Rice buffer stock: देश में एक बार फिर मौसम को लेकर चिंता का माहौल है. अल नीनो की चर्चा तेज है और सूखे की आशंका भी जताई जा रही है. ऐसे समय में आम लोगों से लेकर किसानों तक, सबके मन में यही सवाल है कि अगर बारिश गड़बड़ाई तो खाने-पीने की व्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा. इसी बीच एक राहत देने वाली खबर सामने आई है. केंद्र सरकार ने खरीफ सीजन 2025-26 में चावल की इतनी मजबूत खरीद की है कि देश की खाद्य सुरक्षा को लेकर फिलहाल किसी बड़े खतरे की बात नहीं कही जा सकती. सरकारी गोदाम अनाज से भरे हुए हैं और इससे आने वाले महीनों में बाजार और राशन व्यवस्था को संभालने में मदद मिलेगी.
आंकड़े बता रहे पूरी कहानी
खरीफ सीजन 2025-26 के दौरान सरकार ने चावल की खरीद को लेकर खास सतर्कता दिखाई. अक्टूबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच केंद्रीय पूल के लिए कुल 42.95 मिलियन टन चावल खरीदा गया. यह पिछले साल की इसी अवधि में हुई 41.41 मिलियन टन की खरीद से करीब 3.7 प्रतिशत ज्यादा है. यह बढ़ोतरी ऐसे वक्त पर हुई है, जब मौसम वैज्ञानिक अल नीनो की संभावना जता रहे हैं. जानकार मानते हैं कि सरकार की यह तैयारी किसी भी आपात स्थिति में देश को संभालने में कारगर साबित होगी.
गोदामों में भरपूर भंडार
सरकारी गोदामों की हालत इस समय काफी मजबूत है. 1 जनवरी तक के आंकड़ों पर नजर डालें, तो चावल और धान का स्टॉक तय बफर मानकों से लगभग नौ गुना ज्यादा पहुंच चुका है. गेहूं का भंडार भी कमजोर नहीं है और वह तय सीमा से करीब दोगुना है. कृषि क्षेत्र से जुड़े अनुमानों के अनुसार, खरीफ 2025-26 में चावल का कुल उत्पादन 124.50 मिलियन टन तक पहुंच सकता है, जो पिछले साल के मुकाबले करीब 1.4 प्रतिशत ज्यादा है. इससे साफ है कि उत्पादन और सरकारी खरीद, दोनों ही मोर्चों पर हालात मजबूत बने हुए हैं.
ज्यादा अनाज, लेकिन साथ में नई परेशानी
इतनी बड़ी मात्रा में अनाज जमा होना जहां एक ओर राहत देता है, वहीं दूसरी ओर सरकार के लिए एक नई चुनौती भी खड़ी करता है. सार्वजनिक वितरण प्रणाली में जितना अनाज हर साल जरूरत होता है, उससे कहीं ज्यादा चावल इस समय सरकारी गोदामों में मौजूद है. अतिरिक्त अनाज को कैसे और कहां इस्तेमाल किया जाए, इसे लेकर अभी तक कोई स्थायी नीति नहीं बन पाई है. फिलहाल सरकार ने कुछ चावल को एथेनॉल बनाने के लिए देने का फैसला किया है और 1 नवंबर से रियायती दर पर इसका आवंटन भी शुरू किया गया है. हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इससे गन्ने से बनने वाले एथेनॉल पर असर पड़ा है और कुछ इलाकों में गन्ना किसानों का भुगतान फिर से अटकने लगा है.
दक्षिण भारत में खरीद ने पकड़ी रफ्तार
राज्यों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो इस बार दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में चावल खरीद ने सबको चौंकाया है. तमिलनाडु में सरकारी खरीद पिछले साल की तुलना में 112 प्रतिशत बढ़कर 1.1 मिलियन टन तक पहुंच गई है. अच्छी पैदावार और प्रशासन की सक्रियता को इसकी वजह माना जा रहा है. आंध्र प्रदेश में भी 31 जनवरी तक खरीद में 99.1 प्रतिशत का उछाल दर्ज किया गया और कुल खरीद 2.74 मिलियन टन तक पहुंच गई.
उत्तर भारत में भी हालात सुधरे
उत्तर भारत के बड़े चावल उत्पादक राज्यों में भी तस्वीर कुछ बेहतर होती दिखी है. उत्तर प्रदेश में शुरुआती महीनों की सुस्ती के बाद खरीद में तेजी आई और यह 8.2 प्रतिशत बढ़कर 3.9 मिलियन टन हो गई. मध्य प्रदेश में 17.1 प्रतिशत और उत्तराखंड में 11.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई. तेलंगाना और पश्चिम बंगाल में खरीद के आंकड़े भी पिछले साल के आसपास या उससे थोड़े बेहतर रहे.
पंजाब और बिहार में गिरावट की वजहें
जहां कई राज्यों में खरीद बढ़ी, वहीं पंजाब जैसे बड़े योगदान देने वाले राज्य में गिरावट देखी गई. पंजाब में चावल की खरीद पिछले साल के 11.61 मिलियन टन से घटकर 10.49 मिलियन टन रह गई, यानी करीब 9.7 प्रतिशत की कमी. हरियाणा में खरीद लगभग स्थिर रही और यह 3.6 मिलियन टन के आसपास दर्ज की गई. बिहार में खरीद की रफ्तार धीमी रही और वहां करीब 19 प्रतिशत कम चावल खरीदा गया. ओडिशा और महाराष्ट्र में भी हल्की गिरावट दर्ज की गई है.
अलग-अलग राज्यों में अलग समय तक चलती है खरीद
देशभर में चावल की सरकारी खरीद एक साथ खत्म नहीं होती. पंजाब, हरियाणा और उत्तर भारत के कुछ राज्यों में यह प्रक्रिया दिसंबर तक पूरी हो चुकी है. छत्तीसगढ़ और गुजरात में 31 जनवरी को खरीद समाप्त हो गई. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में फरवरी के अंत तक खरीद जारी रहने की उम्मीद है. तेलंगाना में 15 फरवरी तक और आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु व महाराष्ट्र में 31 मार्च तक खरीद चलेगी. पश्चिम बंगाल में किसानों को 30 अप्रैल तक अपनी फसल बेचने का मौका मिलेगा. पूरे देश के लिए 2025-26 में चावल खरीद का लक्ष्य 46.35 मिलियन टन रखा गया है.
राहत की तस्वीर
अल नीनो और संभावित सूखे की आशंका के बीच चावल की बंपर सरकारी खरीद ने देश को बड़ी राहत दी है. भरे हुए अन्न भंडार यह भरोसा दिलाते हैं कि आने वाले महीनों में हालात चाहे जैसे भी हों, खाद्य सुरक्षा पर कोई बड़ा संकट नहीं आएगा. अब असली चुनौती यह है कि इस अतिरिक्त अनाज का सही और संतुलित उपयोग कैसे किया जाए, ताकि किसानों, उपभोक्ताओं और उद्योग तीनों को इसका पूरा फायदा मिल सके.