Climate Change: गर्म होती धरती से बेलगाम हुए कीट, गेहूं–धान–मक्का पर मंडराया बड़ा खतरा
वैज्ञानिकों के मुताबिक बढ़ता तापमान कीटों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है. पहले जहां कड़ाके की ठंड उनके प्रसार को रोक देती थी, अब वही ठंड कम होती जा रही है. सर्दियों के छोटे होने से कीट ज्यादा समय तक सक्रिय रहते हैं. गर्म मौसम उन्हें तेजी से विकसित होने, प्रजनन करने और लंबे समय तक फसलों पर हमला करने का मौका दे रहा है.
Crop pests: जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ मौसम तक सीमित समस्या नहीं रह गया है. इसका असर सीधे खेतों तक पहुंच चुका है और किसानों के लिए एक नया संकट खड़ा कर रहा है. बढ़ते वैश्विक तापमान के साथ खेतों में कीटों और घुन का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है, जिससे दुनिया भर की प्रमुख फसलें खतरे में हैं. वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि अगर हालात ऐसे ही रहे, तो आने वाले वर्षों में खाद्य सुरक्षा पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है.
तापमान बढ़ा तो कीटों का हमला और तेज
डाउन टू अर्थ की खबर के अनुसार, हालिया अध्ययनों से सामने आया है कि यदि वैश्विक तापमान औसतन दो डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है, तो फसलों को कीटों से होने वाला नुकसान अभूतपूर्व स्तर तक पहुंच सकता है. अनुमान है कि गेहूं की पैदावार को होने वाला नुकसान करीब 46 प्रतिशत तक बढ़ सकता है. वहीं धान को लगभग 19 प्रतिशत और मक्का को 31 प्रतिशत तक अतिरिक्त क्षति झेलनी पड़ सकती है. ये आंकड़े सिर्फ उत्पादन में कमी नहीं दिखाते, बल्कि करोड़ों लोगों के भोजन की थाली पर पड़ने वाले असर की ओर भी इशारा करते हैं.
कीटों के लिए अनुकूल बनता जा रहा मौसम
वैज्ञानिकों के मुताबिक बढ़ता तापमान कीटों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है. पहले जहां कड़ाके की ठंड उनके प्रसार को रोक देती थी, अब वही ठंड कम होती जा रही है. सर्दियों के छोटे होने से कीट ज्यादा समय तक सक्रिय रहते हैं. गर्म मौसम उन्हें तेजी से विकसित होने, साल में ज्यादा बार प्रजनन करने और लंबे समय तक फसलों पर हमला करने का मौका दे रहा है. इसका नतीजा यह है कि कीटों की संख्या भी बढ़ रही है और उनका फैलाव भी.
ऊंचाई और नए इलाकों तक पहुंच रहे कीट
एक और चिंताजनक पहलू यह है कि अब कीट सिर्फ पारंपरिक इलाकों तक सीमित नहीं हैं. बढ़ते तापमान के कारण वे भूमध्य रेखा से दूर और ऊंचाई वाले क्षेत्रों तक पहुंचने लगे हैं. पहाड़ी और ठंडे इलाकों में, जहां पहले कीट टिक नहीं पाते थे, अब वे आसानी से पनप रहे हैं. इससे उन क्षेत्रों की फसलें भी खतरे में आ गई हैं, जिन्हें अब तक अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता था.
वैश्वीकरण से बढ़ी आक्रामक प्रजातियों की समस्या
अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वैश्वीकरण ने भी इस संकट को और गहरा कर दिया है. विदेशी और आक्रामक कीट प्रजातियां अब तेजी से नए देशों और महाद्वीपों तक पहुंच रही हैं. ये प्रजातियां स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए ज्यादा खतरनाक साबित होती हैं, क्योंकि इनके खिलाफ प्राकृतिक प्रतिरोध कमजोर होता है. यही वजह है कि कई इलाकों में कीट नियंत्रण की पारंपरिक तकनीकें बेअसर होती जा रही हैं.
पहले ही भारी नुकसान झेल रही हैं फसलें
आज की स्थिति यह है कि दुनिया भर में करीब 40 प्रतिशत फसलें किसी न किसी रूप में कीटों और बीमारियों की भेंट चढ़ रही हैं. यह आंकड़ा अपने आप में डराने वाला है. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो यह नुकसान और तेजी से बढ़ सकता है. इससे न सिर्फ किसानों की आय घटेगी, बल्कि खाद्य पदार्थों की कीमतें भी बढ़ेंगी.
अर्थव्यवस्था और जैव विविधता पर भी असर
कीटों का बढ़ता प्रकोप सिर्फ खेती तक सीमित नहीं है. Food and Agriculture Organization के अनुसार पौधों में लगने वाली बीमारियों से हर साल वैश्विक अर्थव्यवस्था को हजारों अरब डॉलर का नुकसान हो रहा है. वहीं आक्रामक कीट प्रजातियां भी भारी आर्थिक क्षति पहुंचा रही हैं. इसके साथ-साथ ये जैव विविधता के लिए भी बड़ा खतरा बनती जा रही हैं, क्योंकि ये स्थानीय प्रजातियों को खत्म कर देती हैं.
समाधान की तलाश जरूरी
विशेषज्ञ मानते हैं कि इस संकट से निपटने के लिए जलवायु परिवर्तन को रोकने के प्रयासों के साथ-साथ खेती के तरीकों में भी बदलाव जरूरी है. कीट-प्रतिरोधी किस्मों का विकास, जैविक नियंत्रण के उपाय और किसानों को समय पर जानकारी देना बेहद अहम हो गया है. अगर अभी कदम नहीं उठाए गए, तो जलवायु संकट का यह नया वार आने वाले समय में दुनिया की खाद्य सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है.