fertiliser production: खेती की रीढ़ मानी जाने वाली खाद अगर समय पर और सही मात्रा में मिल जाए, तो फसल की सेहत अपने आप बेहतर हो जाती है. लेकिन अगर खाद की कमी हो जाए या वह महंगी पड़ने लगे, तो सबसे ज्यादा असर किसान की जेब और खेत पर पड़ता है. इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए भारत लंबे समय से खाद उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने की कोशिश कर रहा है. जनवरी 2026 में इस दिशा में एक बड़ी और राहत भरी खबर सामने आई है, जब देश ने फॉस्फेटिक और पोटाशिक खाद के उत्पादन में अब तक का सबसे ऊंचा रिकॉर्ड दर्ज किया.
जनवरी में बना नया कीर्तिमान
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जनवरी 2026 में देश में फॉस्फेटिक और पोटाशिक खाद, यानी पी एंड के श्रेणी की खाद का उत्पादन करीब 15.7 लाख टन तक पहुंच गया. इसमें डीएपी और एनपीके जैसी अहम खाद शामिल हैं, जिनका इस्तेमाल गेहूं, धान, दालें, तिलहन और सब्जियों की खेती में बड़े पैमाने पर होता है. यह अब तक का सबसे ज्यादा मासिक उत्पादन है, जिसने यह साफ कर दिया है कि देश की घरेलू उत्पादन क्षमता लगातार मजबूत हो रही है.
यह उपलब्धि इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि फॉस्फेट और पोटाश वाली खाद के लिए भारत को लंबे समय से आयात पर निर्भर रहना पड़ता रहा है. ऐसे में घरेलू उत्पादन का बढ़ना न सिर्फ आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम है, बल्कि विदेशी मुद्रा की बचत का भी जरिया बनता है.
आयात पर निर्भरता घटाने की कोशिश
हालांकि, अगर पूरे वित्त वर्ष 2025-26 की तस्वीर देखें तो यह साफ होता है कि देश को अब भी खाद आयात का सहारा लेना पड़ रहा है. अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच यूरिया, डीएपी और एनपीके खाद का आयात पिछले साल की तुलना में काफी ज्यादा रहा. इसकी बड़ी वजह यह रही कि खरीफ और रबी सीजन के दौरान किसानों की मांग तेज बनी रही और घरेलू उत्पादन कुछ महीनों में उस रफ्तार से नहीं बढ़ पाया.
यूरिया की बिक्री में इस दौरान हल्की बढ़ोतरी देखने को मिली, जबकि घरेलू उत्पादन में थोड़ी गिरावट दर्ज की गई. ऐसे में आयात के जरिए मांग को पूरा किया गया, ताकि किसानों को खाद की कमी का सामना न करना पड़े. डीएपी के मामले में भी बिक्री थोड़ी कम रही, लेकिन आयात बढ़ाकर बाजार में उपलब्धता बनाए रखी गई.
संतुलित पोषण पर सरकार का जोर
एनपी और एनपीके खाद के उत्पादन में बढ़ोतरी यह संकेत देती है कि सरकार अब केवल मात्रा बढ़ाने पर ही नहीं, बल्कि संतुलित पोषण पर भी ध्यान दे रही है. इन खादों से मिट्टी को नाइट्रोजन के साथ-साथ फॉस्फोरस और पोटाश जैसे जरूरी तत्व भी मिलते हैं, जिससे लंबे समय में जमीन की उर्वरता बनी रहती है. जनवरी में रिकॉर्ड उत्पादन यह दिखाता है कि नीति स्तर पर यह समझ बन रही है कि किसानों को सिर्फ सस्ती खाद नहीं, बल्कि सही अनुपात में पोषक तत्व देना भी जरूरी है.
किसानों को क्या मिलेगा फायदा
घरेलू उत्पादन बढ़ने का सीधा फायदा किसानों तक पहुंचता है. इससे एक ओर खाद की उपलब्धता समय पर बनी रहती है, वहीं दूसरी ओर आयात पर निर्भरता घटने से कीमतों में उतार-चढ़ाव का खतरा भी कम होता है. जब देश के भीतर ही डीएपी और एनपीके जैसी खाद पर्याप्त मात्रा में बनने लगेंगी, तो वैश्विक बाजार में दाम बढ़ने का असर किसानों पर कम पड़ेगा.
इसके अलावा, उत्पादन बढ़ने से सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी संतुलित तरीके से संभाला जा सकता है, जिससे भविष्य में नीतियां और मजबूत होंगी.