धान-गेहूं छोड़ किसानों ने अपनाई यह फसल, हर बीघा दे रही शानदार कमाई

मकोय की खेती के लिए समय का चयन बहुत अहम होता है. आमतौर पर इसके बीज अप्रैल से मई के बीच नर्सरी में बोए जाते हैं. करीब 20 दिन में नर्सरी तैयार हो जाती है, जिसके बाद पौधों को खेत में रोप दिया जाता है. जुलाई तक पौधे अच्छी तरह जम जाते हैं और धीरे-धीरे बढ़ने लगते हैं.

नई दिल्ली | Published: 3 Feb, 2026 | 02:34 PM

Makoy cultivation: आज के समय में जब धान और गेहूं की खेती में लागत बढ़ती जा रही है और मुनाफा सीमित होता जा रहा है, ऐसे में किसान नई और वैकल्पिक फसलों की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं. इसी कड़ी में मकोय की खेती एक ऐसी उम्मीद बनकर सामने आई है, जो कम खर्च में अच्छा मुनाफा देने की क्षमता रखती है. खास बात यह है कि यह फसल न केवल बाजार में अच्छी कीमत दिलाती है, बल्कि औषधीय गुणों के कारण इसकी मांग भी लगातार बनी रहती है. कई इलाकों में किसान मकोय की खेती से प्रति बीघा 40 से 50 हजार रुपये तक की कमाई कर रहे हैं, जबकि खर्च महज 7 से 8 हजार रुपये के आसपास आता है.

मकोय बन रही है पसंदीदा फसल

मकोय की खेती उन किसानों के लिए खास तौर पर फायदेमंद साबित हो रही है, जो कम जमीन में भी अच्छी आमदनी चाहते हैं. यह फसल ज्यादा मेहनत नहीं मांगती और समय भी कम लेती है. जिन इलाकों में फल, सब्जी और फूलों की खेती पहले से हो रही है, वहां मकोय आसानी से अपनाई जा सकती है. किसानों का मानना है कि कम लागत, कम जोखिम और बाजार में लगातार मांग होने के कारण यह फसल किसानों की आमदनी को स्थिर बना रही है.

मकोय की खेती का सही समय और तैयारी

मकोय की खेती के लिए समय का चयन बहुत अहम होता है. आमतौर पर इसके बीज अप्रैल से मई के बीच नर्सरी में बोए जाते हैं. करीब 20 दिन में नर्सरी तैयार हो जाती है, जिसके बाद पौधों को खेत में रोप दिया जाता है. जुलाई तक पौधे अच्छी तरह जम जाते हैं और धीरे-धीरे बढ़ने लगते हैं. सर्दियों की शुरुआत के साथ ही इनमें फल आना शुरू हो जाता है. कई किसान बताते हैं कि सरस्वती पूजा के आसपास फल दिखने लगते हैं और मार्च तक तुड़ाई का अच्छा दौर चलता है.

औषधीय गुणों के कारण बाजार में बढ़ती मांग

मकोय केवल एक सामान्य फल नहीं है, बल्कि इसके औषधीय गुण इसे खास बनाते हैं. इसमें सूजन रोधी और दर्द निवारक तत्व पाए जाते हैं, जिनका उपयोग आयुर्वेदिक और देसी इलाज में किया जाता है. यही वजह है कि दवा बनाने वाली कंपनियां और स्थानीय बाजार दोनों में इसकी मांग बनी रहती है. मकोय के पके हुए फल काले रंग के और हल्के मीठे होते हैं, जबकि इसके बीज छोटे, चिकने और पीले रंग के होते हैं, जो देखने में बैंगन के बीज जैसे लगते हैं लेकिन आकार में उनसे छोटे होते हैं.

खाद, सिंचाई और मिट्टी का सही तालमेल

मकोय की खेती में जैविक खाद का इस्तेमाल सबसे बेहतर माना जाता है. इससे न केवल फसल की गुणवत्ता अच्छी रहती है, बल्कि लागत भी कम आती है. गोबर की खाद या कम्पोस्ट का प्रयोग करके किसान अच्छा उत्पादन ले सकते हैं. नियमित सिंचाई जरूरी है, लेकिन जलभराव से बचना चाहिए. खरपतवार नियंत्रण पर भी ध्यान देना होता है ताकि पौधों की बढ़वार पर असर न पड़े. कई किसान नदी के किनारे की रेतीली जमीन में मकोय उगाते हैं, जहां मिट्टी हल्की और जलनिकास अच्छा होता है, जिससे फसल तेजी से विकसित होती है.

कम समय में तैयार, लंबे समय तक फायदा

मकोय की फसल रोपाई के दो से तीन महीने के भीतर फल देना शुरू कर देती है. हरे-भरे पौधों पर काले रंग के फल आने लगते हैं, जिनकी तुड़ाई चरणबद्ध तरीके से की जाती है. अंतिम दौर में कुछ फल बीज के लिए छोड़ दिए जाते हैं, ताकि अगली खेती के लिए बीज आसानी से मिल सके. यही वजह है कि मकोय की खेती एक चक्र में ही किसान को आमदनी भी देती है और अगली फसल की तैयारी भी करा देती है.

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