सरकार का दावा: चुनौतियों से भरा रहा 2025-26 गेहूं सीजन, फिर भी उत्पादन पर नहीं पड़ा बड़ा असर
wheat production 2025-26: इस साल एक बड़ी सकारात्मक बात यह रही कि गेहूं की फसल पर किसी भी बड़े कीट या बीमारी का हमला नहीं हुआ. इसके अलावा, फसल के बढ़ने के दौरान खरपतवार भी कम देखने को मिला, जिससे फसल को बिना रुकावट बढ़ने का मौका मिला. यह भी उत्पादन को बनाए रखने में मददगार साबित हुआ.
wheat production 2025-26: भारत में गेहूं उत्पादन को लेकर इस साल कई तरह की चर्चाएं रही हैं. कहीं मौसम की मार की बात हुई तो कहीं उत्पादन घटने की आशंका जताई गई. इन सबके बीच सरकार ने स्थिति साफ करते हुए बताया है कि 2025–26 का गेहूं सीजन चुनौतियों के बावजूद काफी मजबूत और संतुलित रहा है. यानी कुछ जगहों पर नुकसान जरूर हुआ, लेकिन पूरे देश की तस्वीर अभी भी सकारात्मक बनी हुई है.
गेहूं की बुवाई और कुल क्षेत्रफल
इस साल देशभर में लगभग 33.4 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में गेहूं की बुवाई की गई. यह पिछले साल की तुलना में ज्यादा है. किसानों ने समय रहते बुवाई की, जिससे फसल को शुरुआती दौर में बेहतर बढ़त मिली. सरकार के अनुसार, इस बार बुवाई का दायरा बढ़ना ही आगे चलकर उत्पादन को स्थिर बनाए रखने में बड़ा कारण बना.
मौसम का असर: कहीं गर्मी, कहीं बारिश
फरवरी महीने में अचानक तापमान बढ़ गया, जिससे गेहूं की फसल पर “हीट स्ट्रेस” पड़ा. इससे दाने भरने की प्रक्रिया (ग्रेन फिलिंग) जल्दी खत्म हो गई, जिससे कुछ जगहों पर उत्पादन कम हुआ. इसके बाद फसल पकने के समय कुछ इलाकों में बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि भी हुई. इससे दाने की गुणवत्ता पर असर पड़ा और कुछ क्षेत्रों में नुकसान भी हुआ. हालांकि यह असर पूरे देश में नहीं, बल्कि सीमित इलाकों तक ही रहा.
राहत की बात: कोई बड़ी बीमारी या कीट हमला नहीं
इस साल एक बड़ी सकारात्मक बात यह रही कि गेहूं की फसल पर किसी भी बड़े कीट या बीमारी का हमला नहीं हुआ. इसके अलावा, फसल के बढ़ने के दौरान खरपतवार भी कम देखने को मिला, जिससे फसल को बिना रुकावट बढ़ने का मौका मिला. यह भी उत्पादन को बनाए रखने में मददगार साबित हुआ.
समय पर बुवाई का मिला फायदा
किसानों ने इस बार जल्दी और समय पर बुवाई पर खास ध्यान दिया. इसका फायदा यह हुआ कि फसल को अंत में पड़ने वाली तेज गर्मी से कुछ हद तक बचाव मिल गया. जल्दी बोई गई फसल ने बेहतर तरीके से विकास किया और मौसम की मार को झेलने में सक्षम रही.
बढ़ा हुआ रकबा बना सहारा
इस साल करीब 0.6 मिलियन हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र में गेहूं बोया गया. यह बढ़ा हुआ रकबा उन जगहों के नुकसान की भरपाई करने में मदद कर रहा है, जहां फसल प्रभावित हुई थी. यही वजह है कि कुल उत्पादन पर बड़ा असर नहीं पड़ा और स्थिति संतुलित बनी हुई है.
नई किस्मों का बढ़ता इस्तेमाल
किसानों ने इस बार ज्यादा मात्रा में नई और उन्नत किस्मों के बीजों का इस्तेमाल किया. ये किस्में ज्यादा उत्पादन देने के साथ-साथ गर्मी और बीमारियों को भी बेहतर तरीके से झेल सकती हैं. इस बदलाव को “वैरायटी रिप्लेसमेंट” कहा जाता है, और यह खेती को आधुनिक और मजबूत बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है.
राज्यों में खरीद
सरकारी खरीद के आंकड़े भी यह दिखाते हैं कि उत्पादन मजबूत है.
- हरियाणा में अब तक 56.13 लाख मीट्रिक टन गेहूं की खरीद हो चुकी है, जो पिछले साल से करीब 9 लाख मीट्रिक टन ज्यादा है.
- मध्य प्रदेश में भी अच्छी पैदावार के कारण खरीद लक्ष्य को 78 लाख मीट्रिक टन से बढ़ाकर 100 लाख मीट्रिक टन कर दिया गया है.
- महाराष्ट्र में भी इस साल लगभग 22.90 लाख टन गेहूं उत्पादन का अनुमान है और मराठवाड़ा व विदर्भ से लगातार आवक हो रही है.
कुल मिलाकर क्या कहती है तस्वीर?
अगर पूरे देश की बात करें, तो यह साल गेहूं के लिए मिश्रित लेकिन मजबूत रहा है. कुछ जगहों पर मौसम ने नुकसान किया, लेकिन बाकी जगहों की अच्छी पैदावार ने उसे संतुलित कर दिया. सरकार का मानना है कि समय पर बुवाई, ज्यादा क्षेत्र, बेहतर बीज और किसानों की जागरूकता ने मिलकर इस साल उत्पादन को स्थिर बनाए रखा है.