Report: अल नीनो के साए में ट्रैक्टर बाजार, कमजोर मानसून से बिक्री पर पड़ सकता है बड़ा असर
अल नीनो एक जलवायु स्थिति है, जिसमें प्रशांत महासागर के पानी का तापमान सामान्य से ज्यादा बढ़ जाता है. यह हर दो से सात साल के बीच कभी भी सक्रिय हो सकता है. जब अल नीनो आता है तो दुनिया के कई हिस्सों में मौसम का संतुलन बिगड़ जाता है.
Tractor sales: भारत में खेती सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका है. खेतों में जब ट्रैक्टर चलता है तो समझिए काम की रफ्तार बढ़ गई. लेकिन अब HSBC रिपोर्ट ने ट्रैक्टर उद्योग को लेकर थोड़ी चिंता जताई है. रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले कुछ वर्षों में ट्रैक्टर की बिक्री की रफ्तार धीमी रह सकती है. इसकी बड़ी वजह अल नीनो का असर और कमजोर मानसून की आशंका बताई गई है.
अल नीनो क्या है और इसका असर क्यों अहम है
अल नीनो एक जलवायु स्थिति है, जिसमें प्रशांत महासागर के पानी का तापमान सामान्य से ज्यादा बढ़ जाता है. यह हर दो से सात साल के बीच कभी भी सक्रिय हो सकता है. जब अल नीनो आता है तो दुनिया के कई हिस्सों में मौसम का संतुलन बिगड़ जाता है. भारत में अक्सर इसका असर मानसून पर पड़ता है और बारिश सामान्य से कम हो सकती है.
कम बारिश का सीधा मतलब है खेती पर असर. यदि खेतों में पानी कम होगा तो फसल उत्पादन घट सकता है. इससे किसानों की आमदनी प्रभावित होती है और वे बड़े खर्च, जैसे नया ट्रैक्टर खरीदना, टाल सकते हैं. यही कारण है कि रिपोर्ट में ट्रैक्टर उद्योग को लेकर सावधानी भरा अनुमान जताया गया है.
सीमित बढ़त का अनुमान
रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2026 से 2028 (FY26–FY28) के बीच ट्रैक्टर बिक्री की सालाना औसत वृद्धि दर यानी CAGR सिर्फ 0 से 2 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान है. इसका मतलब है कि बाजार में बहुत तेज बढ़त की उम्मीद नहीं है. साथ ही पिछले सालों की ऊंची बिक्री के कारण तुलना का आधार भी ज्यादा है, जिससे आगे की वृद्धि प्रतिशत के रूप में कम दिखाई दे सकती है.
पुराने रिकॉर्ड भी यही बताते हैं कि जिन वर्षों में अल नीनो सक्रिय रहा है या उसके अगले साल, ट्रैक्टर की बिक्री पर दबाव देखा गया है. कमजोर मानसून से ग्रामीण बाजार में उत्साह कम हो जाता है और किसान निवेश में सतर्क हो जाते हैं.
जलाशयों में ज्यादा पानी से मिली थोड़ी राहत
हालांकि पूरी तस्वीर निराशाजनक नहीं है. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि देश के जलाशयों में इस समय पानी का स्तर औसत से लगभग 24 प्रतिशत ज्यादा है. यह खेती के लिए अच्छी खबर है. मार्च-अप्रैल में होने वाली खरीफ फसल की बुवाई के लिए पानी जरूरी होता है, और जलाशयों में पर्याप्त भंडार होने से शुरुआती कृषि गतिविधियों को सहारा मिल सकता है. लेकिन अगर अल नीनो का असर ज्यादा गंभीर रहा, तो अक्टूबर-नवंबर में होने वाली रबी फसल की बुवाई प्रभावित हो सकती है. यानी आने वाले महीनों में मौसम की स्थिति बहुत अहम रहने वाली है.
रिप्लेसमेंट डिमांड बनेगी सहारा
ट्रैक्टर उद्योग के लिए एक मजबूत सहारा रिप्लेसमेंट डिमांड है. रिपोर्ट बताती है कि वित्त वर्ष 2009 से 2014 के बीच ट्रैक्टर बिक्री में लगभग 16 प्रतिशत की सालाना औसत वृद्धि दर्ज की गई थी. उस समय जो ट्रैक्टर खरीदे गए थे, वे अब बदलने की उम्र में पहुंच रहे हैं.
इस समय कुल ट्रैक्टर बिक्री में लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा पुराने ट्रैक्टरों को बदलने की मांग का है. यानी आधी के करीब बिक्री सिर्फ इसलिए हो रही है क्योंकि किसानों को पुराने ट्रैक्टर की जगह नया लेना पड़ रहा है. इससे उद्योग को स्थिरता मिलती है, भले ही नई मांग थोड़ी कमजोर हो.
भारत में अभी भी बड़ी संभावनाएं
भारत में इस समय करीब 1.1 करोड़ ट्रैक्टर मौजूद हैं. लेकिन यह संख्या देश की कुल कृषि भूमि के मुकाबले अभी भी सीमित है. कुल भूमि पार्सलों में सिर्फ लगभग 7 प्रतिशत पर ही ट्रैक्टर की पहुंच है. वहीं दो हेक्टेयर से ज्यादा जमीन वाले परिवारों में भी सिर्फ करीब 47 प्रतिशत के पास ट्रैक्टर है.
इसका मतलब है कि अभी भी मशीनीकरण की बड़ी गुंजाइश बाकी है. ग्रामीण इलाकों में श्रम की कमी और खेती में दक्षता बढ़ाने की जरूरत ट्रैक्टर की मांग को लंबी अवधि में मजबूती दे सकती है.