अल नीनो और एथेनॉल ने बिगाड़ा गणित, 30 साल के निचले स्तर पर चीनी स्टॉक, आयात की बढ़ी आशंका
India Sugar Crisis: भारत में आने वाले कुछ सालों तक चीनी की कमी देखने को मिल सकती है. इसकी बड़ी वजह कमजोर मानसून, अल नीनो का असर और एथेनॉल की बढ़ती मांग है. सरकार पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने को बढ़ावा दे रही है, जिससे गन्ने का बड़ा हिस्सा एथेनॉल बनाने में इस्तेमाल हो रहा है.
Sugar Production India: भारत कभी दुनिया के बड़े चीनी निर्यातक देशों में गिना जाता था, लेकिन अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं. आने वाले कुछ सालों में देश के पास निर्यात के लिए पर्याप्त चीनी बचना मुश्किल हो सकता है. मौसम में हो रहे बदलाव और एथेनॉल की बढ़ती मांग ने चीनी उद्योग के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. अगर हालात ऐसे ही बने रहे तो भारत को अगले तीन साल तक चीनी निर्यात रोकना पड़ सकता है. इतना ही नहीं, भविष्य में देश को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए चीनी आयात भी करना पड़ सकता है.
अल नीनो का असर गन्ने की खेती पर
इस समय सबसे बड़ी चिंता अल नीनो (El Nino) मौसम प्रणाली को लेकर है. इसके कारण देश में मानसून कमजोर रहने की संभावना जताई जा रही है. मौसम विभाग के अनुमान के अनुसार इस साल बारिश सामान्य से काफी कम हो सकती है.
कम बारिश का सीधा असर गन्ने की खेती पर पड़ रहा है. कई किसानों ने गन्ने की बुवाई टाल दी है, जबकि कुछ किसान अब सोयाबीन, अरहर और अन्य कम पानी वाली फसलों की ओर रुख कर रहे हैं. महाराष्ट्र सहित कई प्रमुख गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता भी सीमित की जा रही है. अगर यही स्थिति बनी रहती है तो आने वाले सालों में गन्ने का उत्पादन और घट सकता है, जिससे चीनी की उपलब्धता पर दबाव बढ़ेगा.
एथेनॉल की बढ़ती मांग ने बदला समीकरण
भारत सरकार पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की योजना को तेजी से आगे बढ़ा रही है. इसका उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना है. इसके लिए चीनी मिलों से बड़ी मात्रा में गन्ने और शीरे का उपयोग एथेनॉल उत्पादन में किया जा रहा है.
हाल ही में देश में फ्लेक्स-फ्यूल कार और मोटरसाइकिल भी लॉन्च की गई हैं, जो अधिक एथेनॉल मिश्रित ईंधन पर चल सकती हैं. बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, उद्योग से जुड़े जानकारों का कहना है कि आने वाले सालों में एथेनॉल की मांग मौजूदा स्तर से दोगुनी से भी अधिक हो सकती है. ऐसे में चीनी बनाने के बजाय गन्ने का बड़ा हिस्सा एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल होगा, जिससे चीनी की उपलब्धता और कम हो सकती है.
कम होती सप्लाई से बढ़ी चिंता
अल नीनो के कारण बारिश कम होने का खतरा बढ़ गया है, जिससे गन्ने की खेती प्रभावित हो सकती है. अगर ऐसा हुआ तो भारत कम से कम अगले तीन साल तक चीनी निर्यात बाजार से दूर रह सकता है. वहीं, ब्राजील और थाईलैंड जैसे बड़े चीनी उत्पादक देशों में भी उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका है. भारत ने 2022-23 तक के पांच सालों में औसतन 68 लाख टन चीनी का निर्यात किया था, लेकिन इस साल करीब 8 लाख टन निर्यात के बाद सरकार ने सीजन खत्म होने तक निर्यात पर रोक लगा दी.
निर्यात पर सरकार की सख्ती
भारत में चीनी रोजमर्रा की जरूरत की चीज है, इसलिए सरकार इसकी उपलब्धता और कीमतों पर खास नजर रखती है. सरकार नहीं चाहती कि देश में चीनी की कमी हो या आम लोगों को ज्यादा कीमत चुकानी पड़े. इसी वजह से सरकार पहले ही चीनी निर्यात पर कई तरह की पाबंदियां लगा चुकी है. माना जा रहा है कि आने वाले सीजन में भी सरकार पहले देश की जरूरतों को ध्यान में रखेगी और उसके बाद ही निर्यात पर फैसला लेगी. सरकार हर साल उत्पादन, खपत और उपलब्ध स्टॉक का आकलन करने के बाद ही चीनी निर्यात की अनुमति देती है. इसलिए आगे का फैसला भी हालात को देखते हुए लिया जा सकता है.
30 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच सकता है स्टॉक
इस सीजन में भारत में करीब 3.09 करोड़ टन चीनी उत्पादन का अनुमान लगाया गया था, लेकिन अब यह घटकर लगभग 2.79 करोड़ टन रहने की संभावना जताई जा रही है. यह देश की सालाना खपत, जो करीब 2.85 करोड़ टन है, उससे भी कम है.
ऐसे में चीनी मिलों के पास 1 अक्टूबर से शुरू होने वाले नए सीजन में बचा हुआ स्टॉक घटकर करीब 35 लाख टन रह सकता है. यह पिछले 30 साल से भी ज्यादा समय में सबसे कम स्तर होगा. कम स्टॉक और घटते उत्पादन की वजह से सरकार और चीनी उद्योग दोनों की चिंता बढ़ गई है.
क्या भारत को फिर से चीनी आयात करनी पड़ेगी?
उद्योग से जुड़े कई विशेषज्ञों का मानना है कि, अगर अल नीनो के कारण गन्ने की खेती प्रभावित होती रही और एथेनॉल की मांग लगातार बढ़ती रही, तो भारत को भविष्य में चीनी आयात करने की जरूरत पड़ सकती है.
भारत ने आखिरी बार साल 2016-17 और 2017-18 में चीनी आयात की थी. उससे पहले 2009 और 2010 में भी देश ने बड़े पैमाने पर चीनी खरीदी थी, जिससे वैश्विक बाजार में कीमतें काफी बढ़ गई थीं.