Urea import: भारत की खेती इन दिनों उर्वरकों की उपलब्धता को लेकर एक नए दौर से गुजर रही है. खेतों में फसल की अच्छी पैदावार के लिए जिस यूरिया पर किसान सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं, उसी यूरिया के मामले में देश की आयात पर निर्भरता तेजी से बढ़ी है. ताजा आंकड़े बताते हैं कि चालू वित्त वर्ष के पहले आठ महीनों, यानी अप्रैल से नवंबर के बीच भारत का यूरिया आयात दोगुने से भी ज्यादा हो गया है. इसकी बड़ी वजह घरेलू उत्पादन में आई गिरावट और किसानों की लगातार बनी हुई मांग है.
यूरिया आयात में रिकॉर्ड उछाल
उद्योग संगठन के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल–नवंबर की अवधि में भारत ने कुल 7.17 मिलियन टन यूरिया का आयात किया. पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा सिर्फ 3.26 मिलियन टन था. यानी एक साल में यूरिया आयात में करीब 120.3 प्रतिशत की जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की गई. यह बढ़ोतरी साफ तौर पर बताती है कि देश को अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए विदेशी आपूर्ति पर ज्यादा निर्भर होना पड़ा.
घरेलू उत्पादन में आई कमी
जहां आयात बढ़ा, वहीं देश के भीतर यूरिया का उत्पादन घटता नजर आया. इस दौरान घरेलू उत्पादन 3.7 प्रतिशत की गिरावट के साथ 19.75 मिलियन टन पर आ गया. उत्पादन में यह कमी भले ही प्रतिशत के हिसाब से ज्यादा न लगे, लेकिन जब खेती का बड़ा हिस्सा यूरिया पर निर्भर हो, तो इसका असर पूरे सप्लाई सिस्टम पर पड़ता है.
बिक्री बढ़ी, मांग बनी रही
दिलचस्प बात यह है कि उत्पादन में गिरावट के बावजूद यूरिया की बिक्री में कमी नहीं आई. आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से नवंबर के बीच यूरिया की कुल बिक्री 25.40 मिलियन टन रही, जो पिछले साल की तुलना में 2.3 प्रतिशत ज्यादा है. इससे साफ है कि किसानों की मांग में कोई कमी नहीं आई और खेतों में यूरिया की जरूरत लगातार बनी हुई है.
नवंबर महीने में तेजी
सिर्फ नवंबर महीने की बात करें तो इस दौरान यूरिया आयात में 68.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई. नवंबर में आयात बढ़कर 1.31 मिलियन टन हो गया, जबकि पिछले साल इसी महीने यह 0.78 मिलियन टन था. इसी महीने यूरिया की बिक्री भी 4.8 प्रतिशत बढ़कर 3.75 मिलियन टन तक पहुंच गई. यह आंकड़े बताते हैं कि रबी फसलों के अहम दौर में सरकार और एजेंसियों ने आपूर्ति बनाए रखने के लिए तेजी से कदम उठाए.
DAP में भी बढ़ी आयात निर्भरता
यूरिया के साथ-साथ DAP यानी डाय-अमोनियम फॉस्फेट के मामले में भी आयात पर निर्भरता बढ़ी है. अब कुल DAP आपूर्ति में करीब 67 प्रतिशत हिस्सा आयात का है, जबकि पिछले साल यह 56 प्रतिशत था. अप्रैल–नवंबर 2025-26 के दौरान DAP की बिक्री 7.12 मिलियन टन पर स्थिर रही, लेकिन घरेलू उत्पादन 5.2 प्रतिशत घटकर 2.68 मिलियन टन रह गया.
अन्य उर्वरकों की तस्वीर
NPK की उर्वरकों के मामले में तस्वीर थोड़ी बेहतर दिखती है. इनका उत्पादन 13.8 प्रतिशत बढ़कर 8.15 मिलियन टन तक पहुंच गया, जबकि आयात लगभग दोगुना होकर 2.72 मिलियन टन हो गया. इसी अवधि में NPK की बिक्री 10.38 मिलियन टन पर स्थिर रही. वहीं म्यूरेट ऑफ पोटाश की बिक्री में भी 8.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई और यह 1.55 मिलियन टन तक पहुंच गई.
स्वदेशी SSP ने बढ़ाया भरोसा
इस पूरे परिदृश्य में सिंगल सुपर फॉस्फेट यानी SSP एक सकारात्मक उदाहरण बनकर उभरा है. SSP की बिक्री 15 प्रतिशत बढ़कर 4.16 मिलियन टन हो गई, जबकि इसका उत्पादन 9.5 प्रतिशत की बढ़त के साथ 3.97 मिलियन टन तक पहुंच गया. भारतीय उर्वरक संघ के अनुसार, यह किसानों के बीच स्वदेशी फॉस्फेटिक उर्वरकों में बढ़ते भरोसे को दर्शाता है.
सब्सिडी और भविष्य की चुनौती
यूरिया आज भी सरकार द्वारा नियंत्रित उर्वरक है और इस पर भारी सब्सिडी दी जाती है. इसकी कीमत 45 किलो की बोरी पर वर्षों से लगभग 242 रुपये पर बनी हुई है. यही वजह है कि इसकी मांग लगातार ऊंची बनी रहती है. विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में भारत को एक संतुलित रणनीति अपनानी होगी, ताकि जरूरी उर्वरकों की उपलब्धता बनी रहे और साथ ही घरेलू उत्पादन को भी मजबूत किया जा सके. इससे न सिर्फ आयात निर्भरता कम होगी, बल्कि खेती को भी लंबे समय में ज्यादा सुरक्षित बनाया जा सकेगा.