मध्य प्रदेश को बासमती GI क्षेत्र में शामिल करने का विरोध, पंजाब के निर्यातकों ने कहा- मौजूदा दायरा न बदला जाए

मध्य प्रदेश के कुछ इलाकों को बासमती GI क्षेत्र में शामिल किए जाने की चर्चाओं के बीच विवाद गहरा गया है. पंजाब राइस मिलर्स एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (PRMEA) ने केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल को पत्र लिखकर मौजूदा GI क्षेत्र में किसी भी बदलाव का विरोध किया है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 4 Jul, 2026 | 05:43 PM

मध्य प्रदेश के कुछ इलाकों को बासमती चावल के भौगोलिक संकेतक (GI) क्षेत्र में शामिल किए जाने की चर्चाओं के बीच विवाद एक बार फिर तेज हो गया है. पंजाब राइस मिलर्स एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (PRMEA) ने केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल को पत्र लिखकर मांग की है कि मौजूदा बासमती GI क्षेत्र में किसी भी तरह का बदलाव न किया जाए.

एसोसिएशन ने सरकार से साफ आश्वासन मांगा है कि पहले से अधिसूचित बासमती GI क्षेत्र को नहीं बदला जाएगा. साथ ही कहा है कि यदि इस मुद्दे पर कोई फैसला लिया जाता है तो उससे पहले सभी संबंधित पक्षों से विस्तार से चर्चा की जाए.

‘मध्य प्रदेश को शामिल करना स्वीकार नहीं’

PRMEA के निदेशक अशोक सेठी ने 1 जुलाई को भेजे पत्र में कहा है कि मध्य प्रदेश के कुछ क्षेत्रों को बासमती GI क्षेत्र में शामिल करने का कोई भी प्रयास स्वीकार नहीं होगा. अंग्रेजी अखबार बिजनेसलाइन के अनुसार, उनका कहना है कि इससे भारत के बासमती निर्यात, किसानों की आय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय बासमती की मजबूत पहचान प्रभावित हो सकती है.

एसोसिएशन का कहना है कि पंजाब और हरियाणा के लाखों किसान तथा चावल मिल उद्योग इस फैसले से सीधे प्रभावित होंगे. इसलिए सरकार को किसी भी बदलाव से पहले सभी हितधारकों की राय जरूर लेनी चाहिए.

पत्र में यह भी कहा गया है कि सरकार स्पष्ट करे कि उसकी GI नियमों में बदलाव करने या बासमती GI क्षेत्र का विस्तार कर मध्य प्रदेश या किसी अन्य राज्य को शामिल करने की कोई योजना नहीं है.

‘बासमती की पहचान पर पड़ सकता है असर’

निर्यातकों का कहना है कि मौजूदा GI क्षेत्र सिर्फ एक भौगोलिक सीमा नहीं है, बल्कि यह वर्षों से बनी गुणवत्ता, परंपरा और वैश्विक भरोसे का प्रतीक है. उनका मानना है कि यदि GI क्षेत्र का विस्तार किया गया तो भारतीय बासमती की विशिष्ट पहचान कमजोर हो सकती है और अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है.

हालांकि उद्योग जगत के कुछ प्रतिनिधियों की राय अलग है. उनका कहना है कि यदि GI क्षेत्र का विस्तार वैज्ञानिक प्रमाणों, ऐतिहासिक तथ्यों और अंतरराष्ट्रीय GI मानकों के आधार पर पूरी पारदर्शिता के साथ किया जाता है, तो इस पर संतुलित तरीके से विचार किया जा सकता है. उनका मानना है कि किसानों के हितों की रक्षा के साथ-साथ कृषि मूल्य श्रृंखला में नए अवसरों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए.

पहले भी उठ चुके हैं सवाल

हाल के दिनों में बासमती GI क्षेत्र के विस्तार को लेकर बहस लगातार तेज हुई है. इससे पहले भी कुछ निर्यातक संगठनों ने APEDA की ओर से उठाए गए कदमों पर सवाल उठाए थे और पूरी प्रक्रिया की समीक्षा की मांग की थी. वहीं APEDA का कहना है कि सभी प्रक्रियाएं तय नियमों और विशेषज्ञों की सिफारिशों के अनुसार अपनाई गई हैं.

अब इस मामले में उद्योग जगत की नजर केंद्र सरकार के अगले कदम पर है. बासमती चावल भारत के सबसे महत्वपूर्ण कृषि निर्यात उत्पादों में शामिल है. ऐसे में GI क्षेत्र से जुड़ा कोई भी फैसला किसानों, चावल उद्योग और देश के निर्यात कारोबार पर बड़ा असर डाल सकता है.

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