Himachal Pradesh drought: हिमाचल प्रदेश में इस बार रबी सीजन किसानों के लिए राहत नहीं, बल्कि चिंता लेकर आया है. लंबे समय से बारिश न होने के कारण प्रदेश के कई इलाकों में सूखे जैसे हालात बन गए हैं. इसका सीधा असर गेहूं की फसल पर पड़ा है, जो हिमाचल की प्रमुख रबी फसलों में गिनी जाती है. खेतों में नमी की भारी कमी के चलते हजारों हेक्टेयर में फसल या तो पूरी तरह बर्बाद हो गई है या फिर उसकी बढ़वार रुक गई है. ताजा फील्ड रिपोर्ट ने राज्य की खेती की स्थिति को लेकर गंभीर तस्वीर सामने रखी है.
बारिश न होने से बिगड़ा रबी सीजन का संतुलन
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में पिछले काफी समय से सामान्य बारिश नहीं हो पाई है. दिसंबर और जनवरी के दौरान जिस बारिश और बर्फबारी से किसानों को उम्मीद थी, वह नहीं हुई. नतीजा यह रहा कि मिट्टी में जरूरी नमी नहीं बन सकी. गेहूं की फसल, जो शुरुआती दिनों में नमी पर ज्यादा निर्भर होती है, सूखे की चपेट में आ गई. कई इलाकों में खेतों में खड़ी फसल पीली पड़ने लगी है, जबकि कुछ जगहों पर पौधे समय से आगे बढ़ ही नहीं पाए.
हजारों हेक्टेयर में गेहूं को नुकसान
राज्य कृषि विभाग को फील्ड से मिली रिपोर्ट के अनुसार, पूरे हिमाचल प्रदेश में करीब 9,359 हेक्टेयर क्षेत्र में गेहूं की फसल प्रभावित हुई है. इनमें से 3,087 हेक्टेयर में फसल पूरी तरह खराब होने की स्थिति में पहुंच चुकी है. सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि कम नमी के कारण लगभग 10 प्रतिशत क्षेत्र में गेहूं की बुआई ही नहीं हो पाई. जो बुआई समय पर होनी थी, वह भी अब संभव नहीं है, क्योंकि मौसम आगे निकल चुका है.
किन जिलों में ज्यादा असर
हिमाचल में गेहूं का उत्पादन मुख्य रूप से कांगड़ा, मंडी, हमीरपुर, ऊना, बिलासपुर, सोलन और सिरमौर जिलों में होता है. इसके अलावा शिमला, चंबा और कुल्लू के निचले इलाकों में भी गेहूं की अच्छी खेती होती है. इन सभी जिलों से सूखे के कारण फसल प्रभावित होने की खबरें सामने आ रही हैं. खासकर उन इलाकों में हालात ज्यादा खराब हैं, जहां सिंचाई के साधन सीमित हैं और किसान पूरी तरह बारिश पर निर्भर रहते हैं.
नमी की कमी से फसल की बढ़वार रुकी
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक बारिश न होने से मिट्टी में आवश्यक नमी नहीं बची है. इसका असर गेहूं के अंकुरण और शुरुआती बढ़वार पर पड़ा है. कई क्षेत्रों में पौधों की लंबाई नहीं बढ़ पाई, वहीं कुछ जगहों पर बालियां सही तरीके से विकसित नहीं हो सकीं. इससे उत्पादन पर सीधा असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है. जिन किसानों ने किसी तरह सिंचाई का इंतजाम किया, वहां भी पानी की सीमित उपलब्धता बड़ी चुनौती बनी हुई है.
किसानों के लिए बढ़ी मुश्किलें
रबी सीजन की शुरुआत में ही हुए इस नुकसान से किसानों की चिंता बढ़ गई है. बीज, खाद और खेत की तैयारी पर किया गया खर्च अब डूबता नजर आ रहा है. कई किसान इस उम्मीद में हैं कि अगर आने वाले दिनों में बारिश हो जाए, तो कुछ हद तक फसल संभल सकती है. हालांकि जिन इलाकों में फसल पूरी तरह सूख चुकी है, वहां नुकसान की भरपाई आसान नहीं होगी.
सरकार और कृषि विभाग की नजर हालात पर
कृषि विभाग का कहना है कि यह रिपोर्ट फिलहाल ताजा स्थिति पर आधारित है और लगातार फील्ड से जानकारी जुटाई जा रही है. यदि आगे बारिश होती है तो कुछ क्षेत्रों में नुकसान की भरपाई संभव है. वहीं, राजस्व विभाग के मानकों के अनुसार प्रभावित क्षेत्रों का विस्तृत आकलन किया जा रहा है, ताकि जरूरत पड़ने पर किसानों को राहत दी जा सके. सरकार को भी स्थिति से अवगत कराया जा रहा है.
गेहूं की फसल मीट्रिक टन में
| 2020-21 | 5,73,87,000 |
| 2021-22 | 6,47,27,000 |
| 2022-23 | 6,12,32,000 |
| 2023-24 | 7,80,07,000 |
| 2024-25 | 6,28,00,000 |