Rabi fertiliser subsidy: रबी मौसम की बुवाई अपने चरम पर है और इसी बीच केंद्र सरकार ने किसानों को राहत देने के लिए उर्वरकों पर सब्सिडी का दायरा और बढ़ा दिया है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद और कच्चे माल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव के बीच सरकार ने यह साफ कर दिया है कि इसका बोझ किसानों पर नहीं पड़ने दिया जाएगा. इसी रणनीति के तहत रबी सीजन 2025-26 के लिए उर्वरक सब्सिडी का अनुमानित बिल बढ़कर 37,952 करोड़ रुपये पहुंच गया है, जो खरीफ 2025 के मुकाबले 736 करोड़ रुपये अधिक है.
वैश्विक कीमतों की अनिश्चितता बनी वजह
सरकारी बयान के मुताबिक, उर्वरकों के अंतरराष्ट्रीय दाम अभी भी स्थिर नहीं हैं. फॉस्फेट और पोटाश जैसे प्रमुख पोषक तत्वों के कच्चे माल की कीमतें वैश्विक हालात, युद्ध और सप्लाई चेन में रुकावटों के कारण बार-बार बदल रही हैं. ऐसे में अगर सब्सिडी नहीं बढ़ाई जाती, तो खाद की कीमतें सीधे किसानों की जेब पर असर डाल सकती थीं. सरकार ने इस खतरे को भांपते हुए रबी सीजन से पहले ही अतिरिक्त बजट का प्रावधान कर दिया.
डीएपी पर सबसे ज्यादा जोर
बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, इस बार सरकार ने खासतौर पर डी-अमोनियम फॉस्फेट यानी डीएपी पर सब्सिडी में बड़ी बढ़ोतरी की है. डीएपी पर प्रति टन सब्सिडी को बढ़ाकर 29,805 रुपये कर दिया गया है, जो पिछले साल 21,911 रुपये थी. इसका सीधा फायदा यह होगा कि गेहूं, दालों और तिलहनों की बुवाई के दौरान किसानों को डीएपी ऊंचे दामों पर नहीं खरीदनी पड़ेगी. रबी फसलों में फॉस्फोरस की भूमिका अहम होती है, इसलिए डीएपी की उपलब्धता और कीमत दोनों को नियंत्रित रखना सरकार की प्राथमिकता रही है.
संतुलित पोषण की ओर बदलाव
सरकार की यह नीति सिर्फ कीमत नियंत्रित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि खेती के तरीके में बदलाव की दिशा में भी एक कदम है. पोषक तत्व आधारित सब्सिडी यानी एनबीएस योजना के तहत खाद पर मिलने वाली सब्सिडी को नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश और सल्फर जैसे पोषक तत्वों से जोड़ा गया है. इसका मकसद यह है कि किसान केवल यूरिया पर निर्भर न रहें और संतुलित उर्वरक उपयोग अपनाएं. लंबे समय तक नाइट्रोजन के अत्यधिक इस्तेमाल से कई क्षेत्रों में मिट्टी की सेहत खराब हुई है, जिसे सुधारने की जरूरत है.
उत्पादकता में दिख रहा असर
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, संतुलित उर्वरक नीति का असर अब दिखने लगा है. देश में खाद्यान्न उत्पादकता 2010-11 में जहां 1,930 किलो प्रति हेक्टेयर थी, वहीं 2024-25 तक यह बढ़कर 2,578 किलो प्रति हेक्टेयर हो गई है. इस दौरान एनबीएस योजना का लगातार विस्तार हुआ, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता और फसल की उपज दोनों में सुधार आया.
खर्च पर सवाल और सरकार का जवाब
हालांकि, पिछले तीन वर्षों में केंद्र सरकार ने एनबीएस के तहत 2.04 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए हैं, जिस पर कुछ विशेषज्ञ वित्तीय दबाव की बात भी उठा रहे हैं. लेकिन सरकार का तर्क है कि बेहतर पैदावार, मिट्टी की दीर्घकालीन सेहत और आयात पर निर्भरता कम होना इस खर्च को जायज ठहराता है. खास बात यह है कि 2014 के बाद देश में फॉस्फोरस और पोटाश उर्वरकों का घरेलू उत्पादन 50 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ा है.
रबी किसानों के लिए भरोसे की खबर
कुल मिलाकर, बढ़ा हुआ उर्वरक बजट रबी सीजन में किसानों के लिए भरोसे की खबर है. सरकार का यह कदम न सिर्फ खाद को सस्ता बनाए रखेगा, बल्कि संतुलित खेती को बढ़ावा देकर आने वाले वर्षों में कृषि को ज्यादा टिकाऊ भी बनाएगा.