एथेनॉल ब्लेंडिंग पर असर की आशंका, मक्के की कम बुवाई से सरकार बढ़ा सकती है चावल और गन्ने पर निर्भरता
Ethanol Blending Programme: देश में मक्के की बुवाई कम होने से सरकार की 20 फीसदी इथेनॉल ब्लेंडिंग योजना पर असर पड़ने की आशंका है. ऐसे में इथेनॉल उत्पादन के लिए सरकार को गन्ने और चावल पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर चीनी का स्टॉक कम रहा, तो चावल की मांग बढ़ सकती है,.
Ethanol Blending: देश में पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाने के लक्ष्य को पूरा करने के लिए सरकार लगातार इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने पर काम कर रही है. लेकिन इस बार खरीफ सीजन में मक्के की बुवाई कम होने से इस योजना पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है. ऐसे में सरकार को इथेनॉल बनाने के लिए गन्ने और चावल पर पहले से ज्यादा निर्भर रहना पड़ सकता है. अगर चीनी का स्टॉक भी उम्मीद से कम रहा, तो इथेनॉल उत्पादन के लिए चावल का इस्तेमाल बढ़ सकता है. इससे आने वाले समय में कुछ गैर-बासमती चावल की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है.
इथेनॉल लक्ष्य के लिए चाहिए 1,100 करोड़ लीटर
सरकार का लक्ष्य पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाना है. इसे हासिल करने के लिए हर साल करीब 1,100 करोड़ लीटर इथेनॉल की जरूरत होगी. देश में फिलहाल लगभग 2,000 करोड़ लीटर इथेनॉल उत्पादन क्षमता तैयार हो चुकी है. इसमें करीब 900 करोड़ लीटर क्षमता चीनी उद्योग के पास है, जबकि बाकी उत्पादन अनाज आधारित इथेनॉल प्लांट से होता है. यही वजह है कि मक्का, चावल और गन्ने जैसी फसलों की उपलब्धता इस योजना के लिए बेहद अहम मानी जाती है.
मक्के की बुवाई में आई बड़ी गिरावट
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 24 जुलाई तक देश में मक्के की बुवाई पिछले साल के मुकाबले 9.7 प्रतिशत कम रही है. सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि देश के प्रमुख मक्का उत्पादक राज्यों में बुवाई में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है. कर्नाटक में मक्के का रकबा 34 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में 37 प्रतिशत, महाराष्ट्र में 16 प्रतिशत और राजस्थान में 3 प्रतिशत कम हुआ है. हालांकि, मध्य प्रदेश में मक्के की खेती बढ़ी है. यहां बुवाई पिछले साल के मुकाबले करीब 8 प्रतिशत अधिक दर्ज की गई है.
गन्ने की खेती लगभग स्थिर
मक्का की तुलना में गन्ने की स्थिति बेहतर नजर आ रही है. इस साल देश में 57.58 लाख हेक्टेयर में गन्ने की बुवाई हुई है, जबकि पिछले साल यह 58.84 लाख हेक्टेयर थी. उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे बड़े गन्ना उत्पादक राज्यों में रकबे में मामूली बढ़ोतरी हुई है. इससे उम्मीद है कि इथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने से कुछ राहत मिल सकती है.
चावल की उपलब्धता पर बढ़ सकती है निर्भरता
अगर चीनी उत्पादन कम रहता है और मक्का भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं होता, तो सरकार इथेनॉल बनाने के लिए चावल का इस्तेमाल बढ़ा सकती है. इस बीच सरकार ने भारतीय खाद्य निगम (FCI) के भंडार में टूटे चावल की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत कर दी है. इससे इथेनॉल उद्योग को अधिक मात्रा में टूटा चावल मिलने की संभावना बढ़ेगी, जबकि खाद्य सुरक्षा पर भी असर नहीं पड़ेगा. हालांकि, जानकारों का मानना है कि अगर चावल की मांग तेजी से बढ़ी तो कुछ गैर-बासमती किस्मों के दाम ऊपर जा सकते हैं.
धान की बुवाई कई राज्यों में बढ़ी
इस बार धान की खेती कई बड़े राज्यों में बढ़ी है. उत्तर प्रदेश, पंजाब, बिहार, असम और आंध्र प्रदेश में पिछले साल की तुलना में अधिक रकबे में धान लगाया गया है. वहीं मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, तेलंगाना और ओडिशा के कुछ इलाकों में धान की बुवाई अभी पिछड़ी हुई है. हालांकि हाल की बारिश के बाद इसमें सुधार की उम्मीद जताई जा रही है.
विशेषज्ञों ने क्या कहा?
बिजनेस लाइन की रिपोर्ट में ग्रेन इथेनॉल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (GEMA) के अध्यक्ष सी.के. जैन का कहना है कि, भारत का इथेनॉल उद्योग अब सिर्फ एक फसल पर निर्भर नहीं है. खरीफ, रबी और गर्मी की अलग-अलग फसलों से इथेनॉल बनाया जा रहा है, जिससे किसी एक फसल में कमी आने पर भी उत्पादन पूरी तरह प्रभावित नहीं होगा. उन्होंने यह भी कहा कि, खरीफ की नई फसल बाजार में आने के बाद इथेनॉल संयंत्रों के लिए कच्चे माल की उपलब्धता और बेहतर हो जाएगी. उनके मुताबिक भारत अभी भी मक्का उत्पादन में आत्मनिर्भर है, इसलिए फिलहाल इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम को लेकर घबराने की जरूरत नहीं है.