैल से अब तक पंजाब और हरियाणा में 12 हजार से ज्यादा खेतों में आग लगने की घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं. उनका कहना है कि अब गेहूं की पराली को लेकर भी गंभीर योजना बनाने की जरूरत है.
पहले गेहूं का भूसा पशुओं के चारे के रूप में काफी इस्तेमाल होता था, लेकिन अब खेती और पशुपालन के तरीकों में बदलाव आने से इसकी मांग कम हो गई है. इसी वजह से किसान पराली को बेकार समझकर जला रहे हैं.